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हर बार महिलाएं ही क्यों ठगी जाती हैं: हर बार विपक्ष विरोध का कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेता है
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सार
वर्ष 1996 से लेकर अब तक संसद में नौ बार महिला आरक्षण विधेयक के लिए कोशिशें की गईं, हर बार उस समय के विपक्ष द्वारा कोई न कोई आपत्ति दर्ज की गई। सच यही है कि तीन दशकों के संघर्ष के बाद भी महिला आरक्षण लागू न हो सका और इसकी कीमत महिलाओं को चुकानी पड़ रही है।
महिला आरक्षण
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बीते 17 अप्रैल को कांग्रेस के नेतृत्व वाले ‘इंडिया’ गठबंधन ने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक को खारिज कर दिया। यह वह विधेयक था, जिसके माध्यम से संविधान में पहले से ही दर्ज महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को लागू किया जाना था। विधेयक पर हुए मतदान में 298 वोट पक्ष में और 230 वोट विपक्ष में पड़े, जबकि किसी भी सांविधानिक संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। इस विधेयक को आवश्यक बहुमत ( 352 मतों) से 54 वोट कम मिले। विपक्षी प्रवक्ताओं ने जोर देकर कहा कि उन्होंने महिला आरक्षण के खिलाफ वोट नहीं किया था, बल्कि परिसीमन के खिलाफ वोट दिया था। 2011 की जनगणना को आधार बनाने, ओबीसी उप-कोटा न होने और संघीय असंतुलन के खिलाफ वोट दिया।
यह कोई नई बात नहीं है। 1996 से लेकर अब तक, महिलाओं के लिए आरक्षण से जुड़ी हर संसदीय चर्चा की यह लगातार नियति रही है। जिन नौ मौकों पर यह विधेयक पेश किया गया, उन सभी मौकों पर उस समय के विपक्ष ने विरोध करने का कोई ऐसा कारण ढूंढ निकाला, जो तकनीकी रूप से महिलाओं के लिए आरक्षण का विरोध नहीं था। देश की आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 48 प्रतिशत है। 18वीं लोकसभा में 543 सीटों में से 74 सीटें महिलाओं के पास हैं। यह 13.63 प्रतिशत है, जो 2019 के 14.36 प्रतिशत से कम है। 1952 से अब तक हुए आम चुनावों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। इसी रफ्तार से चले, तो महिलाओं को 22वीं सदी में जाकर बराबरी हासिल होगी।
अंतरराष्ट्रीय संसदीय संघ (आईपीयू) ने 185 देशों में से भारत को 143वें स्थान पर रखा है। वैश्विक औसत 26.9 प्रतिशत है, जो भारत के आंकड़े से लगभग दोगुना है। राज्य विधानसभाओं की स्थिति तो और भी खराब है। राष्ट्रीय औसत लगभग नौ प्रतिशत है। 2023 में, छत्तीसगढ़ 15 प्रतिशत का आंकड़ा पार करने वाला भारत का पहला राज्य बना। 2024 में, केवल 9.7 प्रतिशत महिला उम्मीदवार ही चुनाव जीत पाईं। 17वीं लोकसभा की वित्त समिति में 31 सदस्य थे, और उनमें से एक भी महिला नहीं थी।
महिला आरक्षण विधेयक के खिलाफ आपत्तियां भी उतनी ही पुरानी और चर्चित हैं। 1996 में देवगौड़ा सरकार थी, उस समय आपत्ति दर्ज की गई कि विधेयक में ओबीसी/मुस्लिमों के लिए कोई उप-कोटा नहीं है। समाजवादी पार्टी के शरद यादव, राजद के लालू यादव और नीतीश कुमार ने यह आपत्ति दर्ज की। नतीजतन, विधेयक खत्म हो गया। 1998 में वाजपेयी सरकार में भी यही आपत्ति दर्ज की गई। उस समय राजग में शामिल रेल मंत्री नीतीश कुमार ने गठबंधन के भीतर से ही इस विधेयक का विरोध किया। नतीजतन, इसे रोक दिया गया। वाजपेयी सरकार ने चार बार और (1999, 2001, 2002, 2003 में) प्रयास किया। वही आपत्ति, वही नतीजा।
2008-2010 में यूपीए सरकार थी। यह विधेयक नौ मार्च, 2010 को राज्यसभा में 186-1 वोटों से पारित हो गया था। सपा और राजद के हंगामे के बावजूद, भाजपा और वाम दलों के समर्थन की वजह से यह संभव हो पाया। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए, जिसके पास लोकसभा में बहुमत था, उसने इस बिल को कभी भी मतदान के लिए लोकसभा में पेश नहीं किया। नतीजतन, 2014 में यह विधेयक खत्म हो गया। जिस विधेयक को कांग्रेस अब राजीव गांधी का ‘सपना’ बता रही है, उसे लागू करने का जब उसके पास एकमात्र मौका था, तब उसकी अपनी ही सरकार ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था।
सितंबर 2023 में, मोदी सरकार ने 106वां संशोधन पेश किया। इतिहास में यह वह पल है, जिसे सर्वसम्मत माना जाता है। यह विधेयक लोकसभा में 454-2 और राज्यसभा में 215-0 से पारित हुआ। इस पर सबका नजरिया एकमत था। लेकिन बहस का रिकॉर्ड ऐसा नहीं था। भाजपा ने महिला आरक्षण विधेयक का लगातार समर्थन किया है। तो फिर, 2023 की सर्वसम्मति का क्या, जब राजनीतिक सहमति बनी थी? असल में कैमरों के लिए ‘हां’ कहा गया था। वे आपत्तियां, जो बाद में अगली ‘ना’ को सही ठहराने का आधार बनतीं, पहले से ही रिकॉर्ड में दर्ज की जा रही थीं।
17 अप्रैल, 2026 को 2023 के अधिनियम को लागू करने के उद्देश्य से लाया गया 131वां संशोधन विधेयक गिर गया। इस बार आपत्तियां थीं- परिसीमन, 2011 की जनगणना, ओबीसी उप-कोटा, संघीय संतुलन। तर्क दिया जा रहा है कि 131वां संशोधन असल में महिलाओं के लिए आरक्षण का विधेयक था ही नहीं, बल्कि यह तो एक परिसीमन विधेयक था, जिसे महिलाओं के अधिकारों की आड़ में चुपके-से घुसा दिया गया था। इसमें एक समस्या है। 106वां संशोधन, जिसे 2023 में सर्वसम्मति से पारित किया गया था, उसके कार्यान्वयन को जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन पर निर्भर बना दिया गया था। विपक्ष ने उस प्रावधान के पक्ष में मतदान किया था। खड़गे ने सदन में अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी; फिर भी ‘हां’ में वोट दिया, क्योंकि ‘नहीं’ में वोट देना राजनीतिक दृष्टि से नुकसानदायक हो सकता था। बीते 17 अप्रैल को उनका दिखावा और कार्यान्वयन अलग-अलग हो गए। 2023 में विपक्ष ने जिस परिसीमन को स्वीकार किया था, उसे सक्रिय करने के लिए एक तंत्र की आवश्यकता थी। 131वां संशोधन ही वह तंत्र था। जब यह सामने आया, तो विपक्ष ने इसे उन्हीं कारणों से आपत्तिजनक पाया, जिन्हें उसने 2023 के अधिनियम के पक्ष में मतदान करके स्वीकार कर लिया था। विपक्ष ने स्वयं को उस ‘साधन’ के प्रति तो प्रतिबद्ध कर लिया, लेकिन उसे संचालित करने वाले हर ‘तंत्र’ पर आपत्ति जताई। इस तरह नौ विधेयक पेश किए गए, नौ बार आपत्तियां जताई गईं। एक बार संविधान संशोधन पारित हुआ, लेकिन महिला आरक्षण लागू न हो सका।
मौजूदा रुझानों के हिसाब से, 19वीं लोकसभा में 543 सदस्यों में से 75 से 80 महिलाएं होंगी। भारत 143वें स्थान पर ही बना रहेगा। टैक्स कोड, रक्षा बजट और शिक्षा नीति बनाने वाली समिति में पुरुषों का ही दबदबा बना रहेगा। आबादी का 48 प्रतिशत। लोकसभा का 13.6 प्रतिशत। 143वां स्थान। तीस साल में कोई बदलाव नहीं।
विपक्ष ने, 1996 से लेकर अब तक अपने हर भाषण में महिलाओं के लिए आरक्षण का जोरदार और बार-बार समर्थन किया है। और इसके लिए उन्हें कोई चुनावी कीमत नहीं चुकानी पड़ी है। दूसरी ओर, आपत्तियां भी जोरदार और बार-बार उठाई गई हैं, पर उनकी कीमत पूरी तरह से पिछले तीन दशकों से महिलाओं को ही चुकानी पड़ी है। दिखावा और गणित, दोनों अलग-अलग कहानियां कहते हैं। उनमें से केवल एक ही सच है।
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यह कोई नई बात नहीं है। 1996 से लेकर अब तक, महिलाओं के लिए आरक्षण से जुड़ी हर संसदीय चर्चा की यह लगातार नियति रही है। जिन नौ मौकों पर यह विधेयक पेश किया गया, उन सभी मौकों पर उस समय के विपक्ष ने विरोध करने का कोई ऐसा कारण ढूंढ निकाला, जो तकनीकी रूप से महिलाओं के लिए आरक्षण का विरोध नहीं था। देश की आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 48 प्रतिशत है। 18वीं लोकसभा में 543 सीटों में से 74 सीटें महिलाओं के पास हैं। यह 13.63 प्रतिशत है, जो 2019 के 14.36 प्रतिशत से कम है। 1952 से अब तक हुए आम चुनावों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। इसी रफ्तार से चले, तो महिलाओं को 22वीं सदी में जाकर बराबरी हासिल होगी।
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अंतरराष्ट्रीय संसदीय संघ (आईपीयू) ने 185 देशों में से भारत को 143वें स्थान पर रखा है। वैश्विक औसत 26.9 प्रतिशत है, जो भारत के आंकड़े से लगभग दोगुना है। राज्य विधानसभाओं की स्थिति तो और भी खराब है। राष्ट्रीय औसत लगभग नौ प्रतिशत है। 2023 में, छत्तीसगढ़ 15 प्रतिशत का आंकड़ा पार करने वाला भारत का पहला राज्य बना। 2024 में, केवल 9.7 प्रतिशत महिला उम्मीदवार ही चुनाव जीत पाईं। 17वीं लोकसभा की वित्त समिति में 31 सदस्य थे, और उनमें से एक भी महिला नहीं थी।
महिला आरक्षण विधेयक के खिलाफ आपत्तियां भी उतनी ही पुरानी और चर्चित हैं। 1996 में देवगौड़ा सरकार थी, उस समय आपत्ति दर्ज की गई कि विधेयक में ओबीसी/मुस्लिमों के लिए कोई उप-कोटा नहीं है। समाजवादी पार्टी के शरद यादव, राजद के लालू यादव और नीतीश कुमार ने यह आपत्ति दर्ज की। नतीजतन, विधेयक खत्म हो गया। 1998 में वाजपेयी सरकार में भी यही आपत्ति दर्ज की गई। उस समय राजग में शामिल रेल मंत्री नीतीश कुमार ने गठबंधन के भीतर से ही इस विधेयक का विरोध किया। नतीजतन, इसे रोक दिया गया। वाजपेयी सरकार ने चार बार और (1999, 2001, 2002, 2003 में) प्रयास किया। वही आपत्ति, वही नतीजा।
2008-2010 में यूपीए सरकार थी। यह विधेयक नौ मार्च, 2010 को राज्यसभा में 186-1 वोटों से पारित हो गया था। सपा और राजद के हंगामे के बावजूद, भाजपा और वाम दलों के समर्थन की वजह से यह संभव हो पाया। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए, जिसके पास लोकसभा में बहुमत था, उसने इस बिल को कभी भी मतदान के लिए लोकसभा में पेश नहीं किया। नतीजतन, 2014 में यह विधेयक खत्म हो गया। जिस विधेयक को कांग्रेस अब राजीव गांधी का ‘सपना’ बता रही है, उसे लागू करने का जब उसके पास एकमात्र मौका था, तब उसकी अपनी ही सरकार ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था।
