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कभी खुश भी रहा करो: खुशी ही वह अंतिम लक्ष्य और सर्वोच्च उद्देश्य, जिसे मनुष्य ढूंढ़ रहा है
नंदितेश निलय, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Sat, 11 Apr 2026 07:13 AM IST
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सार
अगर खुश रहना एक सामाजिक प्रक्रिया है और ज्ञान की अवस्था है, तो फिर बम के धमाकों के बीच भी खुश रहा जा सकता है। मेरे-तुम्हारे के बीच भी, परीक्षाओं के परिणामों के बीच भी, अपने-परायों के इर्द-गिर्द भी।
खुशी
- फोटो : Freepik
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विस्तार
लेख की शुरुआत शैलेंद्र के उस गीत से, किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके, तो ले उधार... युद्ध और तमाम तरह की अस्थिरता के बीच फंसी अपने दुखों में सिमटी इस दुनिया को कोई कैसे सिखाए कि सिर्फ पैसा ही नहीं, बल्कि दुख भी उधार में लिया जा सकता है। उधारी का दुख किसी की मुस्कुराहट का हिस्सा बनने की संभावना तय कर सकता है। तो फिर बटोरिए दुख और पूछिए अपने आप से कि ऐसे समय में भला खुश कैसे रहा जाए? क्योंकि तमाम परेशानियों के बीच और भविष्य की असुरक्षा में फंसे लोग एक सुरक्षित व सुकून भरा जीवन ही तो ढूंढ़ रहे हैं। आखिर अरस्तू भी मानते थे कि खुशी वह अंतिम लक्ष्य और सर्वोच्च उद्देश्य है, जिसे मनुष्य ढूंढ़ रहा है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि खुशी किसी रील से निकली, या स्क्रॉल करती हुई अंगुलियों में फंसी कोई अनुभूति नहीं होती और न ही उस स्क्रीन से चिपकी आंखों की धुंधलाती चमक। खुशी तो हर वह चिंता भी होती है, जो अपने-अपनों को, इनको-उनको स्वस्थ और सुरक्षित देखने की आशा रखती है। जब यह दुनिया कोविड जैसी महामारी में फंसी थी, तो हर पल हम सभी जीवन-मृत्यु के बीच खुश रहने की सारी संभावना को समाप्त होते देख रहे थे, क्योंकि जब जीवन ही नहीं बचेगा, तो फिर क्या खुशी, क्या दुख! पर मनुष्य तो मनुष्य ठहरा! उसे पता था कि इस दुनिया को वह बचा सकता है, और उसने अपने आप को मास्क में ढककर दूसरे के लिए भी सोचा। कोई हॉस्पिटल में रुका, तो कोई दूध पहुंचाने पहुंचा। कोई ऑक्सीजन सिलिंडर को पटरियों पर लेकर दौड़ा, तो कोई वैक्सीन। कुछ ऐसा ही हर उस व्यक्ति के साथ हुआ, जिसने किसी न किसी की जान कोविड में बचाई और दुनिया सबसे अंधेरे दौर से निकलकर खुशी की रोशनी ढूंढ़ पाई।
अब्राहम मैस्लो, जो एक अग्रणी अमेरिकी मनोवैज्ञानिक रहे, ने ‘आवश्यकताओं के अपने पदानुक्रम या पिरामिड मॉडल’ से यह बताना चाहा कि हमारी खुशी या मोटिवेशन मुख्य रूप से उन पांच आवश्यकताओं की पूर्ति पर निर्भर है, जिनमें बुनियादी जरूरतें, सुरक्षा, जुड़ाव, सम्मान और आत्म-साक्षात्कार प्रमुख होते हैं। यह सुरक्षा और जुड़ाव का भाव इतना महत्वपूर्ण है कि कई बार हमें यह यकीन नहीं