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आखिर चांदी क्यों चौंका रही है: तकनीक और भू-राजनीति के संगम से रचा इतिहास
ऋषभ मिश्रा, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Wed, 22 Apr 2026 07:32 AM IST
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सार
चांदी ने पिछले 12 महीनों में करीब 180 फीसदी की छलांग लगाकर चौंकाया है। भू-राजनीतिक समीकरणों ने इसे भविष्य की रणनीतिक धातु भी बना दिया है।
चांदी
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
बीते एक साल में अगर किसी धातु ने सबसे ज्यादा चौंकाया है, तो वह चांदी है। चांदी ने सिर्फ पिछले 12 महीनों में करीब 180 फीसदी की जबर्दस्त छलांग लगाकर उद्योग जगत, निवेशकों व नीति निर्माताओं, तीनों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) और सोलर पैनलों में बढ़ते उपयोग ने चांदी को रणनीतिक धातु के रूप में स्थापित कर दिया है। इसकी तेजी में मांग व आपूर्ति का अंतर प्रमुख वजह है ही, साथ ही भू-राजनीति भी बड़ी भूमिका निभा रही है। चांदी के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक देश चीन ने इस साल इसके निर्यात पर कई प्रतिबंध लगाए हैं। इसलिए, माना जा रहा है कि आने वाले महीनों में भी इसकी कीमतें मजबूत बनी रहेंगी।
पहले चांदी का उपयोग ज्यादातर आभूषण और बर्तनों तक ही सीमित था। पर, जैसे-जैसे देश हरित व स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है, इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी और सोलर पैनल आदि में चांदी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। यही इसकी बढ़ती मांग और कीमतों का सबसे बड़ा कारण बन गया है। एक अध्ययन के अनुसार, हरित व स्वच्छ ऊर्जा तथा इससे जुड़े उपकरणों में 59 फीसदी तक चांदी का उपयोग होने लगा है। ‘वर्ल्ड सिल्वर सर्वे’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में चांदी का वैश्विक उत्पादन 89 करोड़ औंस था, जो 2024 में गिरकर 82 करोड़ औंस रह गया। यानी इसके उत्पादन में 8.6 फीसदी की गिरावट आई है, जबकि इसी अवधि में इसकी मांग में 17 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। मांग एवं आपूर्ति में यह अंतर भी कीमतों को बढ़ा रहा है। निवेशकों के अतिरिक्त सेंट्रल बैंकों की नजर भी अब चांदी पर टिक गई है और उन्हें यह प्रतीत होता दिखाई दे रहा है कि वे अपने भंडार में चांदी भी रख सकते हैं। इससे बाजार में इसकी मांग और बढ़ने की उम्मीद है। एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में चांदी पर किए गए निवेश में 150 से 180 फीसदी तक का रिटर्न मिला है।
चांदी के दाम बढ़ने के पीछे भू-राजनीतिक वजहें भी हैं। ट्रंप कैंप का मानना है कि भविष्य की जंग तेल नहीं, बल्कि तकनीक और धातुओं को लेकर लड़ी जाएगी। इसी कारण अमेरिका ने हाल ही में चांदी व तांबे को ‘रेयर मेटल’ (दुर्लभ धातुओं) की श्रेणी में डाल दिया है। चीन ने भी चांदी के निर्यात पर सख्ती करनी शुरू कर दी है। एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन की निर्यात संबंधी सख्ती की वजह से वैश्विक स्तर पर चांदी की आपूर्ति 60 फीसदी तक घट सकती है।
चांदी की मांग को पूरा करने में दो बड़ी तकनीकी समस्याएं हैं। पहली, चांदी का करीब 70-80 फीसदी उत्पादन अन्य धातुओं जैसे लेड, जिंक, कॉपर या सोने की खदानों से ‘बाय-प्रोडक्ट’ के रूप में होता है। बाय-प्रोडक्ट धातुओं का उत्पादन केवल उसकी अपनी मांग के हिसाब से नहीं बढ़ाया जा सकता है। दूसरी, चांदी का बड़ा हिस्सा सोलर पैनल, सेमीकंडक्टर और चिकित्सकीय उपकरणों में इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही, इसकी ‘रीसाइक्लिंग’ करना आर्थिक रूप से महंगा होता है। इसी वजह से यह एक तरह से बाजार से स्थायी रूप से बाहर निकल जाती है, यानी कि हर बार प्रोडक्ट में इस्तेमाल के लिए नई चांदी की जरूरत पड़ती है।
फोटोवोल्टिक सोलर पैनलों पर भी सिल्वर पेस्ट का उपयोग किया जाता है। गौरतलब है कि चांदी में सूर्य की रोशनी से उत्पन्न इलेक्ट्रॉनों को बेहद कम हानि के साथ प्रवाहित करने की क्षमता होती है। एक सोलर पैनल में 15 से 20 ग्राम चांदी लगती है। वहीं विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया भर में 2030 तक सोलर क्षमता के 170 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है। वस्तुतः एक इलेक्ट्रिक वाहन में औसतन 25 ग्राम तक चांदी लगती है। यह चांदी बैटरियों, वायरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स कंट्रोल यूनिट्स और चार्जिंग स्टेशनों में इस्तेमाल होती है। ईवी के चलन के साथ ही चांदी की भी मांग बढ़ती जा रही है। अमेरिका में ही 2030 तक 2.8 करोड़ ईवी चार्जिंग पोर्ट्स लगाने की योजना है, जिनमें चांदी की बड़ी खपत होगी। सेमीकंडक्टर, 5जी नेटवर्क व डाटा सेंटर्स, आदि में चांदी अहम भूमिका निभाती है। एआई आधारित ‘हाइपरस्केल डाटा सेंटर्स’ को तेज स्थिर व ऊर्जा कुशल कनेक्टिविटी चाहिए, जिसके लिए चांदी जरूरी है। भविष्य में सॉलिड स्टेट बैटरियों में भी इसका उपयोग बढ़ सकता है।
