सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Flim 'Dhurandhar' is late: Cinema is not journalism; neither is it a sworn testimony.

‘धुरंधर’ को आने में देर हुई: सिनेमा पत्रकारिता नहीं है; न ही यह कोई शपथ पत्र पर दी गई गवाही

राघवन एस राव, स्वराज मैगजीन Published by: Pavan Updated Sat, 28 Mar 2026 08:45 AM IST
विज्ञापन
सार
धुरंधर फिल्म को लेकर जो विरोध का हल्ला है, वह हमें फिल्म के शिल्प पर कुछ नहीं बताता। लेकिन वह हमें उन लोगों के बारे में बहुत कुछ बताता है, जो लंबे समय से, इस मामले में एकमात्र लाउडस्पीकर अपने ही हाथों में रखने में सहज महसूस करते रहे हैं।
loader
Flim 'Dhurandhar' is late: Cinema is not journalism; neither is it a sworn testimony.
‘धुरंधर’ को आने में देर हुई - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कोई भी राष्ट्र, जो खुद को अपनी ही वीरता की कहानियां सुनाने से कतराता है, वह इससे ज्यादा ईमानदार नहीं बन जाता, बल्कि वह और भी ज्यादा कमजोर हो जाता है-दूसरों के गढ़े हुए मिथकों, लगातार खुद पर संदेह करने की जड़ता, और इस खोखले विश्वास के सामने कि अपनी नियति खुद तय करने की शक्ति तो बस दूसरे देशों के पास ही होती है। राष्ट्र हमेशा से ऐसा ही करते आए हैं। लेकिन, भारत ने अपनी आजादी के ज्यादातर समय में, अपनी खुद की कहानियां गढ़ने से परहेज किया है।


जब वह हॉलीवुड के ‘अमेरिकी श्रेष्ठता’ वाले नजरिये को नहीं अपना रहा होता था, तब वह ऐसी फिल्में बना रहा होता था, जो पश्चिमी दुनिया की वाहवाही पाने के लिए धारावी की गरीबी को दिखाती थीं-यही वह संदर्भ है, जिसमें धुरंधर आती है। आदित्य धर की दो-भाग वाली जासूसी थ्रिलर, जिसमें एक काल्पनिक रॉ एजेंट भारत-पाकिस्तान संघर्ष के एक दशक के दौरान कराची के अंडरवर्ल्ड में घुसपैठ करता है, ने  सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। आलोचकों के वर्ग ने  इसे ‘अंधराष्ट्रवादी, सिनेमा की आड़ में प्रोपेगेंडा, और सच को कल्पना के साथ बेझिझक मिलाने’ के  कथित अक्षम्य पाप का दोषी करार दिया है।


मेरा मानना है कि इन आरोपों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और इन्हें इनके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना चाहिए; जिसका निष्कर्ष यह है कि या तो राष्ट्रीय सिनेमा की पूरी परंपरा ही उसी अपराध की दोषी ठहरती है, या फिर भारतीय सिनेमा के संदर्भ में ‘प्रचार’ (प्रोपेगेंडा) शब्द का अर्थ किसी और के संदर्भ में इसके अर्थ से बिल्कुल ही अलग है।

धुरंधर  एक मसाला एंटरटेनर फिल्म है। यह अपने हर स्लो-मोशन एंट्री, हर सीना ठोकने वाले डायलॉग और तोप के गोलों की बौछार की तरह आने वाले हर बैकग्राउंड स्कोर के साथ खुद को इसी रूप में पेश करती है। एकतरफा खलनायक और लंबाई से जुड़ी आलोचनाएं जायज हैं, लेकिन जिस आलोचना ने चर्चा पर अपना दबदबा बनाया है, वह शिल्प के बारे में नहीं है। आरोप लगाने वालों का इसके क्राफ्ट को लेकर दावा नहीं है कि फिल्म की गति धीमी है या इसकी पटकथा किसी और से ली गई है, बल्कि यह है कि फिल्म की भावनात्मक दिशा ही गलत है। इस नजरिये से देखें तो, एक सिंगल-स्क्रीन थिएटर में तीन हजार लोगों का सीटियां बजाकर जोश दिखाना, उन दर्शकों का अनुभव नहीं है, जिन्हें अपनी भावनाओं को बाहर निकालने का मौका मिल रहा हो। वे हेर-फेर के शिकार हुए हैं। तो फिर, आलोचकों को यह तय करने का अधिकार किसने दिया कि आम जनता को किन भावनाओं को महसूस करने की अनुमति है?

