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कला का कारोबार: करोड़ों की नीलामी, फिर भी संकट में गैलरियां; असली चुनौती क्या है?
Sun, 12 Jul 2026 06:52 AM IST
Devesh Tripathi
मार्क स्पीगलर, द न्यूयॉर्क टाइम्स
मार्क स्पीगलर, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sun, 12 Jul 2026 06:52 AM IST
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कला का बाजार
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विस्तार
दूर से देखने पर कला की दुनिया किसी सुनहरे ख्वाब जैसी लगती है, जहां नीलामी घरों में करोड़ों डॉलर में पेंटिंग्स बिकती हैं, आलीशान शहरों में भव्य कला महोत्सव सजते हैं और नामचीन कलाकारों के पीछे अमीर खरीदारों की लंबी कतारें लगी रहती हैं। पहली नजर में ऐसा लगता है, मानो कला का बाजार अपने इतिहास के सबसे सुनहरे दौर से गुजर रहा है, पर जब इस चकाचौंध के पीछे झांकते हैं, तो कैनवास पर बिखरे रंग कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। बाहर से समृद्ध दिखने वाली यह दुनिया भीतर ही भीतर एक ऐसे गंभीर संकट से जूझ रही है, जो पूरे कला जगत की बुनियाद को हिला सकता है।करीब तीन दशकों तक कला जगत का हिस्सा रहने और दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित ग्लोबल आर्ट फेयर ‘आर्ट बेसल’ का नेतृत्व करने के दौरान, मैंने इस जादुई दुनिया को बहुत करीब से महसूस किया है। पिछले दस वर्षों में दुनियाभर में अमीर लोगों की तादाद बहुत तेजी से बढ़ी, जिससे स्वाभाविक उम्मीद थी कि कला के कद्रदान और खरीदार भी बढ़ेंगे, और रिकॉर्ड तोड़ नीलामी की सुर्खियों ने इस भरोसे को और पक्का कर दिया। लेकिन, यह सिर्फ एक भ्रम था, क्योंकि कला बाजार की असली हकीकत नीलामी घरों से नहीं, बल्कि उन गैलरियों से तय होती है, जो इस पूरे इकोसिस्टम की रीढ़ हैं। गैलरी सिर्फ कलाकृतियां बेचने की दुकान नहीं होती, बल्कि यह नए कलाकारों को खोजती है, उन्हें तराशती है, पहचान दिलाती है और कला बाजार को जीवित रखती है। यही कारण है कि जब हाल के महीनों में मेरी मुलाकात दुनियाभर के गैलरी मालिकों से हुई, तो उनके चेहरों से उत्साह गायब था और उन्होंने स्वीकार किया कि बरसों पुराना उनका बिजनेस मॉडल अब दम तोड़ रहा है। यह डर बेबुनियाद भी नहीं है, क्योंकि पिछले एक साल में कई छोटी-बड़ी गैलरियां हमेशा के लिए बंद हो चुकी हैं। सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब दुनिया की दिग्गज गैलरियों में शुमार ‘पेस’ ने अपने दर्जनों कलाकारों से नाता तोड़ लिया और बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी कर दी। आखिर रातों-रात ऐसा क्या बदल गया? इसका जवाब जितना सीधा है, उतना ही चौंकाने वाला भी।
दरअसल, कला की दुनिया का विस्तार तो बहुत तेजी से हुआ, लेकिन कला बाजार का वास्तविक आकार (मार्केट साइज) वहीं का वहीं रुक गया। कलाकार बढ़ गए, गैलरियां खुल गईं, प्रदर्शनियां और आर्ट फेयर भी दोगुने हो गए, लेकिन कुल बिक्री एक जगह पर ठहर गई। यानी, बाजार तो उतना ही रहा, लेकिन उसमें हिस्सा लेने वालों की संख्या बहुत बढ़ गई। इसलिए, प्रतिस्पर्धा पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गई।
अगर 2026 की आर्ट बेसल/यूबीएस आर्ट मार्केट रिपोर्ट के आंकड़ों को महंगाई के हिसाब से देखा जाए, तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। रिपोर्ट बताती है कि वास्तविक अर्थों में वैश्विक कला बाजार में पिछले वर्षों के दौरान लगभग कोई वृद्धि ही नहीं हुई। 2025 का बाजार आकार आज भी 2009 की वैश्विक मंदी और 2020 की महामारी के दौर के स्तर के आसपास ही ठहरा हुआ है। यही विरोधाभास आज पूरी कला दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। आज गैलरियों के सामने दोहरी मार है। जहां एक तरफ उनकी बिक्री लगातार घट रही है या बेहद अनिश्चित हो चुकी है, वहीं दूसरी तरफ शहरों का भारी-भरकम किराया, कर्मचारियों का वेतन, प्रदर्शनियों का तामझाम और अंतरराष्ट्रीय मेलों में शामिल होने का खर्च आसमान छू रहा है। यदि गैलरियां इसी तरह कमजोर होती रहीं, तो इसका सबसे पहला और सीधा नुकसान युवा कलाकारों को होगा, जिनसे उनकी पहली उड़ान का मंच छिन जाएगा, क्योंकि बड़े संग्रहालयों और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के पीछे भी अक्सर गैलरियों का ही आर्थिक और पेशेवर सहयोग होता है।