होता कि तमाम आर्थिक, सामाजिक व शैक्षणिक सीमाएं होने के बावजूद कोई कंचनबाई मेघवाल, जो एक आंगनबाड़ी सहायिका थीं, अपनी जान की परवाह किए बिना उन बच्चों की ओर दौड़ पड़ेंगी, जिनको डंक मारने के लिए मधुमक्खियां सैकड़ों की संख्या में पहुंच चुकी थीं। कंचनबाई सीमाएं तोड़, अपनी साड़ी से सभी बच्चों को ढक देती हैं, और अपनी जान खोकर भी सभी बच्चों की जान बचा लेती हैं। जान बचाना या जिंदगी देना उस खुशी या प्रेरणा का ही हिस्सा होता है, जो सामाजिक संबंधों, गिलिगन के ‘केयर’ और डार्विन के ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ के सिद्धांत को बुनता है।
अब्राहम मैस्लो यह भी बताते हैं कि खुश रहने के लिए एक-दूसरे को सुरक्षित रखने और जुड़ाव के भाव के साथ सम्मान व आत्म-साक्षात्कार का भाव भी होना चाहिए। आखिर खुशी ही वह मानवीय मूल्य है, जो हमें बार-बार यह याद दिलाता है कि आखिर हमारे जीवन का प्रयोजन क्या है। यह सवाल भी उठाता है कि हमारा आकलन सिर्फ उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए या उस सादगी, विनम्रता और सद्भाव के आधार पर भी, जहां कोई अपने घमंड, स्वार्थ या अपनी लालच को जीवन जीने का दर्शन नहीं बनाता। तभी तो, अगर इतिहासकार हरारी को यह लगता है कि एआई सुपर इंटेलिजेंट बनकर अपने आप फैसले लेगा, तो हाजी अख्तर भी मानो हरारी को बताना चाहते थे कि खुद्दारी के साथ जीना और दूसरों को उनका हक देकर खुश होने का भाव किसी चैटबॉट के पास नहीं हो सकता।
हमेशा की तरह, उस दिन भी हाजी अपना कबाड़ बीन रहे थे, तभी उन्हें एक बोरी मिलती है, जिसमें कबाड़ और स्क्रैप होता है और जो उनको पिछली दिवाली पर एक व्यापारी से मिला था। उधर उस व्यापारी को पता नहीं था कि उनके गहने सफाई के दौरान बोरी में ही चले गए थे। जब उन्हें वह गहने नहीं मिले, तो निश्चित ही उनके मन में तरह-तरह के सवाल उठे होंगे। पर हाजी अख्तर तो ऐसे थे, जैसे गहने कभी खोए ही नहीं थे। गहनों ने तो अपने आप को उनके पास महफूज रखा था। जिस दुनिया में किसी और के रुपये उठाने में कोई झिझक नहीं होती, वहां अगर सोने और चांदी मिल जाएं, जिनकी कीमतें आसमान छू रही हों, तब तो मैस्लो साहब भी यह मानेंगे कि बड़े-बड़े सूरमा भी सही फैसले लेने से चूक जाते हैं। लेकिन अपनी खुद्दारी और आत्म-सम्मान में हाजी नहीं चूके।
इस लेख को पढ़ते-पढ़ते शायद आपको भी महसूस होगा कि अच्छा होना और अच्छाई के भाव से सोचना, महसूस करना और जीना ही खुश रहने का वह गुण है, जिसमें सभी की खुशी की संभावना बनती है। अगर खुशी का संबंध अच्छाई से है, तो खुशी सिर्फ और सिर्फ अच्छे इन्सान के मोहल्ले में ही रहती है और भाईचारे के साथ सभी के जीवन में एक आशा संजोए रहती है। यह न भूलें कि खुश रहना भी एक मौलिक अधिकार है। पर जब एक गलत आचरण लिए व्यक्ति खुश रहता है, तो किसी भी समाज के लिए खुशी का स्वरूप ही बदल जाता है। वह मानवीय कम