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यूरेनियम की राह: ऑस्ट्रेलिया समझौते से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नई मजबूती
भारत की स्थापित परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता अभी लगभग आठ गीगावाट है, जबकि 2047 तक इसे 100 गीगावाट का लक्ष्य पूरा करना है, जिसके लिए उसे यूरेनियम की जरूरत है। विश्व के ज्ञात यूरेनियम भंडार का करीब एक-तिहाई हिस्सा ऑस्ट्रेलिया के पास है और अब तक वह चीन, जापान, ताइवान और अमेरिका को यूरेनियम की आपूर्ति करता रहा है।
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प्रधानमंत्री मोदी और ऑस्ट्रेलियाई पीएम अल्बनीज
- फोटो :
ANI
प्रधानमंत्री मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच यूरेनियम आपूर्ति पर बनी सहमति बदलते वैश्विक सामरिक समीकरणों में भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता और स्वच्छ ऊर्जा आधारित विकास की दीर्घकालिक रणनीति के लिहाज से एक अहम उपलब्धि है। जिस देश ने कभी परमाणु अप्रसार के नाम पर भारत के साथ इस क्षेत्र में कोई संबंध रखने से इन्कार कर दिया था, वही आज उसे भरोसेमंद साझेदार मानते हुए उसके लिए अपने विशाल यूरेनियम भंडार खोल रहा है, तो यह भारत की विदेश नीति की एक बड़ी सफलता ही है। दरअसल, 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद कई देशों ने भारत पर व्यापक प्रतिबंध लगाए थे, जिससे भारत को यूरेनियम मिलना तकरीबन बंद ही हो गया था। अमेरिका के साथ नागरिक परमाणु समझौते के बाद भारत को यूरेनियम आयात करने की अनुमति मिली। 2014 में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच परमाणु समझौता हुआ, हालांकि यूरेनियम का निर्यात शुरू नहीं हो सका, जिस पर अब 12 वर्ष बाद सहमति बनी है। इस बीच, भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ती रहीं और बिजली की मांग का आने वाले वर्षों में भी बढ़ना तय है। दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन की चुनौती और 2070 तक नेट-शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य भारत को कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए बाध्य कर रहा है। ऐसे में, परमाणु ऊर्जा एक भरोसेमंद, स्वच्छ और दीर्घकालिक विकल्प के रूप में उभरी है। सौर व पवन ऊर्जा भी जरूरी हैं, पर उनकी उपलब्धता मौसम पर निर्भर करती है। जबकि, परमाणु ऊर्जा चौबीसों घंटे स्थिर बिजली उत्पादन में सक्षम है। भारत की स्थापित परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता अभी लगभग आठ गीगावाट है, जबकि 2047 तक इसे 100 गीगावाट का लक्ष्य पूरा करना है, जिसके लिए उसे यूरेनियम की जरूरत है। विश्व के ज्ञात यूरेनियम भंडार का करीब एक-तिहाई हिस्सा ऑस्ट्रेलिया के पास है और अब तक वह चीन, जापान, ताइवान और अमेरिका को यूरेनियम की आपूर्ति करता रहा है। अब भारत को इसमें शामिल करने की वजह दोनों देशों के बीच रिश्तों में आई प्रगाढ़ता को माना जा सकता है। दरअसल, दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती ताकत के मद्देनजर क्षेत्रीय संतुलन के समर्थक हैं और यही साझा इच्छा दोनों को नजदीक लाई है। बहरहाल, ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती देगा, पर स्थायी आत्मनिर्भरता के लिए आयातित यूरेनियम के साथ स्वदेशी थोरियम तकनीक, घरेलू परमाणु ईंधन चक्र और अनुसंधान को भी समान गति से आगे बढ़ाना होगा। तभी यह समझौता भारत की ऊर्जा संप्रभुता का आधार बन सकेगा।
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