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मौसम के बदलते मिजाज: नागरिकों की जागरूकता और सावधानी भी जरूरी
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Tue, 21 Apr 2026 07:02 AM IST
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हीटवेव का अलर्ट
- फोटो :
ANI
विस्तार
राष्ट्रीय राजधानी समेत उत्तर भारत में पिछले दिनों हुई असमय बारिश के बाद अब अचानक पारा तेजी से चढ़ने लगा है और दिल्ली का अधिकतम तापमान 40.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जो सामान्य से करीब तीन डिग्री अधिक है। अधिक चिंताजनक यह है कि इस मौसम में पहली बार भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने हीटवेव को लेकर ‘येलो अलर्ट’ जारी किया है। वैसे तो पिछले हफ्ते शुक्रवार को ही 41 डिग्री सेल्सियस के साथ मौसम का अब तक का अधिकतम ताप वाला दिन दर्ज किया गया था, पर उसके बाद आई आंधी-बारिश ने तापमान को नीचे कर दिया था। लेकिन अब एक बार फिर गर्मी के ये शुरुआती संकेत महज तापमान बढ़ने के ही नहीं हैं, बल्कि हीटवेव से पैदा होने वाली चुनौतियों, जो अब हर वर्ष की समस्या हो गई हैं, से निपटने के लिए मानसिक रूप से तैयार होने का आह्वान भी करते हैं।बात सिर्फ दिल्ली की ही नहीं है। उत्तर-पश्चिमी गर्म हवाएं और सूरज का बढ़ता प्रकोप अगले कुछ दिनों में पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान और समूचे उत्तर भारत में अपना असर दिखाने वाला है, जिसकी शुरुआत हो भी चुकी है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और विदर्भ में दिन के समय लगातार लू का कहर जारी है। पिछले कुछ वर्षों में इतनी असामान्य मौसमी घटनाएं दिखी हैं, कि अब यह सब ‘न्यू नॉर्मल’ लगने लगा है। यही वजह है कि पश्चिमी विक्षोभ के चलते हिमालयी क्षेत्र में हो रही बारिश व बर्फबारी के असर से राजधानी का अछूता रहना चौंकाता नहीं है, फिर भी यह चिंताजनक तो है ही।
राहत की बात है कि मौसम विभाग ने अप्रैल में कोई ‘हीटवेव दिवस’ दर्ज नहीं किया, जबकि 2025 के अप्रैल में ऐसे तीन दिन घोषित किए गए थे। हीटवेव दिवस उसे कहते हैं, जब या तो अधिकतम तापमान 45 डिग्री सेल्सियस को छू ले और या फिर अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस हो, जो सामान्य से 4.5 डिग्री या उससे अधिक ऊपर हो। चूंकि, इससे सबसे अधिक मजदूर, रिक्शा चालक, डिलीवरी कर्मी और फुटपाथ विक्रेता जैसे लोग ही प्रभावित होते हैं, इसलिए इन्हें ‘हीट एक्शन प्लान’ की प्राथमिकता में शामिल किया जाना चाहिए। कहने की जरूरत नहीं कि हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन से जुड़े मामले तेजी से बढ़ने से सरकारी अस्पतालों पर दबाव बढ़ता है, और कार्यबल के प्रभावित होने से अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन के व्यापक संदर्भ में देखें, तो चरम मौसमी स्थितियां अब अपवाद नहीं रह गई हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकारें तो खैर अपनी तरफ से कोशिशें करेंगी ही, नागरिकों की जागरूकता और सावधानी भी उतनी ही जरूरी है।

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