सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Myanmar situation Millions of people displaced and poverty increasing rapidly

म्यांमार के संकटों का कोई अंत है? लाखों लोग विस्थापित और तेजी से बढ़ रही गरीबी

K S Tomar केएस तोमर
Updated Sat, 11 Apr 2026 07:18 AM IST
विज्ञापन
सार

म्यांमार की मौजूदा स्थितियों से साफ होता है कि स्थिरता लाने का सेना का प्रयास उल्टा भी पड़ सकता है और म्यांमार लंबे समय तक एक अंतहीन संघर्ष के चक्र में फंसा रह सकता है।

Myanmar situation Millions of people displaced and poverty increasing rapidly
म्यांमार - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार

पश्चिम एशिया में बढ़ती उथल-पुथल के बीच म्यांमार की ओर दुनिया का ध्यान नहीं ही गया। यह मुद्दा वैश्विक बहस में दबकर रह गया। यह सेना (जुंटा) के लिए फायदे का सौदा बन गई और जुंटा प्रमुख मिन आंग ह्लाइंग म्यांमार के नए राष्ट्रपति बन गए। दरअसल, सेना द्वारा बनाए गए सख्त कानूनों के चलते लगभग सभी भरोसेमंद विपक्षी दलों को या तो चुनाव से बाहर कर दिया गया या उन्हें खुद ही हटने पर मजबूर होना पड़ा। इससे सेना के ‘लोकतांत्रिक’ दावे खोखले साबित होते हैं और जनता के अलगाव को और ही गहरा करते हैं।
Trending Videos


दल-बदल, गिरते मनोबल और स्थानीय विद्रोहियों और अनियमित बलों पर बढ़ती निर्भरता की खबरें सेना के भीतर तनाव का इशारा करती हैं, भले ही नव निर्वाचित राष्ट्रपति केंद्रीकृत नियंत्रण बनाए रखने का प्रयास करें। बीजिंग पर अत्यधिक निर्भरता भी म्यांमार की रणनीतिक स्वायत्तता को कम करने के साथ घरेलू असंतोष को जन्म दे सकती है। म्यांमार में लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं और गरीबी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में, नए राष्ट्रपति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह जनता की जरूरतों को पूरा करने और उनका भरोसा जीतने का काम कैसे करेंगे। हालांकि, नियंत्रित राजनीतिक प्रक्रियाओं के जरिये स्थिरता लाने का सेना का प्रयास उल्टा भी पड़ सकता है। इससे हालात और बिगड़ने का खतरा है तथा म्यांमार लंबे समय तक एक अंतहीन संघर्ष के चक्र में फंसा रह सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


भारत के लिए म्यांमार संकट तात्कालिक, बहुआयामी और गंभीर परिणामों वाला है। म्यांमार की सीमा भारत के संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्यों से होकर गुजरती है। 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद से अब तक करीब 31,000 शरणार्थी मिजोरम में आ चुके हैं। साथ ही, सीमा पार हथियारों की तस्करी और नशीले पदार्थों का कारोबार भी बढ़ा है। म्यांमार भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का अहम हिस्सा है और पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने वाली योजनाओं का मुख्य केंद्र भी। वहां जारी आंतरिक संघर्ष ‘कलादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट’ जैसी बड़ी परियोजनाओं के लिए खतरा बन रहा है। सशस्त्र प्रतिरोध समूह, जिनमें पीपुल्स डिफेंस फोर्सेज और विभिन्न जातीय सशस्त्र संगठन शामिल हैं, जुंटा को कड़ी चुनौती दे रहे हैं। 2023 में ‘थ्री ब्रदरहुड अलायंस’ द्वारा शुरू किया गया ‘ऑपरेशन 1027’ इसका बड़ा निर्णायक मोड़ साबित हुआ। म्यांमार का चीन के प्रति बढ़ता झुकाव भी भारत के लिए रणनीतिक संतुलन बनाए रखने और क्षेत्रीय भूमिका को सीमित करने का खतरा पैदा करता है।

नई दिल्ली को एक संतुलित व व्यावहारिक रणनीति अपनानी होगी। एक ओर उसे नए राष्ट्रपति के साथ कामकाजी संबंध बनाए रखने होंगे, तो दूसरी ओर जातीय समूहों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से भी सतत संवाद जारी रखना होगा। उसे म्यांमार की स्थिति को दूरस्थ समस्या के रूप में देखने के बजाय अपनी आंतरिक सुरक्षा के विस्तार के रूप में समझना होगा। भारत के सामने असली सवाल यह नहीं है कि म्यांमार एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह अगला चरण उसकी पूर्वी सीमाओं पर दीर्घकालिक अस्थिरता को बढ़ावा देगा।

 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed