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मंथन: तीन राज्यों में बदलाव, सियासी उथल-पुथल के बीच विपक्ष का रुख और लोकतंत्र की चिंता

Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 10 May 2026 07:52 AM IST
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सार
भारत को लोकतांत्रिक, संघीय और धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने और वैकल्पिक विचारधाराओं को संरक्षित रखने के लिए सभी विपक्षी दलों को मजबूती से विरोध करना होगा। इन चुनावों पर एक जैसी ही कहानी लिखना संभव नहीं है। प्रत्येक राज्य ने अलग राजनीतिक कथा प्रस्तुत की है। 
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Changes in three states, opposition stance amid political turmoil, and concerns about democracy
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी

विस्तार

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों ने तीन राज्यों - केरलम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल - में नाटकीय बदलाव ला दिया है। असम और पुदुचेरी ने पहले जैसी स्थिति के अनुसार ही मतदान किया है।

इन चुनावों पर एक जैसी ही कहानी लिखना संभव नहीं है। प्रत्येक राज्य ने अलग राजनीतिक कथा प्रस्तुत की है। केरलम की कहानी तो सीधी सादी है। यूडीएफ और एलडीएफ कई दशकों से बारी-बारी से राज्य की सत्ता में आते रहे हैं। यह क्रम 2021 में टूटा, जब पिनराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटा। कांग्रेस ने नया नेतृत्व (पीसीसी और सीएलपी) स्थापित किया और पिछले पांच वर्षों में पार्टी ने नई ऊर्जा के साथ सही मायनों में विपक्ष की भूमिका निभाई। इसका परिणाम अब दिखाई दे रहा है। यूडीएफ पर अब यह दायित्व है कि वह शासन चलाए और ऐसे परिणाम दे, जो गठबंधन सहयोगियों को एक साथ रख सके तथा धर्मनिरपेक्षता, आर्थिक प्रगति, समृद्धि और संघवाद को आगे बढ़ाए।


अप्रत्याशित परिणाम
तमिलनाडु की कहानी अधिक जटिल है। डीएमके, जिसे कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों का समर्थन प्राप्त था, 2021 में स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि उसने दो मोर्चों - आर्थिक विकास और जनकल्याणकारी योजनाओं- पर अच्छा प्रदर्शन किया। फिर भी, कुछ अन्य कारणों ने मतदाताओं को प्रभावित किया। सबसे चौंकाने वाला कारण फिल्म अभिनेता जोसेफ विजय का राजनीति में प्रवेश था। वे युवाओं और महिलाओं के बीच बहुत ज्यादा लोकप्रिय हैं।

जैसे ही चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हुई, उसके बाद एक राजनीतिक हवा चलनी शुरू हुई और मतदान से दस दिन पहले उसने तूफान का रूप ले लिया। यह लहर 108 विधानसभा क्षेत्रों तक फैली, लेकिन उससे आगे नहीं जा सकी। महज दो साल पुरानी राजनीतिक पार्टी के लिए यह शानदार शुरुआत थी। अधिकांश उम्मीदवार अपरिचित चेहरे थे। उनमें से कई ने तो प्रचार भी नहीं किया। हर जगह केवल ‘विजय’ ही उम्मीदवार थे। विजय के छोटे-छोटे भाषण, वीडियो मीम और फिल्मी गीत ही उनके चुनाव प्रचार का आधार बने। चुनाव के परिणामों में टीवीके साधारण बहुमत से 11 सीटें पीछे रह गई, लेकिन राष्ट्रपति शासन और पुनः चुनाव से बचने के लिए कांग्रेस (5), भाकपा (2), माकपा (2) और वीसीके (2) ने समर्थन देने का निर्णय लिया।

पश्चिम बंगाल: सबसे महत्वपूर्ण कहानी
पश्चिम बंगाल की कहानी सही मायनों में वह घटना है, जो देश की दिशा बदलने की क्षमता रखती है। वहां कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और माकपा जैसे धर्मनिरपेक्ष दलों ने अलग-अलग रहकर भाजपा का मुकाबला किया। इन दलों ने पिछले दस वर्षों में स्वयं को काफी मजबूत कर लिया था। इसके अलावा एसआईआर के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हट गए, जिससे लोकतंत्र को गहरी चोट पहुंचाई। कई उदाहरण सामने आए, जहां बेटा या बेटी मतदाता थे, लेकिन माता या पिता का नाम सूची में नहीं था। परिवार दो भागों, मतदाता और गैर-मतदाता वर्गों में बंट गए। न्यायपालिका और अस्थायी न्यायिक उपायों ने लाखों मतदाताओं को निराश किया और हजारों लोग मताधिकार से वंचित हो गए। एसआईआर के अतिरिक्त तृणमूल कांग्रेस के लिए लगातार तीन कार्यकाल का बोझ भी भारी साबित हुआ।

