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नैतिकता का गुरुत्व: यूपीएससी के नतीजे और भ्रांत परिदृश्यों की वायरल लत
नन्दितेश निलय, स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक
Published by: Pavan
Updated Mon, 30 Mar 2026 05:09 AM IST
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नैतिकता का गुरुत्व
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अमर उजाला
विस्तार
इस लेख की शुरुआत पॉटर स्टीवर्ट के इस कथन से, ‘नैतिकता यह जानने में है कि आपके पास क्या करने का अधिकार है और क्या करना सही है।’ वह इसलिए कि सिविल सर्विसेज के परिणाम इस बार कुछ ऐसे भी सत्य लेकर आए, जिनको झुठलाना संभव नहीं रहा। जो प्रतियोगी इस परीक्षा में सफल हुए, वे उस खुशी, मान-सम्मान और शोर का हिस्सा बने, जो उनकी गौरव-गाथा की प्रतिध्वनि थी और जो कुछेक नंबरों से रह गए, वे भी किसी से कमतर नहीं थे। न अपने ज्ञान में, न समर्पण में और न संघर्ष में। उन्होंने परिणाम को वीरों की भांति स्वीकार किया और फिर अपनी मंजिल की तलाश में जुट गए होंगे। लेकिन इस बीच फेक न्यूज और वायरल होने की लत कुछ ऐसे भी प्रतियोगियों की कहानी लेकर आई, जो अपनी विफलता के परिणाम को थोड़ी देर के लिए ही सही, पर कैद कर देना चाहते थे।इस परीक्षा को लेकर उन प्रतियोगियों की ऐसी वायरल होती प्रतिक्रिया पॉवर के प्रति सामाजिक आकर्षण की पटकथा लिख गई। वे पास हुए नहीं और फेल उनको भाया नहीं। और जो सूझा, वह वायरल होने का भाव था। और इसलिए परीक्षा के परिणाम आते ही कुछ प्रतियोगी यह ठान बैठे थे कि गर जीत नहीं भी हुई, तो क्या हुआ, वायरल तो हुआ जा सकता है। आखिर बिन परदों के भी तो मकान होते हैं और खुद्दारी के बिना भी तो यह दुनिया चलती है। एक के बाद एक, खबरें वायरल होती रहीं, ढोल-नगाड़े बजते रहे, पर कहीं-न-कहीं कोई खामोशी वह सत्य बयां कर रही थी।
आजादी के बाद से, इस परीक्षा की सफलता की दर बहुत कम रही है, लगभग 0.53 फीसदी, और हाल के वर्षों में तो यह अक्सर 0.1-0.2 फीसदी तक ही रह गई है। दिनों-दिन मुश्किल होती यह परीक्षा लाखों उम्मीदवारों से छनकर हजार रिक्तियों में सिमट जाती है। ऐसे में किसी का चूक जाना आश्चर्य नहीं, लेकिन सत्य जानकर भी अपनी असत्यता ओढ़े बस वायरल हो जाना क्या उचित है? यूपीएससी के नतीजों और उसके आस-पास मचे शोर-शराबे ने एक ऐसा माहौल बना दिया, जहां उम्मीदवारों का हर शब्द 'ईश्वरीय' लग रहा था और हर कोई उन पर आंख मूंदकर भरोसा कर रहा था। हालांकि, किसी ने कभी यह नहीं सोचा कि उनके शब्दों की एक नैतिक जांच की जरूरत है, क्योंकि वे दावे सच नहीं थे। और इससे भी ज्यादा निराशाजनक बात यह देखना रहा कि वे लगातार उस परिणाम पर अपना हक जताते रहे, जो किसी और का था और यह जानते हुए भी कि जब सच सामने आएगा, तो कोहरा कितना गहरा होगा, वे नहीं झिझके। शायद इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन की दुनिया में सबकुछ रील-सा हो जाता है।
जब एरिक बर्न ‘अहं-अवस्थाओं’ या ईगो स्टेटस’ पर चर्चा कर रहे थे, तो उन्होंने शायद यह उम्मीद नहीं की होगी कि एक दिन सार्वजनिक बातचीत में किसी व्यक्ति की ‘बाल-अवस्था’ या ‘चाइल्ड स्टेट’ उसकी 'वयस्क-अवस्था' या ‘एडल्ट स्टेट’ पर हावी हो जाएगी। वह 'बाल-अवस्था' हाल ही में तब देखने को मिली, जब एक के बाद एक सिविल सर्विसेज के उम्मीदवार समाज से वाहवाही लूटने के लिए अपनी पूरी चालाकी और तिकड़मों का इस्तेमाल कर रहे थे। हालांकि, सफलता का वह शोर जल्द ही शांत हो गया, क्योंकि वह झूठ की नींव पर खड़ा था; और जो भी तथ्य पेश किए गए थे, वे असली नहीं, बल्कि मनगढ़ंत थे। अपनी असफलता को स्वीकार करने के बजाय, उन उम्मीदवारों ने नतीजों को प्रलोभन के झूठे धागों में लपेटना चुना और एक ऐसे रास्ते पर चल पड़े, जो जोखिम भरा था और जिससे उस व्यक्ति के साथ-साथ उस संस्था की विश्वसनीयता भी कम हो रही थी। यह कुछ हिटलर के मंत्री जोसेफ गोएबल्स के 'भ्रमित करने वाले सत्य के प्रभाव' से प्रेरित होने जैसा था। यहां एक सीधा-सा सवाल उठता है: क्यों? कोई भी उम्मीदवार ऐसा गलत काम क्यों करेगा, जिसका नतीजा अंततः उन परीक्षाओं और उम्मीदवारों, दोनों की प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचाना ही है?