और कुछ वस्तु के माफिक बनने लगती है। फिर मनुष्य वस्तु बन उस खुशी पर ग्रहण लगा देता है। आखिर कवि नरेश सक्सेना जी ने ठीक ही कहा है कि चीजों के गिरने के नियम होते हैं, पर मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते। इसलिए खुशी का अभिनंदन तो तब है, जब अच्छाई के साथ इसको अपने जीवन में उतारा जाए। और आज के दौर में अपने वर्तमान और भविष्य की पीढ़ी के लिए यही हमारी जिम्मेदारी भी है।
समय यह प्रश्न बार-बार पूछेगा कि हमने अपने आप को कितना बेहतर इन्सान बनाया, अपने आसपास के सदस्यों के दुख-दर्द में कितनी हिस्सेदारी की, कितना उनको सुनना और समझना चाहा! अगर खुश रहना एक सामाजिक प्रक्रिया है और ज्ञान की अवस्था है, तो फिर बम के धमाकों के बीच भी खुश रहा जा सकता है। मेरे-तुम्हारे के बीच भी, परीक्षाओं के परिणामों के बीच भी, अपने-परायों के इर्द-गिर्द भी। ऐसे में, शैलेंद्र को भी गुनगुनाया जा सकता है, क्योंकि जो दूसरों का दुख महसूस कर सकता है, वही वास्तविक ज्ञानी है। और तभी खुश रहने की संभावना बढ़ती है, क्योंकि खुशी एक सामूहिक मूल्य है। गुलजार साहब की उस सलाह से, मुस्कुराते बहुत हो तुम, कभी खुश भी रहा करो।
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अब्राहम मैस्लो, जो एक अग्रणी अमेरिकी मनोवैज्ञानिक रहे, ने ‘आवश्यकताओं के अपने पदानुक्रम या पिरामिड मॉडल’ से यह बताना चाहा कि हमारी खुशी या मोटिवेशन मुख्य रूप से उन पांच आवश्यकताओं की पूर्ति पर निर्भर है, जिनमें बुनियादी जरूरतें, सुरक्षा, जुड़ाव, सम्मान और आत्म-साक्षात्कार प्रमुख होते हैं। यह सुरक्षा और जुड़ाव का भाव इतना महत्वपूर्ण है कि कई बार हमें यह यकीन नहीं होता कि तमाम आर्थिक, सामाजिक व शैक्षणिक सीमाएं होने के बावजूद कोई कंचनबाई मेघवाल, जो एक आंगनबाड़ी सहायिका थीं, अपनी जान की परवाह किए बिना उन बच्चों की ओर दौड़ पड़ेंगी, जिनको डंक मारने के लिए मधुमक्खियां सैकड़ों की संख्या में पहुंच चुकी थीं। कंचनबाई सीमाएं तोड़, अपनी साड़ी से सभी बच्चों को ढक देती हैं, और अपनी जान खोकर भी सभी बच्चों की जान बचा लेती हैं। जान बचाना या जिंदगी देना उस खुशी या प्रेरणा का ही हिस्सा होता है, जो सामाजिक संबंधों, गिलिगन के ‘केयर’ और डार्विन के ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ के सिद्धांत को बुनता है।
अब्राहम मैस्लो यह भी बताते हैं कि खुश रहने के लिए एक-दूसरे को सुरक्षित रखने और जुड़ाव के भाव के साथ सम्मान व आत्म-साक्षात्कार का भाव भी होना चाहिए। आखिर खुशी ही वह मानवीय मूल्य है, जो हमें बार-बार यह याद दिलाता है कि आखिर हमारे जीवन का प्रयोजन क्या है। यह सवाल भी उठाता है कि हमारा आकलन सिर्फ उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए या उस सादगी, विनम्रता और सद्भाव के आधार पर भी, जहां कोई अपने घमंड, स्वार्थ या अपनी लालच को जीवन जीने का दर्शन नहीं बनाता। तभी तो, अगर इतिहासकार हरारी को यह लगता है कि एआई सुपर इंटेलिजेंट बनकर अपने आप फैसले लेगा, तो हाजी अख्तर भी मानो हरारी को बताना चाहते थे कि खुद्दारी के साथ जीना और दूसरों को उनका हक देकर खुश होने का भाव किसी चैटबॉट के पास नहीं हो सकता।
