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सेहत पर संकट: देश में तेजी से बढ़ रही हैं जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां, रणनीतियों में बदलाव लाने की है जरूरत

अमर उजाला Published by: Pavan Updated Thu, 23 Apr 2026 08:28 AM IST
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सार
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय का ताजा सर्वेक्षण देश के स्वास्थ्य परिदृश्य की एक गंभीर व चिंताजनक तस्वीर पेश करता है। चिकित्सा सुविधाएं बेहतर होने से मृत्यु दर में तो कमी आई है, पर सेहत संबंधी खतरों के बदलते स्वरूप को देखते हुए इनसे निपटने के लिए जरूरी रणनीतियों में बदलाव लाने की जरूरत है।
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Health crisis: Lifestyle diseases are increasing rapidly in the country, there is a need to change strategies
सेहत पर संकट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के ताजा सर्वेक्षण का यह निष्कर्ष कि देश में संक्रामक रोगों के मुकाबले जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़कर अब करीब आधी आबादी को प्रभावित कर रही हैं, चिंताजनक तो है ही, देश के स्वास्थ्य परिदृश्य में एक व्यापक बदलाव का भी द्योतक है। यह आंकड़ा एक दशक पहले के 31 से बढ़कर अब यदि 50 फीसदी तक जा पहुंचा है, तो इसका अर्थ ही है कि देश में स्वास्थ्य संकट चुपचाप, लेकिन तेजी से गहराता जा रहा है।


दरअसल, मोटापा, हृदय रोग, मधुमेह इत्यादि जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां ज्यादातर खान-पान, तनाव, शारीरिक निष्क्रियता, नींद की कमी और आनुवंशिक कारणों से पैदा होती हैं, जो व्यक्तिगत परेशानी बढ़ाने के साथ-साथ देश की उत्पादकता और आर्थिक विकास को भी नुकसान पहुंचाती हैं। सर्वे में शामिल हर आठ में से एक व्यक्ति, यानी करीब 13 फीसदी लोग ऐसे थे, जो पिछले 15 दिनों में किसी न किसी वजह से बीमार पड़े, जबकि 2017-18 में हुए सर्वे में यह आंकड़ा करीब सात फीसदी ही था।


जाहिर है कि पिछले सात-आठ वर्षों में लोगों में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ी हैं। इसकी पुष्टि द लैंसेट में प्रकाशित एक नए अध्ययन से भी होती है। इसके अनुसार, 2023 तक, भारत में मृत्यु के प्रमुख कारण के तौर पर जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों ने संक्रामक रोगों को पीछे छोड़ दिया है। बेशक स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर होने से मृत्यु दर में कमी से जीवन प्रत्याशा बढ़ी है, पर स्वास्थ्य खतरों का स्वरूप बदल गया है; लिहाजा इन खतरों से निपटने के लिए आवश्यक रणनीतियां भी बदलने की जरूरत है।

एनएसओ के सर्वे के अनुसार, पिछले करीब एक दशक में सरकार द्वारा प्रायोजित स्वास्थ्य बीमा का प्रसार बढ़कर ग्रामीण आबादी का 47 फीसदी और शहरी आबादी का 44 फीसदी हो गया है, जो 2017-18 में क्रमश: करीब 14 और 19 फीसदी था। यही नहीं, बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण इलाज के लिए जेब से सीधे खर्च में थोड़ी कमी भी आई है, लेकिन अब भी यह इतनी ज्यादा है कि कई लोग अचानक स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थितियों के कारण उपचार के बाद भारी कर्ज में डूब जाते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि नियमित जांच से मृत्यु दर और भविष्य में इलाज पर होने वाले खर्च को भी कम किया जा सकता है।

हालांकि, अब कुछ बीमा कंपनियां पॉलिसी में निवारक देखभाल से जुड़े लाभों को शामिल कर रही हैं, पर अधिकांश कंपनियां ऐसा नहीं करतीं। इसलिए स्वास्थ्य बीमा में निवारक स्वास्थ्य देखभाल को भी अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। स्वस्थ नागरिकों के बूते ही विकसित भारत का स्वप्न साकार हो सकता है, इसलिए स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए बीमारी होने पर इलाज करने के बजाय पहले से रोकथाम, नियमित जांच, और पूरी स्वास्थ्य प्रणाली पर ध्यान देना होगा। साथ ही, लोगों को भी व्यक्तिगत स्तर पर स्वस्थ जीवनशैली को अपनाना होगा।
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