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संस्थागत सुधार: व्यवस्था का उद्देश्य अभिलेखीय क्षमता को सुदृढ़ बनाना हो, ताकि नागरिकता पर कोई विवाद ही न रहे

Tue, 30 Jun 2026 08:41 AM IST
Harbansh Dixit हरबंश दीक्षित
Updated Tue, 30 Jun 2026 08:41 AM IST
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सार
अब समय आ गया है कि भारत नागरिकता के प्रश्न को विवाद की नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार की दृष्टि से देखे। इसका उद्देश्य किसी नागरिक को संदेह के घेरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि राज्य की अभिलेखीय क्षमता को इतना सुदृढ़ बनाना होना चाहिए कि नागरिकता का प्रश्न अपवाद बने, सामान्य स्थिति नहीं।
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Institutional Reform: objective of system should be to strengthen archival capacity, citizenship dispute
अमर उजाला - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

कभी-कभी कोई प्रशासनिक स्पष्टीकरण अनायास ही किसी राष्ट्र के आत्मबोध से जुड़ा प्रश्न खड़ा कर देता है। विदेश मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट किया जाना कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम अथवा निर्णायक प्रमाणपत्र नहीं है, ऐसा ही एक अवसर है। यह कथन विधिक दृष्टि से भले असाधारण न हो, किंतु लोकतांत्रिक मानस में इसने एक स्वाभाविक जिज्ञासा उत्पन्न कर दी है कि यदि पासपोर्ट भी भारतीय होने का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो फिर वह क्या है, जिसके आधार पर भारतीय राज्य अपने नागरिक को पहचानता है और नागरिक स्वयं को भारतीय कहने का नैतिक और वैधानिक आश्वासन प्राप्त करता है?


यह प्रश्न आज इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि आधुनिक राज्य की सबसे बड़ी शक्ति उसके शस्त्रागार में नहीं, बल्कि उसकी अभिलेखीय स्मृति में निहित होती है। राज्य अपने नागरिकों को पहचानता कैसे है? क्या वह उन्हें उनके जीवन-वृत्त, जन्म, परिवार, सामाजिक उपस्थिति और सार्वजनिक सहभागिता के माध्यम से जानता है, अथवा उनसे समय-समय पर यह अपेक्षा करता है कि वे स्वयं ही अपने अस्तित्व का प्रमाण प्रस्तुत करें?


भारतीय संविधान के निर्माताओं ने नागरिकता को केवल प्रशासनिक विषय नहीं माना था। संविधान का भाग-II भारत के लिए नागरिकता प्रावधानों से संबंधित है, जिसके अंतर्गत अनुच्छेद पांच से ग्यारह तक की व्यवस्था वस्तुतः विभाजन की त्रासदी, विस्थापन की पीड़ा और नवोदित गणराज्य की आशाओं के बीच एक राजनीतिक समुदाय के पुनर्निर्माण का दस्तावेज है। संविधान निर्माताओं ने यह समझ लिया था कि भारत की नागरिकता किसी एक रक्तरेखा, भाषा, पंथ या नस्ल पर आधारित नहीं हो सकती।

अनुच्छेद 11 के अंतर्गत संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 बनाया। इस अधिनियम ने नागरिकता अर्जित करने के विभिन्न आधार निर्धारित किए, जैसे-जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीयकरण और क्षेत्रीय विलय। किंतु, स्वतंत्र भारत की विधिक यात्रा का एक रोचक तथ्य यह है कि सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भारत ऐसा कोई एक दस्तावेज विकसित नहीं कर पाया है, जिसे नागरिकता का सार्वभौमिक और अंतिम प्रमाणपत्र कहा जा सके।

हमारे पास पासपोर्ट है, मतदाता पहचान पत्र है, आधार है, पैन है, जन्म प्रमाणपत्र है, विद्यालयी अभिलेख हैं, भूमि के कागजात हैं, परंतु इनमें से कोई भी स्वयं में नागरिकता का अंतिम साक्ष्य नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य भ्रमित है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि भारतीय नागरिकता की अवधारणा मूलतः दस्तावेजों के योग से अधिक एक विधिक निष्कर्ष है। किंतु, लोकतांत्रिक दृष्टि से यह स्थिति कुछ प्रश्न भी उत्पन्न करती है।

