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बदलाव के मूड में दिख रहा बंगाल: रैलियों की भीड़ से बदलते मूड के संकेत
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सार
पश्चिम बंगाल में बदलाव की आहट है। शिक्षकों की 26 हजार से ज्यादा नौकरियां जाने के मामले से पूरा युवा समाज व जेन-जी आक्रोशित है।
पीएम मोदी और ममता बनर्जी
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
चुनावी मौसम में खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ लोग नेताओं को देखने-सुनने के साथ-साथ हेलिकॉप्टर देखने भी आते हैं। 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव में कश्मीर से आए बख्तरबंद वाहन लोगों में कौतुहल का विषय बने हुए हैं, जिसका इस्तेमाल आतंकी विरोधी अभियान में होता था। ये गाड़ियां बंगाल में संस्थागत रूप से जनादेश लूटने वालों को एक कड़ा संदेश दे रही हैं। बंगाल के पाले-पोसे गए दबंग इस बार शांत दिख रहे हैं। हालांकि वर्षों तक पशु तस्करी सहित अन्य कई मामलों में तिहाड़ प्रवास के बाद जमानत पर छूटे दबंग अणुव्रत मंडल की मानें, तो रॉयल बंगाल टाइगर इन्हें चबा जाएगा।
एक मार्च से ही पूरे राज्य में केंद्रीय सुरक्षा बलों की गश्त, छोटे-बड़े सौ से ज्यादा अफसरों के तबादलों सहित चुनाव आयोग ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं, जिससे इस बार शांतिपूर्ण चुनाव की उम्मीद बंध रही है। आयोग के इस कदम के खिलाफ हाईकोर्ट में भी अपील की गई, जो खारिज कर दी गई। 16 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग के फैसले को नहीं पलटा। पिछले कई दशकों से यह साबित हो चुका है कि बंगाल में कोई भी चुनाव एक युद्ध जैसा होता है। चुनाव आयोग ने 23 अप्रैल को 152 सीटों पर होने वाले पहले चरण में ही सुरक्षा बलों की 2,407 कंपनियों की तैनाती के अलावा, एजेंटों को बूथों के बाहर टेंट लगाकर बैठाने, हर बूथ पर दो-दो कैमरे लगाने, दूसरे राज्यों के पुलिस पर्यवेक्षकों की बहाली, राज्य पुलिस को बूथ से 100 मीटर दूर रखने सहित कई नई व्यवस्थाएं करके ‘वोट लुटेरों’ के लिए कोई मौका नहीं छोड़ा है।
जहां तक तृणमूल के एक खास वोट बैंक का सवाल है, बहुत सारे लोग समझ गए हैं कि एसआईआर को लेकर मुख्यमंत्री की ओर से इतना बवाल नहीं किया गया होता, तो यह काम समय पर पूरा हो जाता और करीब 32 लाख लोगों को मताधिकार से वंचित नहीं होना पड़ता। तार्किक विसंगति वाले मामलों के निपटारे की प्रक्रिया में भी बाधा डाली गई। बीडीओ ऑफिस जलाए गए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से नियुक्त न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने व उन पर जानलेवा हमले तक का दुस्साहस किया गया। लोगों को भड़काने वाले नेता और ‘ऑन द स्पॉट’ वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने की मांग कर रहे कई लोगों को एनआईए ने पकड़ लिया है और कुछ फरार चल रहे हैं।
