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होर्मुज की पहेली: वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता की चपेट में
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Mon, 20 Apr 2026 07:21 AM IST
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होर्मुज में फंसे जहाज (फोटो-AI)
- फोटो :
@ChatGPT
विस्तार
होर्मुज जलडमरूमध्य को एक बार फिर पूरी तरह से बंद करके, भारतीय ध्वज वाले जहाजों पर फायरिंग और 14 भारतीय जहाजों को रोककर तेहरान ने पश्चिम एशियाई संकट के शीघ्र हल होने की उम्मीदों को सिर्फ धूमिल ही नहीं किया है, बल्कि उसे गहराया भी है। दरअसल, ईरान की शिकायत उसके बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को लेकर है। जबकि, अमेरिका का कहना है कि नाकेबंदी तब तक लागू रहेगी, जब तक कोई समझौता नहीं हो जाता। दूसरी ओर, ट्रंप ईरान के साथ समझौते को नजदीक ही बता रहे हैं।हालांकि ईरान का कहना है कि अमेरिका के साथ उसकी बातचीत में प्रगति तो हुई है, लेकिन यह समझौते से अब भी काफी दूर है। इन विरोधाभासी स्थितियों और द्विपक्षीय नेताओं की ‘कभी हां, कभी ना’ ने होर्मुज संकट को एक पहेली बना दिया है। ये घटनाएं एक बार फिर याद दिलाती हैं कि पश्चिम एशिया की स्थिति कितनी संवेदनशील है। ईरान को समझना होगा कि होर्मुज दुनिया की साझा संपत्ति है और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना वैश्विक तौर पर उसे अलग-थलग कर सकता है। भारत जैसे देश, जो संतुलित नीति अपनाते आए हैं और जिनके ईरान के साथ पुराने संबंध भी हैं, ऐसे संघर्ष में फंसने के तो बिल्कुल हकदार नहीं हैं। चूंकि भारत को होने वाली कुल ईंधन आपूर्ति का 40 फीसदी से अधिक हिस्सा होर्मुज से ही गुजरता है, इसलिए हमारे लिए यह मुद्दा सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है।
इसी कारण भारत ने स्वाभाविक ही कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए ईरानी राजदूत को तलब कर गहरी नाराजगी जताई है। इस संकट के बीच एक और चिंताजनक खबर यह है कि संघर्ष विराम के दौरान ईरान पहले से ज्यादा हथियारों का उत्पादन कर रहा है। हालांकि ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन कह चुके हैं कि उनका देश युद्ध नहीं चाहता और वह सिर्फ आत्मरक्षा में कदम उठा रहे हैं। लेकिन पश्चिम एशिया में टकराव, नाकेबंदी और शक्ति प्रदर्शन की होड़ ने स्थितियों को जटिल ही बनाया है। इन हालात में जरूरी है कि पश्चिम एशियाई संकट के समाधान की दिशा में भारत खुद को कूटनीतिक भूमिका में बनाए रखे। साथ ही, आयात के वैकल्पिक मार्गों की तलाश और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर काम भी जारी रखे, ताकि इस तरह के वैश्विक संकट से वह अछूता रह सके। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी यह समझना होगा कि होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण जलमार्गों की सुरक्षा सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर इसे हथियार बनाने की अनुमति दी गई, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार हमेशा अनिश्चितता की चपेट में ही रहेंगे।

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