सितंबर 2023 में, मोदी सरकार ने 106वां संशोधन पेश किया। इतिहास में यह वह पल है, जिसे सर्वसम्मत माना जाता है। यह विधेयक लोकसभा में 454-2 और राज्यसभा में 215-0 से पारित हुआ। इस पर सबका नजरिया एकमत था। लेकिन बहस का रिकॉर्ड ऐसा नहीं था। भाजपा ने महिला आरक्षण विधेयक का लगातार समर्थन किया है। तो फिर, 2023 की सर्वसम्मति का क्या, जब राजनीतिक सहमति बनी थी? असल में कैमरों के लिए ‘हां’ कहा गया था। वे आपत्तियां, जो बाद में अगली ‘ना’ को सही ठहराने का आधार बनतीं, पहले से ही रिकॉर्ड में दर्ज की जा रही थीं।
17 अप्रैल, 2026 को 2023 के अधिनियम को लागू करने के उद्देश्य से लाया गया 131वां संशोधन विधेयक गिर गया। इस बार आपत्तियां थीं- परिसीमन, 2011 की जनगणना, ओबीसी उप-कोटा, संघीय संतुलन। तर्क दिया जा रहा है कि 131वां संशोधन असल में महिलाओं के लिए आरक्षण का विधेयक था ही नहीं, बल्कि यह तो एक परिसीमन विधेयक था, जिसे महिलाओं के अधिकारों की आड़ में चुपके-से घुसा दिया गया था। इसमें एक समस्या है। 106वां संशोधन, जिसे 2023 में सर्वसम्मति से पारित किया गया था, उसके कार्यान्वयन को जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन पर निर्भर बना दिया गया था। विपक्ष ने उस प्रावधान के पक्ष में मतदान किया था। खड़गे ने सदन में अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी; फिर भी ‘हां’ में वोट दिया, क्योंकि ‘नहीं’ में वोट देना राजनीतिक दृष्टि से नुकसानदायक हो सकता था। बीते 17 अप्रैल को उनका दिखावा और कार्यान्वयन अलग-अलग हो गए। 2023 में विपक्ष ने जिस परिसीमन को स्वीकार किया था, उसे सक्रिय करने के लिए एक तंत्र की आवश्यकता थी। 131वां संशोधन ही वह तंत्र था। जब यह सामने आया, तो विपक्ष ने इसे उन्हीं कारणों से आपत्तिजनक पाया, जिन्हें उसने 2023 के अधिनियम के पक्ष में मतदान करके स्वीकार कर लिया था। विपक्ष ने स्वयं को उस ‘साधन’ के प्रति तो प्रतिबद्ध कर लिया, लेकिन उसे संचालित करने वाले हर ‘तंत्र’ पर आपत्ति जताई। इस तरह नौ विधेयक पेश किए गए, नौ बार आपत्तियां जताई गईं। एक बार संविधान संशोधन पारित हुआ, लेकिन महिला आरक्षण लागू न हो सका।
मौजूदा रुझानों के हिसाब से, 19वीं लोकसभा में 543 सदस्यों में से 75 से 80 महिलाएं होंगी। भारत 143वें स्थान पर ही बना रहेगा। टैक्स कोड, रक्षा बजट और शिक्षा नीति बनाने वाली समिति में पुरुषों का ही दबदबा बना रहेगा। आबादी का 48 प्रतिशत। लोकसभा का 13.6 प्रतिशत। 143वां स्थान। तीस साल में कोई बदलाव नहीं।
विपक्ष ने, 1996 से लेकर अब तक अपने हर भाषण में महिलाओं के लिए आरक्षण का जोरदार और बार-बार समर्थन किया है। और इसके लिए उन्हें कोई चुनावी कीमत नहीं चुकानी पड़ी है। दूसरी ओर, आपत्तियां भी जोरदार और बार-बार उठाई गई हैं, पर उनकी कीमत पूरी तरह से पिछले तीन दशकों से महिलाओं को ही चुकानी पड़ी है। दिखावा और गणित, दोनों अलग-अलग कहानियां कहते हैं। उनमें से केवल एक ही सच है।

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