एसआईआर में 91 हजार नाम कटने, और तार्किक विसंगति के मामलों का पूरा निपटारा नहीं होने के कारण करीब 32 लाख लोग इस बार वोटिंग नहीं कर पाएंगे। हालांकि 16 अप्रैल को दिए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने वोटिंग से दो दिन पहले तक न्यायाधिकरणों द्वारा वैध ठहराए गए वोटरों को मताधिकार का हक दे दिया है। फिर भी अनुमानतः तार्किक विसंगति वाले 25-26 लाख लोग मताधिकार से वंचित रह ही जाएंगे। कम अंतर से जीत-हार वाली सीटों पर यह छंटनी भाजपा की मदद कर सकती है, क्योंकि जिनके नाम कटे हैं, उनमें से ज्यादातर तृणमूल समर्थक माने जाते हैं। ओवैसी व हुमायूं कबीर इसके लिए ममता को जिम्मेदार ठहराकर मुसलमानों का नया रहनुमा बनने का दम भर रहे हैं।
पिछली बार 77 पर अटक जाने वाली भाजपा इस बार ममता पर व्यक्तिगत हमले करने से बच रही है। तृणमूल के 1500 रुपये के लक्ष्मी भंडार और बेरोजगारी भत्ते को भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में दोगुना कर दिया है। महिलाओं को सरकारी बसों में मुफ्त सफर और राज्य में उद्योग लगाने व कानून-व्यवस्था की हालत सुधारकर महिला सुरक्षा बढ़ाने यानी योगी मॉडल लागू करने की भी बात की गई है। कोलकाता के पास पानीहाटी से आरजी कर अस्पताल की पीड़िता की मां को टिकट देकर भाजपा ने महिला सुरक्षा के विमर्श को पूरे राज्य में जिंदा कर दिया है।
रही बात कांगेस, वाम दलों, ओवैसी व हुमायूं कबीर के दलों की, तो ये दल कुछ सीटों पर भाजपा या तृणमूल की जीत-हार का कारण बन सकते हैं। वोटरों का संदेश जनसभाओं में आने वाले लोगों की शारीरिक भाषा से भी समझा जा सकता है। सिलीगुड़ी की एक बच्ची का वीडियो काफी वायरल हुआ है, जिसमें वह बच्ची पुलिस वाले से पूछ रही है कि ‘पुलिस अंकल, मोदी जी कब तक आएंगे?’ जबकि ममता और उनके भतीजे की जनसभाओं में पीछे की सीटें खाली जा रही हैं।
चुनाव पूर्व हिंसा पर इस बार काफी हद तक लगाम लगी है, हालांकि विपक्षी उम्मीदवारों के पोस्टर फाड़ने, कुछ इलाकों में उम्मीदवारों पर हमले की खबरें भी आई हैं, पर पुलिस व केंद्रीय बलों की त्वरित कार्रवाई से असामाजिक तत्वों के हौसले पस्त हैं।
बंगाल में शिक्षकों की 26 हजार से ज्यादा नौकरियां जाने के मामले से पूरा युवा समाज या जेन-जी आक्रोशित है। तमाम जनमत सर्वेक्षणों, अनुमानों, भय के कारोबार, बेरोजगारी भत्ते जैसे हालिया लागू प्रलोभनों के बावजूद लगता है, इस बार बंगाल का युवा सचमुच बदलाव के मूड में है।
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एक मार्च से ही पूरे राज्य में केंद्रीय सुरक्षा बलों की गश्त, छोटे-बड़े सौ से ज्यादा अफसरों के तबादलों सहित चुनाव आयोग ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं, जिससे इस बार शांतिपूर्ण चुनाव की उम्मीद बंध रही है। आयोग के इस कदम के खिलाफ हाईकोर्ट में भी अपील की गई, जो खारिज कर दी गई। 16 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग के फैसले को नहीं पलटा। पिछले कई दशकों से यह साबित हो चुका है कि बंगाल में कोई भी चुनाव एक युद्ध जैसा होता है। चुनाव आयोग ने 23 अप्रैल को 152 सीटों पर होने वाले पहले चरण में ही सुरक्षा बलों की 2,407 कंपनियों की तैनाती के अलावा, एजेंटों को बूथों के बाहर टेंट लगाकर बैठाने, हर बूथ पर दो-दो कैमरे लगाने, दूसरे राज्यों के पुलिस पर्यवेक्षकों की बहाली, राज्य पुलिस को बूथ से 100 मीटर दूर रखने सहित कई नई व्यवस्थाएं करके ‘वोट लुटेरों’ के लिए कोई मौका नहीं छोड़ा है।
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जहां तक तृणमूल के एक खास वोट बैंक का सवाल है, बहुत सारे लोग समझ गए हैं कि एसआईआर को लेकर मुख्यमंत्री की ओर से इतना बवाल नहीं किया गया होता, तो यह काम समय पर पूरा हो जाता और करीब 32 लाख लोगों को मताधिकार से वंचित नहीं होना पड़ता। तार्किक विसंगति वाले मामलों के निपटारे की प्रक्रिया में भी बाधा डाली गई। बीडीओ ऑफिस जलाए गए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से नियुक्त न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने व उन पर जानलेवा हमले तक का दुस्साहस किया गया। लोगों को भड़काने वाले नेता और ‘ऑन द स्पॉट’ वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने की मांग कर रहे कई लोगों को एनआईए ने पकड़ लिया है और कुछ फरार चल रहे हैं।
एसआईआर में 91 हजार नाम कटने, और तार्किक विसंगति के मामलों का पूरा निपटारा नहीं होने के कारण करीब 32 लाख लोग इस बार वोटिंग नहीं कर पाएंगे। हालांकि 16 अप्रैल को दिए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने वोटिंग से दो दिन पहले तक न्यायाधिकरणों द्वारा वैध ठहराए गए वोटरों को मताधिकार का हक दे दिया है। फिर भी अनुमानतः तार्किक विसंगति वाले 25-26 लाख लोग मताधिकार से वंचित रह ही जाएंगे। कम अंतर से जीत-हार वाली सीटों पर यह छंटनी भाजपा की मदद कर सकती है, क्योंकि जिनके नाम कटे हैं, उनमें से ज्यादातर तृणमूल समर्थक माने जाते हैं। ओवैसी व हुमायूं कबीर इसके लिए ममता को जिम्मेदार ठहराकर मुसलमानों का नया रहनुमा बनने का दम भर रहे हैं।
पिछली बार 77 पर अटक जाने वाली भाजपा इस बार ममता पर व्यक्तिगत हमले करने से बच रही है। तृणमूल के 1500 रुपये के लक्ष्मी भंडार और बेरोजगारी भत्ते को भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में दोगुना कर दिया है। महिलाओं को सरकारी बसों में मुफ्त सफर और राज्य में उद्योग लगाने व कानून-व्यवस्था की हालत सुधारकर महिला सुरक्षा बढ़ाने यानी योगी मॉडल लागू करने की भी बात की गई है। कोलकाता के पास पानीहाटी से आरजी कर अस्पताल की पीड़िता की मां को टिकट देकर भाजपा ने महिला सुरक्षा के विमर्श को पूरे राज्य में जिंदा कर दिया है।
रही बात कांगेस, वाम दलों, ओवैसी व हुमायूं कबीर के दलों की, तो ये दल कुछ सीटों पर भाजपा या तृणमूल की जीत-हार का कारण बन सकते हैं। वोटरों का संदेश जनसभाओं में आने वाले लोगों की शारीरिक भाषा से भी समझा जा सकता है। सिलीगुड़ी की एक बच्ची का वीडियो काफी वायरल हुआ है, जिसमें वह बच्ची पुलिस वाले से पूछ रही है कि ‘पुलिस अंकल, मोदी जी कब तक आएंगे?’ जबकि ममता और उनके भतीजे की जनसभाओं में पीछे की सीटें खाली जा रही हैं।
चुनाव पूर्व हिंसा पर इस बार काफी हद तक लगाम लगी है, हालांकि विपक्षी उम्मीदवारों के पोस्टर फाड़ने, कुछ इलाकों में उम्मीदवारों पर हमले की खबरें भी आई हैं, पर पुलिस व केंद्रीय बलों की त्वरित कार्रवाई से असामाजिक तत्वों के हौसले पस्त हैं।
बंगाल में शिक्षकों की 26 हजार से ज्यादा नौकरियां जाने के मामले से पूरा युवा समाज या जेन-जी आक्रोशित है। तमाम जनमत सर्वेक्षणों, अनुमानों, भय के कारोबार, बेरोजगारी भत्ते जैसे हालिया लागू प्रलोभनों के बावजूद लगता है, इस बार बंगाल का युवा सचमुच बदलाव के मूड में है।

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