एक दौर था, जब कला बाजार का पूरा ताना-बाना रिश्तों और आपसी भरोसे पर टिका होता था। छोटी-छोटी गैलरियां अक्सर उन मोहल्लों में खुलती थीं, जहां कलाकार रहते थे, और गैलरी संचालक व कला संग्रहकर्ता (कलेक्टर्स) आपस में एक परिवार की तरह जुड़े रहकर कला को निवेश नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर मानते थे। पर, पिछले दो दशकों में कला का पूरी तरह बाजारीकरण हो गया और यह चमक-धमक, सेलिब्रिटी कल्चर तथा सोशल मीडिया का हिस्सा बनकर लाखों लोगों को आकर्षित तो करने लगी, पर इस लोकप्रियता के अनुपात में बाजार की वास्तविक कमाई नहीं बढ़ सकी। समस्या तब और गहरी हो गई, जब कला को पेंटिंग के बजाय एक ‘फाइनेंशियल एसेट’ या निवेश के रूप में देखा जाने लगा, जिसे कुछ आर्ट फंड्स और वेल्थ मैनेजर्स ने भी खूब हवा दी। लोग अब कलाकार की रचनात्मक यात्रा का हिस्सा बनने के लिए नहीं, बल्कि कम कीमत पर खरीदकर ऊंचे दामों पर तुरंत बेचने के लिए कला खरीदने लगे, जिन्हें कला जगत में ‘फ्लिपर’ कहा जाता है। इस शॉर्ट-टर्म मुनाफे की भूख ने कलाकारों के कॅरिअर को अस्थिर कर दिया है, क्योंकि जब किसी कलाकार की पेंटिंग बार-बार नीलामी में आती है, तो उसकी कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ती और अचानक गिर जाती हैं, जिससे कलाकार की साख हमेशा के लिए खत्म हो जाती है। इसके साथ ही, गैलरियों और कलेक्टर्स के रिश्ते की आत्मीयता कम हुई है। गैलरियां नए खरीदारों पर आसानी से विश्वास नहीं करतीं, जबकि खरीदारों को लगता है कि कला खरीदने की प्रक्रिया जरूरत से ज्यादा जटिल बना दी गई है। इससे खरीदार अब सीधे नीलामी घरों का रुख करने लगे हैं।
इस संकट का एक और दिलचस्प पहलू नई पीढ़ी के खरीदारों की मानसिकता है, जहां आज का युवा उद्यमी या टेक-प्रोफेशनल कला खरीदने से पहले बेहद व्यावहारिक सवाल पूछता है। वह सोचता है कि एक महंगी पेंटिंग खरीदने के बाद उसे सुरक्षित रखने, उसका बीमा कराने, शिपिंग करने और समय-समय पर उसके रखरखाव पर भारी पैसा और समय खर्च होगा। ऐसे में, उसके लिए शेयर बाजार, स्टार्टअप या दूसरे निवेश अधिक आसान और सुविधाजनक विकल्प बन जाते हैं। ऐसे हालात में सवाल उठता है कि क्या इस संकट से बाहर निकलने का कोई रास्ता है? इसका जवाब है-हां, लेकिन इसके लिए कला जगत को अपनी पुरानी ताकतों की ओर लौटना होगा। इसके लिए गैलरियों को सख्त रीसेल एग्रीमेंट (पुनर्विक्रय समझौते) अपनाने होंगे, ताकि खरीदार तुरंत मुनाफा कमाने के लिए कलाकृति न बेच सकें। सोच में यह बदलाव लाना भी जरूरी है कि कला को निवेश का साधन बनाना बंद किया जाए, क्योंकि पेंटिंग की सबसे बड़ी कीमत उसकी रचनात्मकता और समाज पर उसका प्रभाव है, न कि उसकी नीलामी की रकम। साथ ही, गैलरियों को दुनियाभर के हर बड़े शहर में शाखाएं खोलने और हर अंतरराष्ट्रीय कला महोत्सव में भाग लेने की अंधी दौड़ के जाल से बाहर निकलना होगा। महामारी ने हमें सिखाया कि जब अंतरराष्ट्रीय उड़ानें बंद थीं, तब गैलरियों ने अपने ही स्थानीय खरीदारों से संपर्क साधा और परिणाम बेहद शानदार रहे।
कला की दुनिया आज भी उतनी ही जीवंत है, बस जरूरत इसकी बढ़ती लोकप्रियता और इसके आर्थिक ढांचे के बीच दोबारा संतुलन कायम करने की है। जिस दिन गैलरियां व्यक्तिगत संवाद, स्थानीय रिश्तों और कलाकारों के विकास को अपनी प्राथमिकता बना लेंगी, यह संकट खुद-ब-खुद दूर हो जाएगा, क्योंकि कला केवल बिकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि हमारे समाज की सांस्कृतिक स्मृति है।