पासपोर्ट सामान्य भारतीय के लिए राज्य की सबसे प्रतिष्ठित स्वीकृतियों में से एक है। उसके निर्गमन से पहले विस्तृत सत्यापन होता है। विदेश में वही दस्तावेज व्यक्ति की भारतीय पहचान का प्रतिनिधित्व करता है। यदि उसके बाद भी नागरिकता का प्रश्न खुला रह सकता है, तो यह आवश्यक हो जाता है कि नागरिकता के प्रमाणन की भारतीय व्यवस्था पर नए सिरे से विचार किया जाए।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी नागरिकता के प्रश्न को केवल कागजी विवाद नहीं माना है। सर्बानंद सोनोवाल बनाम भारत संघ (2005) मामले में न्यायालय ने अवैध प्रवासन को गंभीर राष्ट्रीय चुनौती माना। वहीं चकमा समुदाय से जुड़े मामलों में न्यायालय ने राज्य को यह स्मरण कराया कि विधिक प्रक्रिया की कठोरता मानवीय गरिमा के प्रति असंवेदनशील नहीं हो सकती। असम की राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) प्रक्रिया ने हमें यह अनुभव भी कराया कि जब राज्य की अभिलेखीय स्मृति अपूर्ण होती है, तब उसका भार अंततः साधारण नागरिक के कंधों पर आ जाता है। कई लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए दशकों पुराने दस्तावेजों की तलाश करनी पड़ी, जबकि अनेक परिवारों की अलग-अलग पीढ़ियां प्रशासनिक निर्णयों में असंगति के कारण भिन्न-भिन्न निष्कर्षों और कठिनाइयों का सामना करती रहीं। इससे एक मौलिक प्रश्न खड़ा हुआ कि क्या लोकतंत्र का आदर्श नागरिक वह है, जिसे अपने ही देश में अपने अस्तित्व का प्रमाण बार-बार प्रस्तुत करना पड़े?

अन्य देशों के अनुभव इस संदर्भ में विचारणीय हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और कनाडा ने नागरिकता की अभिलेखीय संरचना को अपेक्षाकृत अधिक व्यवस्थित बनाया है। वहां जन्म पंजीकरण लगभग सार्वभौमिक है और नागरिकता प्रमाणन के औपचारिक साधन उपलब्ध हैं। भारत की परिस्थितियां इन देशों से भिन्न हैं। यहां विशाल जनसंख्या, ऐतिहासिक विस्थापन, सीमावर्ती प्रवासन और सामाजिक विषमताएं प्रशासनिक जटिलताओं को बढ़ाती हैं। किंतु, यही कारण है कि भारत को नागरिकता के प्रश्न पर अधिक संवेदनशील और सुसंगत व्यवस्था विकसित करनी होगी।

नागरिकता का प्रश्न दस्तावेजों का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास का है। एक आत्मविश्वासी गणराज्य अपने नागरिकों के प्रति विश्वास का भाव रखता है। वह अपने अभिलेखों को इतना सक्षम बनाता है कि नागरिक स्वयं को राज्य की शंकाओं के बीच नहीं, उसकी स्मृति और संरक्षण के भीतर अनुभव करें। इक्कीसवीं शताब्दी के डिजिटल लोकतंत्र में आदर्श स्थिति यह नहीं कि नागरिक अपने दस्तावेज लेकर राज्य के समक्ष उपस्थित हों; बल्कि यह है कि राज्य के अभिलेख स्वयं नागरिक के अधिकारों के विश्वसनीय संरक्षक बन जाएं।

अब समय आ गया है कि भारत नागरिकता के प्रश्न को विवाद की नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार की दृष्टि से देखे। जिस प्रकार भू-अभिलेखों, कंपनी पंजीकरण और जनगणना के लिए समेकित राष्ट्रीय प्रणालियां विकसित की गई हैं, उसी प्रकार एक राष्ट्रीय नागरिकता अभिलेख पर भी विचार किया जा सकता है। यह व्यवस्था नागरिकों पर नए प्रमाण प्रस्तुत करने का अतिरिक्त बोझ डालने के बजाय, राज्य के पास उपलब्ध जन्म पंजीकरण, नागरिकता संबंधी अभिलेखों, न्यायिक आदेशों और अन्य वैधानिक स्रोतों के आधार पर स्वतः तैयार हो तथा समय-समय पर अद्यतन होती रहे। ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य किसी नागरिक को संदेह के घेरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि राज्य की अभिलेखीय क्षमता को इतना सुदृढ़ बनाना होना चाहिए कि नागरिकता का प्रश्न अपवाद बने, सामान्य स्थिति नहीं।
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