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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Issue: The Himling may vanish, but Shiva will not; let faith remain undiminished.

मुद्दा: हिमलिंग अंतर्धान हो सकता है, शिव नहीं; आस्था में न आए कमी

Fri, 10 Jul 2026 08:33 AM IST
Pavan स्वामी अवधेशानंद गिरि
स्वामी अवधेशानंद गिरि Published by: Pavan Updated Fri, 10 Jul 2026 08:33 AM IST
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सार
भगवान भोलेनाथ केवल हिमलिंग में नहीं, बल्कि हिमालय के कण-कण, हर मंत्र, हर कदम और हर श्रद्धा में विराजमान हैं। इसलिए, यदि हिमलिंग पूर्ण न दिखे, तब भी आस्था में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
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Issue: The Himling may vanish, but Shiva will not; let faith remain undiminished.
बाबा अमरनाथ यात्रा। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

श्री अमरनाथ धाम केवल एक तीर्थ नहीं, अपितु सनातन भारत की तप परंपरा, वैराग्य, आत्मशुद्धि और शिव तत्व की सजीव अनुभूति का दिव्य केंद्र है। यहां पहुंचने वाला प्रत्येक श्रद्धालु केवल हिमालय की ऊंचाइयों की यात्रा नहीं करता, बल्कि अपने ही अंतःकरण की गहराइयों की ओर अग्रसर होता है। कभी-कभी प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण बाबा बर्फानी का हिमलिंग पूर्ण रूप में दिखाई नहीं देता अथवा अंतर्धान हो जाता है। ऐसे समय में, अनेक श्रद्धालुओं के मन में विषाद उत्पन्न होना स्वाभाविक है। किंतु, क्या शिव केवल हिमलिंग में ही सीमित हैं? क्या अनंत, अखंड, सर्वव्यापक महादेव किसी एक दृश्य रूप के अभाव से अप्रकट हो जाते हैं?


भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत की दृष्टि में परमात्मा नित्य, निराकार, सर्वव्यापक और अखंड चैतन्य है। वही परम शिव कभी हिमलिंग के रूप में दर्शन देते हैं, तो कभी हिमालय की निःशब्दता में, कभी गुफा की दिव्य शांति में, तो कभी श्रद्धालु के निर्मल हृदय में स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं। अतः जो अनंत है, उसे किसी एक दृश्य रूप तक सीमित नहीं किया जा सकता। हिमलिंग भगवान की करुणा का एक दिव्य प्रतीक है, परंतु शिव की सत्ता उससे कहीं अधिक व्यापक, असीम और सनातन है।


लोकश्रुति के अनुसार, माता पार्वती को अमरत्व का परम रहस्य सुनाने से पूर्व भोलेनाथ ने मार्ग में अपनी समस्त लौकिक विभूतियों (प्रतीकों) और आसक्तियों का परित्याग किया था। पहलगाम में उन्होंने अपने प्रिय वाहन नंदी को विराम दिया था। चंदनवाड़ी में मस्तक के चंद्र का त्याग, तो शेषनाग नामक जगह पर नागों का विसर्जन किया था। महागुणस पर्वत पर श्रीगणेश को विराम दिया। वहीं, पंचतरणी में पंचमहाभूतों के प्रतीकात्मक अतिक्रमण द्वारा समस्त देहाभिमान का अतिक्रमण किया था।

अमरनाथ की यात्रा पैरों से कम और अंतःकरण से अधिक की जाती है। जब श्रद्धालु भगवान अमरनाथ की उस पावन गुफा में प्रवेश करता है, तब वह केवल एक गुफा के सम्मुख नहीं, अपितु उस दिव्य तपोभूमि में उपस्थित होता है, जहां स्वयं देवाधिदेव भगवान मृत्युंजय महादेव ने आत्मा, ब्रह्म, जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म, मोक्ष और अमरत्व का परम रहस्य प्रकट किया था। भगवत्पाद शंकराचार्य विरचित शिवमानसपूजा बताती है कि महादेव की सर्वोच्च आराधना बाह्य सामग्री से नहीं, बल्कि निर्मल अंतःकरण से होती है। अमरनाथ यात्रा का वास्तविक संदेश यही है कि जीवन का प्रत्येक क्षण शिवमय बन जाए।

हिमलिंग अंतर्धान हो सकता है, लेकिन शिव नहीं। यदि हिमलिंग पूर्ण रूप में न दिखाई दे, तो भी श्रद्धा में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। जिसने उस दिव्य धाम तक पहुंचने का सौभाग्य पाया, जिसने कठिन मार्ग की तपस्या की, जिसने ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष करते हुए अपने भीतर के अहंकार को पिघलाया, वास्तव में वही शिव कृपा और उनके असीम अनुग्रह का अधिकारी है। शिव केवल हिमलिंग में नहीं, बल्कि हिमालय की प्रत्येक शिला में, गुफा की प्रत्येक श्वास में, यात्रियों के प्रत्येक कदम में, हर मंत्र में, भक्ति के प्रत्येक भाव में और प्रत्येक हृदय में विराजमान हैं। हिमलिंग का दर्शन महादेव का प्रसाद है, किंतु अमरनाथ की यात्रा स्वयं महादेव की कृपा का साक्षात अनुभव है। अतः स्मरण रहे कि शिव नित्य हैं, शाश्वत हैं, सर्वव्यापक हैं और श्रद्धा से परिपूर्ण प्रत्येक हृदय में सदैव प्रकाशित हैं।  edit@amarujala.com
 
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