हमेशा की तरह, उस दिन भी हाजी अपना कबाड़ बीन रहे थे, तभी उन्हें एक बोरी मिलती है, जिसमें कबाड़ और स्क्रैप होता है और जो उनको पिछली दिवाली पर एक व्यापारी से मिला था। उधर उस व्यापारी को पता नहीं था कि उनके गहने सफाई के दौरान बोरी में ही चले गए थे। जब उन्हें वह गहने नहीं मिले, तो निश्चित ही उनके मन में तरह-तरह के सवाल उठे होंगे। पर हाजी अख्तर तो ऐसे थे, जैसे गहने कभी खोए ही नहीं थे। गहनों ने तो अपने आप को उनके पास महफूज रखा था। जिस दुनिया में किसी और के रुपये उठाने में कोई झिझक नहीं होती, वहां अगर सोने और चांदी मिल जाएं, जिनकी कीमतें आसमान छू रही हों, तब तो मैस्लो साहब भी यह मानेंगे कि बड़े-बड़े सूरमा भी सही फैसले लेने से चूक जाते हैं। लेकिन अपनी खुद्दारी और आत्म-सम्मान में हाजी नहीं चूके।
इस लेख को पढ़ते-पढ़ते शायद आपको भी महसूस होगा कि अच्छा होना और अच्छाई के भाव से सोचना, महसूस करना और जीना ही खुश रहने का वह गुण है, जिसमें सभी की खुशी की संभावना बनती है। अगर खुशी का संबंध अच्छाई से है, तो खुशी सिर्फ और सिर्फ अच्छे इन्सान के मोहल्ले में ही रहती है और भाईचारे के साथ सभी के जीवन में एक आशा संजोए रहती है। यह न भूलें कि खुश रहना भी एक मौलिक अधिकार है। पर जब एक गलत आचरण लिए व्यक्ति खुश रहता है, तो किसी भी समाज के लिए खुशी का स्वरूप ही बदल जाता है। वह मानवीय कम और कुछ वस्तु के माफिक बनने लगती है। फिर मनुष्य वस्तु बन उस खुशी पर ग्रहण लगा देता है। आखिर कवि नरेश सक्सेना जी ने ठीक ही कहा है कि चीजों के गिरने के नियम होते हैं, पर मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते। इसलिए खुशी का अभिनंदन तो तब है, जब अच्छाई के साथ इसको अपने जीवन में उतारा जाए। और आज के दौर में अपने वर्तमान और भविष्य की पीढ़ी के लिए यही हमारी जिम्मेदारी भी है।
समय यह प्रश्न बार-बार पूछेगा कि हमने अपने आप को कितना बेहतर इन्सान बनाया, अपने आसपास के सदस्यों के दुख-दर्द में कितनी हिस्सेदारी की, कितना उनको सुनना और समझना चाहा! अगर खुश रहना एक सामाजिक प्रक्रिया है और ज्ञान की अवस्था है, तो फिर बम के धमाकों के बीच भी खुश रहा जा सकता है। मेरे-तुम्हारे के बीच भी, परीक्षाओं के परिणामों के बीच भी, अपने-परायों के इर्द-गिर्द भी। ऐसे में, शैलेंद्र को भी गुनगुनाया जा सकता है, क्योंकि जो दूसरों का दुख महसूस कर सकता है, वही वास्तविक ज्ञानी है। और तभी खुश रहने की संभावना बढ़ती है, क्योंकि खुशी एक सामूहिक मूल्य है। गुलजार साहब की उस सलाह से, मुस्कुराते बहुत हो तुम, कभी खुश भी रहा करो।