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फिर हवा खराब: दिल्ली के 42 निगरानी केंद्रों में से 32 पर एक्यूआई 200 के पार, देश के 20 शहरों में समस्या गंभीर
Sat, 24 Oct 2026 08:33 AM IST
न्यूज डेस्क
अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: न्यूज डेस्क
Updated Sat, 24 Oct 2026 08:33 AM IST
सार
शहरों में हरित क्षेत्रों का विस्तार और प्रदूषण के स्रोतों की निरंतर निगरानी भी बेहद आवश्यक है। चैंबर बनते शहरों का दम घुटने से बचाने के लिए जरूरी है कि सरकारी व प्रशासनिक उपायों के साथ-साथ नागरिक भी सजग होकर इसमें योगदान करें।
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दिल्ली की हवा में जहर, एक्यूआई का स्तर डरावना
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एजेंसी
विस्तार
सर्दियों के दस्तक देते ही दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में वायु प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ने लगा है, जो न सिर्फ स्वास्थ्य के लिहाज से चिंताजनक है, बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर डाल सकता है। दिल्ली के 42 निगरानी केंद्रों में से 32 पर वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 200 के पार पहुंचना और उत्तर प्रदेश के नौ शहरों सहित देशभर के 20 शहरों में हवा की गुणवत्ता का खराब होना इस समस्या की गंभीरता को रेखांकित करता है।
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चिंता की बात यह है कि हर साल वायु प्रदूषण के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जान जाती है, फिर भी इससे निपटने के प्रयास अक्सर तब तेज होते हैं, जब हालात बिगड़ने लगते हैं। मानसून की विदाई के बाद तापमान में गिरावट, हवा की कम गति और वायुमंडलीय स्थिरता जैसी परिस्थितियां प्रदूषकों को धरातल के पास जमा होने का अवसर देती हैं। इससे हवा की गुणवत्ता तेजी से खराब होने लगती है। हालांकि, मौसमी परिस्थितियां प्रदूषण बढ़ने की वजह हैं, लेकिन इसके लिए काफी हद तक मानवीय गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं।
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वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण स्थलों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन, पराली जलाना और त्योहारों के दौरान आतिशबाजी प्रदूषण के स्तर को बढ़ाते हैं। नतीजतन, बच्चों, बुजुर्गों, मरीजों और खुले में काम करने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर इसका घातक प्रभाव पड़ता है। स्मॉग के चलते रेल, सड़क एवं वायु यातायात प्रभावित होने के साथ-साथ पर्यटन उद्योग को भी भारी नुकसान होता है। इन सबका असर देश के आर्थिक विकास पर भी पड़ता है। इसलिए, इस समस्या से निपटने के लिए जरूरी है कि सरकारें केवल प्रदूषण का स्तर खतरनाक होने पर सक्रिय होने के बजाय पूरे साल प्रभावी कदम उठाएं।
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वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना, स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना और औद्योगिक इकाइयों में प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का सख्ती से पालन कराना जरूरी है। निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के उपायों की नियमित निगरानी होनी चाहिए। पराली जलाने की समस्या के समाधान के लिए किसानों को फसल अवशेषों के प्रबंधन के व्यावहारिक और किफायती विकल्प उपलब्ध कराने होंगे।
इसके साथ ही, शहरों में हरित क्षेत्रों का विस्तार और प्रदूषण के स्रोतों की निरंतर निगरानी भी बेहद आवश्यक है। चैंबर बनते शहरों का दम घुटने से बचाने के लिए जरूरी है कि सरकारी व प्रशासनिक उपायों के साथ-साथ नागरिक भी सजग होकर इसमें योगदान करें, तभी सब लोग खुली हवा में सांस ले सकेंगे।