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सख्त संदेश: मेरठ में सुप्रीम कोर्ट का आदेश महज प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि निर्णायक हस्तक्षेप
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Sat, 11 Apr 2026 06:57 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
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ANI
विस्तार
उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित शास्त्री नगर के सेंट्रल मार्केट में अवैध निर्माणों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को महज प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में नहीं, बल्कि ‘कानून के शासन’ की पुनः स्थापना की दिशा में एक निर्णायक हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जाना चाहिए। इसे स्थानीय स्तर पर फैली अव्यवस्था और अनियंत्रित शहरीकरण पर अंकुश लगाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसमें पूरे देश के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि नियमों की अनदेखी कर खड़े किए गए ढांचे बर्दाश्त नहीं किए जा सकते।उल्लेखनीय है कि देश के अधिकांश शहरों में अनधिकृत निर्माण एक गंभीर और पुरानी समस्या रही है। बढ़ती आबादी का दबाव, भूमि की बढ़ती कीमतें और नियोजन की कमजोरियों के बीच अक्सर लोग और व्यावसायिक प्रतिष्ठान नियमों को दरकिनार कर निर्माण कर लेते हैं। कई बार यह सब प्रशासन की मिलीभगत या उसकी निष्क्रियता के कारण संभव हो पाता है। ऐसे में, न्यायपालिका का हस्तक्षेप पूरे तंत्र को आईना दिखाने जैसा है। ताजा मामला रिहायशी प्लॉटों को बिना अनुमति के व्यावसायिक जगहों में बदलने और अधिकारियों द्वारा उनके खिलाफ कार्रवाई न करने से जुड़ा है। अदालत ने न सिर्फ मेरठ विकास प्राधिकरण और आवास विकास परिषद की लापरवाही पर नाराजगी जताते हुए फटकार लगाई, बल्कि कुल 859 अवैध सेटबैक (जरूरी खुली जगह) निर्माणों को ध्वस्त करने का आदेश दिया।
अदालत ने उचित ही कहा कि प्रशासन की लापरवाही के कारण ही अवैध निर्माण इतने बड़े स्तर पर बढ़े हैं, जिसे रोकने के लिए सख्त कार्रवाई जरूरी है। कोर्ट का यह कहना भी बिल्कुल दुरुस्त है कि किसी की जिंदगी की कीमत पर व्यवसाय नहीं चल सकता। बेशक सील संपत्तियों में अवैध तरीके से चल रहे छह स्कूल, छह अस्पताल, आदि के कामकाज प्रभावित होंगे, पर अगर इन्हें जुर्माना वसूल कर वैध ठहराया जाएगा, तो पूरे देश में अराजकता फैल सकती है। चूंकि, पूरे देश में अवैध निर्माण हो रहे हैं, इसलिए इन्हें हतोत्साहित करना स्वागतयोग्य कदम है। अवैध निर्माण से न केवल सुनियोजित विकास के नियम का उल्लंघन होता है, बल्कि कानून के राज के समानांतर एक भ्रष्ट तंत्र को पनपने का भी अवसर मिलता है। अदालत के इस फैसले से न केवल अवैध एवं अनधिकृत निर्माण करने वाले व्यवसायियों को सबक मिलेगा, बल्कि आवासीय परिसर एवं नगरों के सुनियोजित विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। लेकिन यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति और नागरिक सहयोग के बगैर शायद ही संभव हो।