भाजपा का बढ़ता प्रभुत्व
तृणमूल कांग्रेस की पराजय गंभीर राजनीतिक संकेत देती है। भाजपा अब अकेले या गठबंधन सरकारों के माध्यम से पश्चिम भारत (महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा), हिंदी भाषी क्षेत्र के अधिकांश राज्यों (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को छोड़कर), पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर पर शासन कर रही है। सांकेतिक तौर पर कहें तो विंध्य पर्वतमाला भाजपा के दक्षिण भारत के पांच राज्यों में प्रवेश के सामने बाधा बनी हुई है। केरलम और तमिलनाडु में प्रवेश के लिए भाजपा के भारी प्रयासों को मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया, जिससे उसे क्रमशः केवल 3 और 1 सीटें मिलीं। हालांकि, भारत के शेष हिस्से पर लगभग उसका पूरा नियंत्रण हो चुका है।

2024 के लोकसभा चुनाव में केवल 240 सीटें जीतने के बावजूद भाजपा ने संसद में कई विवादास्पद विधेयक पारित कराए हैं :
  • वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025
  • जम्मू-कश्मीर स्थानीय निकाय (संशोधन) अधिनियम, 2025
  • कराधान कानून (संशोधन) अधिनियम, 2025
  • राष्ट्रीय खेल प्रशासन अधिनियम, 2025

इसके अतिरिक्त, ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ जैसे विवादास्पद विधेयक भी प्रस्तावित हैं। पर्याप्त संख्या बल न होने के बावजूद भाजपा ने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पेश किया, जिसका उद्देश्य महिलाओं के आरक्षण से संबंधित पहले पारित विधेयक को निरस्त कर नया कानून लाना था। इस नए विधेयक का वास्तविक उद्देश्य परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना और राज्यों के लोकसभा सीटों के अनुपात में बदलाव करना था। हालांकि यह विधेयक इंडिया गठबंधन द्वारा पराजित कर दिया गया। यदि भाजपा की जीत का सिलसिला जारी रहता है, तो सरकार संसदीय प्रणाली की आड़ में एक सत्तावादी राज्य की स्थापना का रास्ता साफ करने के लिए संविधान में संशोधन करने का प्रयास करेगी। भाजपा का अगला लक्ष्य एकात्मक संविधान (संघवाद का अंत), हिंदुत्व को प्रमुख विचारधारा बनाना (धर्मनिरपेक्षता का अंत), पूंजीवाद को आर्थिक मॉडल बनाना (कल्याणकारी राज्य का अंत) और अंततः एक-दलीय व्यवस्था स्थापित करना (लोकतंत्र का अंत) हो सकता है।

एकजुट होकर विरोध की जरूरत
भारत को लोकतांत्रिक, संघीय और धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने के लिए अन्य राजनीतिक विकल्पों और वैकल्पिक विचारधाराओं को भी संरक्षित रखना आवश्यक है। इसके लिए सभी विपक्षी दलों को मजबूती से एक साथ मिलकर प्रतिरोध करना होगा। इंडी गठबंधन को 2024 में थोड़ी सफलता तो मिली, लेकिन वह उसकी गति को बनाए नहीं रख सकी। यह गुट लड़खड़ाते हुए भी संघर्ष करता रहा। भाजपा को चुनौती देने का इंडी गठबंधन के पास ‘एकता’ ही एकमात्र विकल्प है। यह सच है कि गुट के घटकों के बीच मूलभूत मतभेद हैं, लेकिन इन मतभेदों को राज्य स्तर तक ही सीमित रखना चाहिए और राष्ट्रीय स्तर पर एकता स्थापित करनी चाहिए। इसके लिए तत्परता, संवाद और दृढ़ता की आवश्यकता होगी। 
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