जब इंसान को बोलने और सुनने, और बाद में समझने और समीक्षा करने का मौका मिला, तो यह 'होमो सेपियंस' (आधुनिक मानव) के लिए अपने पर्यावरण से जुड़ने और तालमेल बिठाने का एक बेहतरीन अवसर बन गया। संवाद करने की क्षमता ने ही 'एक जीव' होने के सही अर्थ को परिभाषित किया। लेकिन इन्सान के पास एक अतिरिक्त बढ़त थी। जैसा कि हरारी ने कहा है, ‘सैपियंस की सचमुच अनोखी खासियत यह है कि हम काल्पनिक कहानियां गढ़ सकते हैं और उन पर यकीन कर सकते हैं। बाकी सभी जानवर अपनी बातचीत की प्रणाली का इस्तेमाल असलियत को बताने के लिए करते हैं। हम अपनी बातचीत की प्रणाली का इस्तेमाल नई असलियतें गढ़ने के लिए करते हैं।’ और उन नई असलियतों को सिर्फ तभी खोजा और समझाया जा सकता है, जब हम अपने झूठे अहंकार या बड़प्पन के लिए कोई गलत रास्ता न चुनें, बल्कि दिखावा करने के बजाय अपने बर्ताव में सच्चे रहें।
ईमानदारी वह आंतरिक मूल्य है, जो पूर्णता में अधिक विश्वास रखता है, और उस नैतिक निरंतरता को बनाए रखता है, जो मानवीय मूल्यों के सार्वभौमिक सिद्धांतों को दृढ़ता से थामे रखती है। आइए हम फिर से उसी मार्ग पर लौटें, क्योंकि केवल मनुष्य ही अपनी समीक्षा कर सकता है, मनुष्य ही पश्चाताप कर सकता है, और मनुष्य ही स्वयं को बदल सकता है। यह मनुष्य होने का भाव ही तो मानव समाज में जानवरों तक को यह समझा बैठा है कि मनुष्य पर भरोसा किया जा सकता है। तो फिर क्यों उन प्रतियोगियों ने उस रास्ते को चुना, जो वायरल तो था, लेकिन अनैतिक भी? भले ही उनका चयन नहीं हुआ, पर उन्होंने तैयारी तो की ही होगी। फिर अपने उस संघर्ष को इतना हल्का क्यों कर दिया? आखिर यह समाज उनके संघर्ष से भी तो प्रेरित होता। इसलिए यह समय उनके लिए, सभी के लिए, अपनी समीक्षा करने, पश्चाताप करने और एक बेहतर इन्सान बनने का सबसे उपयुक्त समय है। ऐसी जागरूकता 'द्वैत' और 'अद्वैत' के बीच की खाई को पाट देती है, और हर जगह अपनी विशाल उपस्थिति दर्ज कराती है। यह हमें हमारे गहरे और उच्चतर 'स्व' के और करीब ले जाती है, जो हमें उस ‘सॉक्रेटिक विजडम’ के इर्द-गिर्द रखता है, कुछ उस आत्म-परीक्षण के समीप, जहां नैतिकता का गुरुत्व ताजीवन महसूस होता है। - edit@amarujala.com