जोसेफ नाई ने 1990 में ‘सॉफ्ट पावर’ शब्द गढ़ा था, जिसका इस्तेमाल उन्होंने जबर्दस्ती के बजाय आकर्षण के जरिये दूसरों की पसंद को प्रभावित करने की क्षमता को बताने के लिए किया था। उन्होंने संस्कृति, और सबसे बढ़कर सिनेमा को इसका सबसे असरदार जरिया माना। वह फाइटर पायलट, जो कभी नहीं हारता। वह खुफिया एजेंट, जो हमेशा अपने लक्ष्य को पा लेता है। अफसरशाही के खिलाफ खड़ा अकेला नायक। ये असलियत की झलकियां नहीं हैं। ये मिथक हैं-और मिथक, जैसा कि यूनानियों के समय से हर सभ्यता ने समझा है, वे कहानियां हैं, जो लोग खुद को बताते हैं कि वे कौन हैं और वे क्या बनना चाहते हैं।

चीन ने 2017 में वुल्फ वॉरियर 2 बनाई, तो इस्राइल ने हमें फौदा दिया और ब्रिटेन ने जेम्स बॉन्ड। इनमें से किसी भी देश ने मनोरंजन को राष्ट्रीय गौरव के साधन के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए माफी नहीं मांगी। 1.4 अरब लोगों की एक सभ्यता, जो परमाणु हथियारों से लैस है, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, और जिसने अपनी धरती पर बार-बार आतंकवादी हमलों का सामना किया है, अब ऐसी लोकप्रिय फिल्में बना रही है, जो यह संदेश देती हैं कि हम इस कहानी में हमेशा पीड़ित बनकर नहीं रहेंगे।

हैरानी की बात यह नहीं है कि धुरंधर जैसी फिल्में मौजूद हैं। हैरानी की बात तो यह है कि इसमें इतना ज्यादा समय लग गया। धुरंधर पर आरोप लगाया जाता है कि वे सच और कल्पना को बेझिझक मिलाते हैं, लेकिन यह तो दुनिया भर के ऐतिहासिक सिनेमा की एक बुनियादी कार्यप्रणाली रही है। फिल्म ब्रेवहार्ट ने पांच ऑस्कर जीते थे, जबकि उसमें ‘किल्ट्स’ (स्कॉटिश स्कर्ट) को असल समय से दो सौ साल पहले और चेहरे पर ‘वोड’ (नीला रंग) लगाने की प्रथा को असल समय से एक हजार साल बाद का दिखाया गया था। ग्लैडिएटर  का नायक पूरी तरह से काल्पनिक है। आर्गो  ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार जीता, जबकि इसके हवाईअड्डे पर हुए क्लाइमेक्स को मनगढ़ंत बनाया गया था। अमेरिकन स्नाइपर  इतिहास की सबसे अधिक कमाई करने वाली युद्ध फिल्म बन गई, जबकि इसमें एक ऐसे नायक का महिमामंडन किया गया था, जिसके बारे में जूरी ने पाया कि उसने अपने संस्मरण में कई महत्वपूर्ण दावे मनगढ़ंत किए थे। सिनेमा पत्रकारिता नहीं है; न ही यह कोई शपथ पत्र पर दी गई गवाही है। जब धुरंधर अपने काल्पनिक रॉ एजेंट को आईसी-814 अपहरण, संसद हमले और 26/11 जैसी घटनाओं से गुजारती है, तो वह वही कर रही होती है, जो ऐतिहासिक ड्रामा हमेशा से करता आया है। वह यह काम कितनी कुशलता या कितने अनाड़ीपन से करती है, यह तो उसकी कलाकारी का सवाल है। लेकिन, वह ऐसा करती है, यह कोई शर्मनाक बात नहीं है।

जब कोई तमाशा उदारवादी अंतरराष्ट्रीय सोच को भाता है, तो उसे ‘कला’ कहा जाता है। और जब वह राष्ट्रवादी सोच को भाता है, तो उसे ‘प्रचार’ कहा जाता है। भारत ने दशकों तक हॉलीवुड की उन ‘पेंटागन-समर्थित’ काल्पनिक कहानियों को देखते हुए बिताए हैं, जिनमें अमेरिकी एजेंट दुनिया के संघर्ष-ग्रस्त इलाकों में बेखौफ होकर घूमते हैं और ‘न्याय’ करते हैं। भारत ने इन फिल्मों को बिना किसी आलोचना के, केवल मनोरंजन के तौर पर स्वीकार किया है। लेकिन जिस पल भारत अपना खुद का ऐसा ही कोई संस्करण बनाता है, तो अचानक ही, मानो किसी जादू-टोने से, ‘प्रचार’ शब्द सामने आ जाता है। -edit@amarujala.com
विज्ञापन
विज्ञापन
Trending Videos
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed