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पूरब का आर्थिक मोर्चा: एक अस्थिर वैश्विर परिवेश में स्थिरता का आश्वासन
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Wed, 22 Apr 2026 07:14 AM IST
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दक्षिण कोरियाई मेहमानों का स्वागत।
- फोटो :
Amar Ujala Graphics
विस्तार
ऐसे समय में, जब अस्थिर ऊर्जा बाजारों और भू-राजनीतिक तनावों की वजह से एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ रहा है, तब दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग की भारत यात्रा और इस दौरान दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में हुए समझौतों का महत्व अधिक बढ़ जाता है। दक्षिण कोरिया वैसे भी भारत के लिए एक बेहतरीन विकल्प है, क्योंकि वह इलेक्ट्रिक वाहनों, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में एक बेहतरीन सहयोगी साबित हो सकता है। तब तो और भी, जब भारत इन्हीं क्षेत्रों में चीन पर निर्भरता कम करने के लिए नए विकल्पों की तलाश करता रहा है। फिलहाल, दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय व्यापार को करीब दोगुना कर 2030 तक 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने को लेकर प्रतिबद्धता जताई है, जिसमें मौजूदा द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर दोबारा बातचीत शुरू करने पर सहमति भी शामिल है।दरअसल, भारत और दक्षिण कोरिया के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) 2010 में लागू हुआ था, जब दोनों देशों के बीच व्यापार तकरीबन 14 अरब डॉलर का था। आज यह करीब 27 अरब डॉलर है, पर काफी असंतुलित है, क्योंकि भारत का निर्यात कोरियाई निर्यात की तुलना में काफी कम है। कोरियाई राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान यह संदेश मिलना उत्साहजनक है कि दोनों देश एक वर्ष के भीतर ही सीईपीए के दूसरे चरण की वार्ता को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं। कोरियाई राष्ट्रपति का भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हुए प्रधानमंत्री मोदी को कोरिया की यात्रा का निमंत्रण देने के पीछे भी लक्ष्य यही है कि उनकी यात्रा से पहले ही सीईपीए वार्ता को किसी सकारात्मक नतीजे तक पहुंचाया जा सके।
उल्लेखनीय है कि दक्षिण कोरिया जहाज निर्माण के क्षेत्र में काफी उन्नत माना जाता है। चूंकि, भारत भी अपनी जहाज निर्माण क्षमताओं के उन्नयन की महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रहा है, कोरिया की इस क्षेत्र में महारत उसके काम आ सकती है। दरअसल, अमेरिका व चीन की प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन युद्ध और अब अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की कमजोरियों को ही उजागर किया है। ऐसे में, भारत व दक्षिण कोरिया के बीच हुए करार वैश्विक आपूर्ति नेटवर्कों में विविधता लाने की दृष्टि से अहम साबित हो सकते हैं। स्वच्छ ऊर्जा, बैटरी तकनीकों, ई-मोबिलिटी और डिजिटल व्यापार पर ध्यान केंद्रित करना चीन जैसे प्रमुख खिलाड़ियों पर निर्भरता को कम कर सकता है। ये समझौते, समान रणनीतिक हितों वाले देशों के बीच साझेदारी के एक नए अध्याय की शुरुआत की ओर भी इशारा करते हैं। कुल मिलाकर देखें, तो एक अस्थिर वैश्विक परिवेश में, दोनों देशों की आपसी निर्भरता दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए स्थिरता का आश्वासन बन सकती है।

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