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मुद्दा: डॉक्टर मिलते नहीं, मिलते हैं तो टिकते नहीं; इसलिए कतराते हैं सरकारी नौकरी से

विजय त्रिपाठी Published by: Pavan Updated Mon, 02 Mar 2026 07:18 AM IST
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सार
उत्तर प्रदेश में डॉक्टर अक्सर खराब कार्य स्थितियों, कम वेतन और अवसरों की कमी के कारण सरकारी नौकरी करने से कतराते हैं। सवाल यह उठता है कि सरकारी संस्थानों के प्रोफेसरों को ऐसी कौन-सी बात खटकी कि उन्होंने अचानक रास्ता बदल दिया। 
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Doctors are hard to find, and when they are, they don't stay; that's why they shy away from government jobs.
डॉक्टर मिलते नहीं, मिलते हैं तो टिकते नहीं - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तर प्रदेश में सरकारी डॉक्टरों की बहुत कमी है। जितने हैं, करीब-करीब उतने ही और चाहिए। सरकार डॉक्टरों की भर्ती की कोशिशें भी कर रही हैं, फिर भी कमी पूरी नहीं हो रही है। मिल भी जाते हैं, तो टिकते नहीं हैं। डॉक्टरों के पास इसकी कई वजहें हैं। प्रदेश में डॉक्टर खराब कार्य स्थितियों, निजी क्षेत्र की तुलना में कम वेतन और कॅरिअर के अवसरों की कमी के कारण सरकारी नौकरी करने से कतराते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की भारी कमी, अपर्याप्त बुनियादी ढांचा और नौकरशाही के दबाव के कारण निजी प्रैक्टिस ज्यादा आकर्षक लगती है। कॉरपोरेट अस्पतालों के मोटे पैकेज हैं, तो सरकारी नौकरी में कामकाज का स्वस्थ माहौल न होना भी एक बड़ा कारण है।


प्रांतीय चिकित्सा सेवा संवर्ग के स्वीकृत 19,700 पदों में से करीब सात हजार पद खाली हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में से ज्यादातर को फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) का दर्जा दे दिया गया है। यहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती की जाती है। लोक सेवा आयोग से चयनित स्त्री रोग विशेषज्ञ, एनेस्थेटिस्ट, बाल रोग विशेषज्ञ, सर्जन नहीं हैं, इसलिए पांच लाख रुपये प्रतिमाह तक के पैकेज पर विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती की गई। फिर भी डॉक्टर यहां रुकते नहीं हैं। पिछले दो वर्षों का आंकड़ा देखें, तो 50 फीसदी डॉक्टर साल बीतते-बीतते नौकरी छोड़ देते हैं।


कन्नौज की एक सीएचसी में साल भर काम करने के बाद नौकरी छोड़ने वाले एक बाल रोग विशेषज्ञ बताते हैं कि नौकरी इसलिए ज्वाइन की थी कि ग्रामीण इलाके के गरीब बच्चों की जान बचा सकेंगे। कुछ समय तक तो सब ठीक चला, पर धीरे-धीरे मन बदलने लगा। ग्रामीण परिवारों के लिए जरूरी सुविधाएं दुश्वार हैं। गाहे-बगाहे काम में नेताओं का भी हस्तक्षेप रहता है। अस्पताल अधीक्षक ने दूसरे कार्यक्रमों और जिला स्तर की बैठकों में ड्यूटी लगानी शुरू कर दी। छुट्टियां भी बमुश्किल मिलने लगीं। आजिज आकर नौकरी छोड़ दी। सीतापुर के जिला अस्पताल में बतौर सर्जन रहे एक चिकित्सक ने भी बताया कि उन्होंने साल भर रात-दिन मेहनत की, तो अस्पताल में मरीजों की संख्या बढ़ गई। संसाधनों की जरूरत पड़ने लगी। किसी तरह ऑपरेशन थिएटर बना। उपकरणों के लिए मुंह ताकना पड़ता है। फिर राजनीति शुरू हो गई और दूसरे जिले में तबादला कर दिया गया। अंततः उन्होंने निजी अस्पताल की नौकरी पकड़ ली।

चिकित्सा शिक्षा विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. बद्री विशाल कहते हैं कि ग्रामीण इलाके के अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों को रोकना है, तो संसाधनों का विकास करना होगा। उन्हें कुछ अतिरिक्त सुविधाएं देनी होंगी। निजी प्रैक्टिस जैसी बाध्यता खत्म करके नया मॉडल विकसित करना होगा, ताकि जिनके पास शहरी विकल्प न हों, वे ग्रामीण इलाकों में जाने की सोचें। प्रदेश में मेडिकल कॉलेज तो धड़ाधड़ खुलते जा रहे हैं, पर मेडिकल कॉलेजों में औसतन 30 फीसदी तक पद खाली हैं। एक पूर्व संकाय सदस्य की मानें, तो आपसी प्रतिस्पर्धा में राजनीति और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश भी एक वजह है। इस विशेषज्ञ ने जिस संस्थान से पढ़ाई की, वहीं असिस्टेंट प्रोफेसर बने। कुछ वक्त बाद चिकित्सा में नवाचार शुरू किए, तो वरिष्ठों को यह अखर गया। नतीजतन, इस्तीफा देकर उन्हें निजी प्रैक्टिस करनी पड़ी। दो साल में खुद का अस्पताल बना कर करीब 35 लोगों को रोजगार दे रहे हैं। ऐसे तमाम वाकये भरे पड़े हैं।

चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक रह चुके प्रोफेसर एनसी प्रजापति बताते हैं कि सरकारी कॉलेजों में कई बार चिकित्सा विशेषज्ञ के साथ संबंधित जिलों के प्रशासनिक अधिकारियों का व्यवहार ठीक नहीं होता है। मेडिकल कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर से लेकर प्रोफेसर तक के नौकरी छोड़ने के पीछे यह भी बड़ी वजह है। उनका मानना है कि शहरी व ग्रामीण कॉलेजों की फैकल्टी व रेजिडेंट डॉक्टरों के बीच वेतन से लेकर सुविधाओं के मानकों में बदलाव की जरूरत है। प्रदेश के सबसे बड़े चिकित्सा विश्वविद्यालय केजीएमयू में पढ़ने व शिक्षक बनने के लिए डॉक्टर लालायित रहते हैं, पर पिछले कुछ समय से यहां के प्रोफेसर नौकरी छोड़कर कॉरपोरेट अस्पतालों का रुख कर रहे हैं। इस्तीफा देते वक्त ज्यादातर प्रोफेसर व्यक्तिगत कारण बताते हैं, पर असल वजह संस्थान के प्रशासन से तालमेल न बैठ पाना होती है।

इस तरह राजधानी लखनऊ में चल रहे कॉरपोरेट अस्पतालों के सुपर स्पेशलिस्टों की टीम पर गौर करें, तो 90 फीसदी से ज्यादा केजीएमयू, डा. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, संजय गांधी पीजीआई की फैकल्टी है। सवाल यह उठता है कि सरकारी संस्थानों के प्रोफेसरों को ऐसी कौन-सी बात खटकी कि उन्होंने अचानक रास्ता बदल दिया। इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर कोई सम्मानजनक रास्ता न निकाला गया, तो डॉक्टरों के सरकारी सेवाओं में आने-जाने का सिलसिला रुकने वाला नहीं।
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