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शिव ने खाली कराई वाराणसी नगरी: दिवोदास के क्रोध से उजड़ गई थी काशी, निकुंभ के शाप और 'अविमुक्त क्षेत्र' की कथा

Sun, 12 Jul 2026 07:08 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 12 Jul 2026 07:08 AM IST
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सार
वाराणसी के वैभव को देखकर महादेव ने अपने गण निकुंभ को आदेश दिया कि किसी को कष्ट पहुंचाए बिना इस नगरी को मनुष्यों से रिक्त कर दिया जाए।
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भगवान शिव और माता पार्वती - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

किसी समय वाराणसी पर यदुवंशी राजा भद्रश्रेण्य का शासन था। उसके सौ पुत्र थे, किंतु राजा दिवोदास ने उन सबको परास्त कर दिया और वाराणसी पर अधिकार करके उसे अपनी राजधानी बना लिया। दिवोदास के शासन में वाराणसी अत्यंत वैभवशाली हो गई। उधर, देवी पार्वती के साथ विवाह के बाद भगवान शिव कुछ समय तक हिमालय में ही रहे। परंतु, पार्वती जी की माता मैना को यह विवाह शुरू से ही पसंद नहीं था। वह प्रायः शिव और उनके गणों की निंदा करती थीं।


एक दिन उन्होंने पार्वती जी से कहा, ‘उमा! तुम्हारे पति महादेव विचित्र स्वभाव के हैं। वह श्मशान में रहते हैं और उनके गण भी अनोखे आचरण वाले हैं। तुम्हें उनके साथ इतना कष्ट सहने की क्या आवश्यकता है?’ यह सुनकर माता पार्वती का हृदय आहत हो गया। उन्होंने भगवान शिव से कहा, ‘नाथ! अब मैं अपने मायके में नहीं रहना चाहती। मुझे अपने घर ले चलिए।’ तब भोलेनाथ ने विचार किया कि पृथ्वी पर ऐसा कौन-सा स्थान है, जहां वे दोनोें स्थायी रूप से निवास कर सकें। उनकी दृष्टि वाराणसी पर पड़ी, जो तप, धर्म और सिद्धियों की भूमि थी। उस समय वहां राजा दिवोदास का शासन था। अत: शिवजी ने अपने प्रिय गण निकुंभ को बुलाकर कहा, ‘तुम किसी को कष्ट पहुंचाए बिना ऐसा उपाय करो कि वाराणसी नगरी मनुष्यों से रिक्त हो जाए। तब हम वहां निवास कर सकेंगे।’


निकुंभ वाराणसी पहुंचे। उन्होंने नगर के एक नाई कंडुक को स्वप्न में दर्शन देकर कहा, ‘नगर के द्वार पर मेरी प्रतिमा स्थापित करो और मेरे लिए एक मंदिर बनवाओ। मैं तुम्हारा और नगरवासियों का कल्याण करूंगा।’ अगले दिन सुबह कंडुक ने राजा की अनुमति लेकर नगर के प्रवेश द्वार पर निकुंभ की भव्य प्रतिमा स्थापित करवाई। प्रतिदिन वहां धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य आदि से पूजा होने लगी। शीघ्र ही निकुंभ की ख्याति चारों ओर फैल गई।

इस बीच राजा दिवोदास की रानी सुयशा भी पुत्र की इच्छा लेकर निकुंभ की पूजा करने पहुंची। उसने अनेक व्रत किए, प्रार्थना की, किंतु उसे पुत्र प्राप्ति का वरदान नहीं मिला। वास्तव में निकुंभ जानबूझकर उन्हें वर नहीं दे रहे थे। उनके मन में यही विचार था कि राजा क्रोधित होकर कोई अनुचित कार्य करेगा, तभी वाराणसी मनुष्यों से रिक्त हो पाएगी।

लंबे समय तक प्रतीक्षा करने के बाद राजा का धैर्य टूट गया और उसने क्रोध में निकुंभ का मंदिर तुड़वा दिया। यह अपमान देखकर निकुंभ ने राजा को शाप दिया, ‘दिवोदास! तुमने बिना किसी अपराध के मेरा स्थान नष्ट कराया है। इसलिए, यह समृद्ध वाराणसी शीघ्र ही जनशून्य हो जाएगी!’ शाप का प्रभाव तत्काल दिखाई देने लगा। नगर में भय और अशांति फैल गई। कुछ ही समय में वैभवशाली वाराणसी मनुष्यों से रिक्त होकर उजाड़ बन गई। इसके बाद निकुंभ, महादेव के पास लौट आए और सारी घटना सुनाई। शिवजी व माता पार्वती वाराणसी में रहने लगे। यही स्थान आगे चलकर उनका प्रिय निवास बना। वहां कोई स्थायी भवन न होने के कारण पार्वती जी को प्रसन्नता नहीं हुई। उन्होंने शिवजी से कहा, ‘नाथ! यहां मेरा मन नहीं लगता। चलिए, किसी और स्थान पर चलते हैं।’ यह सुनकर भगवान मुस्कुराए और बोले, ‘देवी! यह अविमुक्त क्षेत्र ही अब मेरा सनातन निवास है। मैं इसे छोड़कर कभी नहीं जाऊंगा। यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो तुम अपने मायके जा सकती हो, किंतु मैं यहीं रहूंगा।’

महादेव के इन वचनों के कारण वाराणसी ‘अविमुक्त क्षेत्र’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। मान्यता है कि सत्य, त्रेता और द्वापर, इन तीनों युगों में भगवान शिव और पार्वती ने यहां निवास किया। फिर, कलियुग आरंभ होने पर महादेव की वाराणसी नगरी उजड़ जाती है और कुछ समय पुनः बस जाती है। इस प्रकार यह उजड़ती-बसती रहती है। इसी कारण, वाराणसी को शिव की अनंत नगरी, मोक्षदायिनी और अविमुक्त कहा जाता है।
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