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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Havoc wreaked by the heatwave in Europe has shattered all illusions; the climate crisis knows no borders.

मुद्दा: यूरोप में हीटवेव के कहर ने तोडे़ सभी भ्रम, जलवायु संकट सीमाओं को नहीं पहचानता

Tue, 30 Jun 2026 08:27 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Tue, 30 Jun 2026 08:27 AM IST
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सार
यूरोप में हीटवेव का कहर इस भ्रम को तोड़ता है कि जलवायु परिवर्तन विकासशील देशों की ही समस्या है। क्या भारत और यूरोप प्रकृति के संकेतों को समझेंगे?
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Havoc wreaked by the heatwave in Europe has shattered all illusions; the climate crisis knows no borders.
जलवायु संकट सीमाओं को नहीं पहचानता - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

इस हफ्ते, फ्रांस के स्टोरों के अंदर लोगों के बीच हुए झगड़ों की तस्वीरें अविश्वसनीय-सी लग रही थीं, जहां खरीदार पंखों और एयर कंडीशनर के लिए हाथापाई कर रहे थे। दशकों तक, भीषण गर्मी (हीटवेव) की कहानियां अमूमन विकासशील देशों से ही जुड़ी मानी जाती थीं। लेकिन अब, भारत की तरह ब्रिटेन और फ्रांस में भी जून महीने के गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूट रहे हैं। तस्वीरें बताती हैं कि जब अस्तित्व दांव पर हो, तो ‘विकसित’ और ‘विकासशील’ देशों की प्रतिक्रियाओं में फर्क समाप्त हो जाता है।


यूरोप की परेशानी उसकी अपनी ही बनावट की वजह से और बढ़ गई है। सर्दियों में गर्मी बनाए रखने के लिए बनाए गए घरों में अब गर्मियों में लोग तपने लगे हैं। स्कूलों में एयर कंडीशनर नहीं हैं, अस्पतालों में वार्ड बहुत ज्यादा गर्म हो जाते हैं, और नीति-निर्माता अब भी भीषण गर्मी को सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में आपदा’ के बजाय एक अस्थायी समस्या ही मान रहे हैं। लोग टेबल फैन खरीदने के लिए ऐसे लाइन में लगे थे, जैसे कोई जीवनरक्षक किट वितरित की जा रही हो। ब्रिटेन और फ्रांस से भी भीषण गर्मी की खबरें मिल रही हैं।


भारत इस हकीकत को बहुत अच्छी तरह जानता है, जहां चालीस से पैंतालीस डिग्री सेल्सियस की गर्मी कोई अपवाद नहीं, बल्कि हर साल होने वाली एक परीक्षा है। जरूरत के चलते, भारतीय शहरों ने हीट एक्शन प्लान तैयार किए हैं, जिनमें समय पर चेतावनी, जन-जागरूकता अभियान, स्वास्थ्यकर्मियों की ट्रेनिंग, काम के घंटों में बदलाव और कूल रूफ व शहरी हरियाली जैसे सरल बुनियादी उपाय शामिल हैं। 2010 की भीषण गर्मी, जिसमें 1,300 से अधिक लोगों की जान गई थी, के बाद अहमदाबाद ने जो हीट एक्शन प्लान तैयार किया, उसे हजारों लोगों की जान बचाने का श्रेय दिया जाता है। कई अन्य शहरों में भी कूलिंग सेंटर, पीने के पानी की व्यवस्था, छायादार सार्वजनिक स्थान, परावर्तक सतहों और दोपहर की तेज धूप में घर के भीतर रहने जैसी व्यावहारिक सलाहों को अपनाया गया है। ये उपाय अपेक्षाकृत सस्ते, व्यावहारिक और समुदाय-केंद्रित हैं। ये बताते हैं कि हर समाधान महंगी तकनीक से नहीं आता, कई बार जागरूकता, छाया और पानी ही सबसे प्रभावी सुरक्षा उपाय बन जाते हैं।

हालांकि, भारत में बहुत-सी योजनाएं सिर्फ कागजी दिशानिर्देश बनकर रह गई हैं। बच्चे, बुजुर्ग और खुले में काम करने वाले मजदूर जैसे सबसे संवेदनशील वर्गों की पहचान तो की जाती है, लेकिन उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिल पाती। अलग-अलग राज्यों में इन योजनाओं के क्रियान्वयन का स्तर भी काफी भिन्न है।

दूसरी ओर, यूरोप और ब्रिटेन के पास संसाधन हैं, लेकिन अनुभव की कमी है। फिर भी, यूरोप के पास कुछ ऐसी खूबियां हैं, जिनसे भारत सीख सकता है। वहां विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुरूप हीट-हेल्थ एक्शन फ्रेमवर्क, बेहतर अस्पताल और बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे में बदलाव करने की क्षमता मौजूद है। जहां भारत सीमित संसाधनों के बीच व्यावहारिक समाधान खोजता है, वहीं यूरोप उन समाधानों को संस्थागत रूप देकर स्थायी व्यवस्था में बदल सकता है।

ब्रिटेन में पड़ रही अत्यधिक गर्मी, फ्रांस में पंखों के लिए लगी लंबी कतारें और जर्मनी के तपते स्कूल बताते हैं कि केवल आर्थिक समृद्धि किसी समाज को सुरक्षित नहीं बना सकती। दोनों पक्षों के पास कुछ ऐसा है, जो दूसरे के पास नहीं है। देशों को सीमाओं से परे जाकर एक-दूसरे से सीखने के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि जलवायु परिवर्तन किसी सीमा को नहीं पहचानता।

जब फ्रांस और यूरोप का बड़ा हिस्सा खतरनाक गर्मी से जूझ रहा है, तो मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सबसे ज्यादा खतरा बेघर लोगों को है। भारत में भी सबसे ज्यादा जोखिम उन लोगों को है, जो चिलचिलाती गर्मी में बाहर काम करते हैं और असंगठित क्षेत्र का हिस्सा हैं। फ्रांस के स्टोर में होने वाली लड़ाइयां, ब्रिटेन की दुकानों में लगी लाइनें, भारत में हालात के हिसाब से किए जाने वाले जुगाड़, ये सब एक ही कहानी का हिस्सा हैं।

यह उन समाजों की कहानी है, जो ऐसे मौसम के लिए तैयार नहीं थे, जो पहले ही आ चुका है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि क्या यूरोप भारत से या भारत यूरोप से कुछ सीख सकता है। असल मुद्दा तो यह है कि क्या दोनों प्रकृति के संकेतों को तेजी से सीख सकते हैं, जिनके बारे में वैज्ञानिक लंबे समय से हमें चेतावनी देते आ रहे हैं। - edit@amarujala.com
 
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