हरित ऊर्जा ट्रांजिशन, निवेशकों की पसंद और भू-राजनीति के संगम से चांदी ने इतिहास रच दिया है। बीते एक साल की रिकॉर्ड तेजी और दशकों की निरंतर मजबूती ने इसे भविष्य की रणनीतिक धातु बना दिया है। इसे अब सोने-सी अहमियत मिलने लगी है।
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पहले चांदी का उपयोग ज्यादातर आभूषण और बर्तनों तक ही सीमित था। पर, जैसे-जैसे देश हरित व स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है, इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी और सोलर पैनल आदि में चांदी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। यही इसकी बढ़ती मांग और कीमतों का सबसे बड़ा कारण बन गया है। एक अध्ययन के अनुसार, हरित व स्वच्छ ऊर्जा तथा इससे जुड़े उपकरणों में 59 फीसदी तक चांदी का उपयोग होने लगा है। ‘वर्ल्ड सिल्वर सर्वे’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में चांदी का वैश्विक उत्पादन 89 करोड़ औंस था, जो 2024 में गिरकर 82 करोड़ औंस रह गया। यानी इसके उत्पादन में 8.6 फीसदी की गिरावट आई है, जबकि इसी अवधि में इसकी मांग में 17 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। मांग एवं आपूर्ति में यह अंतर भी कीमतों को बढ़ा रहा है। निवेशकों के अतिरिक्त सेंट्रल बैंकों की नजर भी अब चांदी पर टिक गई है और उन्हें यह प्रतीत होता दिखाई दे रहा है कि वे अपने भंडार में चांदी भी रख सकते हैं। इससे बाजार में इसकी मांग और बढ़ने की उम्मीद है। एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में चांदी पर किए गए निवेश में 150 से 180 फीसदी तक का रिटर्न मिला है।
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चांदी के दाम बढ़ने के पीछे भू-राजनीतिक वजहें भी हैं। ट्रंप कैंप का मानना है कि भविष्य की जंग तेल नहीं, बल्कि तकनीक और धातुओं को लेकर लड़ी जाएगी। इसी कारण अमेरिका ने हाल ही में चांदी व तांबे को ‘रेयर मेटल’ (दुर्लभ धातुओं) की श्रेणी में डाल दिया है। चीन ने भी चांदी के निर्यात पर सख्ती करनी शुरू कर दी है। एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन की निर्यात संबंधी सख्ती की वजह से वैश्विक स्तर पर चांदी की आपूर्ति 60 फीसदी तक घट सकती है।
चांदी की मांग को पूरा करने में दो बड़ी तकनीकी समस्याएं हैं। पहली, चांदी का करीब 70-80 फीसदी उत्पादन अन्य धातुओं जैसे लेड, जिंक, कॉपर या सोने की खदानों से ‘बाय-प्रोडक्ट’ के रूप में होता है। बाय-प्रोडक्ट धातुओं का उत्पादन केवल उसकी अपनी मांग के हिसाब से नहीं बढ़ाया जा सकता है। दूसरी, चांदी का बड़ा हिस्सा सोलर पैनल, सेमीकंडक्टर और चिकित्सकीय उपकरणों में इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही, इसकी ‘रीसाइक्लिंग’ करना आर्थिक रूप से महंगा होता है। इसी वजह से यह एक तरह से बाजार से स्थायी रूप से बाहर निकल जाती है, यानी कि हर बार प्रोडक्ट में इस्तेमाल के लिए नई चांदी की जरूरत पड़ती है।
फोटोवोल्टिक सोलर पैनलों पर भी सिल्वर पेस्ट का उपयोग किया जाता है। गौरतलब है कि चांदी में सूर्य की रोशनी से उत्पन्न इलेक्ट्रॉनों को बेहद कम हानि के साथ प्रवाहित करने की क्षमता होती है। एक सोलर पैनल में 15 से 20 ग्राम चांदी लगती है। वहीं विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया भर में 2030 तक सोलर क्षमता के 170 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है। वस्तुतः एक इलेक्ट्रिक वाहन में औसतन 25 ग्राम तक चांदी लगती है। यह चांदी बैटरियों, वायरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स कंट्रोल यूनिट्स और चार्जिंग स्टेशनों में इस्तेमाल होती है। ईवी के चलन के साथ ही चांदी की भी मांग बढ़ती जा रही है। अमेरिका में ही 2030 तक 2.8 करोड़ ईवी चार्जिंग पोर्ट्स लगाने की योजना है, जिनमें चांदी की बड़ी खपत होगी। सेमीकंडक्टर, 5जी नेटवर्क व डाटा सेंटर्स, आदि में चांदी अहम भूमिका निभाती है। एआई आधारित ‘हाइपरस्केल डाटा सेंटर्स’ को तेज स्थिर व ऊर्जा कुशल कनेक्टिविटी चाहिए, जिसके लिए चांदी जरूरी है। भविष्य में सॉलिड स्टेट बैटरियों में भी इसका उपयोग बढ़ सकता है।
हरित ऊर्जा ट्रांजिशन, निवेशकों की पसंद और भू-राजनीति के संगम से चांदी ने इतिहास रच दिया है। बीते एक साल की रिकॉर्ड तेजी और दशकों की निरंतर मजबूती ने इसे भविष्य की रणनीतिक धातु बना दिया है। इसे अब सोने-सी अहमियत मिलने लगी है।

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