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कोरिया की इंजीनियरिंग, भारत का बाजार: दूसरी लहर का फायदा उठाने का समय

शिव सिद्धांत कौल, नई दिल्ली Published by: Nitin Gautam Updated Wed, 22 Apr 2026 07:25 AM IST
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सार

दक्षिण कोरिया की सटीक इंजीनियरिंग और हार्डवेयर में विशेषज्ञता, जब भारत के विशाल, कुशल मानव संसाधन और बड़े घरेलू बाजार से जुड़ेगी, तो ऐसी वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं तैयार हो सकती हैं, जो किसी भी भू-राजनीतिक झटके का मजबूती से मुकाबला करने में सक्षम होंगी।

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भारत और दक्षिण कोरिया के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ेगा। - फोटो : पीटीआई
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विस्तार

रविवार, यानी 19 अप्रैल को कोरिया गणराज्य के राष्ट्रपति ली जे म्युंग भारत पहुंचे। यह करीब आठ वर्षों के बाद किसी दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति की पहली राजकीय यात्रा है। कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण यह यात्रा ऐसे समय में हुई, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अहम मोड़ से गुजर रही है। भारत और कोरिया, दोनों देशों के व्यावसायिक जगत को उम्मीद है कि यह यात्रा आपसी रिश्तों को एक नई दिशा देगी, जहां साझेदारी रणनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक सहयोग के मजबूत स्तंभों पर आधारित होगी।
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भारत और कोरिया के रिश्ते बेहद प्राचीन हैं। मान्यता है कि 48 ईस्वी में अयोध्या की राजकुमारी सुरिरत्ना समुद्र पार कर कोरिया गईं और राजा सुरो से विवाह किया, जिससे ‘गाया साम्राज्य’ की स्थापना हुई। आधुनिक इतिहास में भी कोरियाई युद्ध के दौरान भारत की ‘60वीं पैराशूट फील्ड एंबुलेंस’ इकाई ने वहां तैनात होकर सैनिकों और आम नागरिकों को महत्वपूर्ण चिकित्सा सहायता प्रदान की थी। हालांकि, दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग की असली नींव 1990 के दशक में भारत के आर्थिक उदारीकरण के दौरान पड़ी। उस दौर में कोरियाई कंपनियों ने भारत में निवेश करने का साहसिक फैसला लिया। हुंडई मोटर, सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स और एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी बड़ी कंपनियों ने न सिर्फ अपने उत्पाद भारत में बेचे, बल्कि यहां फैक्टरियां लगाकर रोजगार के अवसर भी पैदा किए। साथ ही, उपभोक्ताओं के बीच विश्वास का एक ऐसा पुल तैयार किया, जिसकी आज भी कोई बराबरी नहीं कर सकता। 2015 में इस रिश्ते को औपचारिक रूप से ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा दिया गया। अब यह साझेदारी रक्षा, सुरक्षा और उन्नत तकनीक जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक फैल चुकी है।
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पिछले वित्त वर्ष में ‘व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते’ (सीईपीए) के दम पर भारत और दक्षिण कोरिया के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 27 अरब डॉलर तक पहुंच गया। दोनों देशों के रिश्तों की मजबूती का सबसे बड़ा संकेत यह है कि अब कोरियाई कंपनियां महज विदेशी कंपनियां नहीं रहीं, बल्कि भारतीय कॉरपोरेट ढांचे का एक अहम हिस्सा बन चुकी हैं। 2024 के अंत में हुंडई मोटर इंडिया का 3.3 अरब डॉलर का आईपीओ और फिर अक्तूबर 2025 में एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया की 1.4 अरब डॉलर की पब्लिक लिस्टिंग इसका साफ संकेत है कि ये कंपनियां अब अपनी आर्थिक सफलता और बाजार की उपलब्धियों में भारतीय निवेशकों को भी साझेदार बना रही हैं। अगर आर्थिक रिश्ते इस साझेदारी की ‘ईंटें’ हैं, तो सांस्कृतिक जुड़ाव वह ‘गारा’ है, जो इन ईंटों को मजबूती से जोड़ता है। आज भारत में कोरियाई संस्कृति की लहर तेजी से फैल चुकी है। कोरियाई पॉप संगीत, ड्रामा, सौंदर्य प्रसाधन और खान-पान भारतीय युवा संस्कृति में व्यापक रूप से फैल गए हैं। पर्यटकों की बढ़ती संख्या, छात्रों का आदान-प्रदान, और सियोल में भारतीय स्टार्टअप संस्थापकों तथा भारत में कोरियाई प्रवासियों के गतिशील समुदाय लोगों के बीच ऐसा जुड़ाव पैदा कर रहे हैं, जो व्यावसायिक एकजुटता से कहीं अधिक व्यापक और गहरा होगा।

अब समय आ गया है कि हम इस साझेदारी की ‘दूसरी लहर’ का लाभ उठाएं। हमारे सामने अवसरों का अंबार है, लेकिन इन्हें भुनाने के लिए हमें एक आधुनिक और उन्नत कार्यप्रणाली की आवश्यकता है। अपने व्यापार की वास्तविक क्षमता को उजागर करने और भारत के संरचनात्मक व्यापार घाटे को दूर करने के लिए, हमें सबसे पहले ऐसे उन्नत सीईपीए की आवश्यकता है, जो संतुलित और न्यायसंगत व्यापार तथा निवेश को बढ़ावा दे। हमें रक्षा उत्पादन, प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखला, महत्वपूर्ण खनिजों और हरित ऊर्जा जैसे अहम क्षेत्रों में रणनीतिक जुड़ाव स्थापित करने होंगे।

दूसरा, भारत कोरियाई उद्योगों को अपने विनिर्माण क्षेत्रों में चल रही नई क्रांति का पूरा फायदा उठाने के लिए आमंत्रित कर सकता है। संरचनात्मक सुधारों, बेहतर नीतियों और ‘विकसित भारत’ के संकल्प से प्रेरित ‘मेक इन इंडिया’ पहल 
आज ऐतिहासिक अवसर बन चुकी है। दक्षिण कोरिया की सटीक इंजीनियरिंग और हार्डवेयर में विशेषज्ञता, जब भारत के विशाल, कुशल मानव संसाधन और बड़े घरेलू बाजार से जुड़ेगी, तो ऐसी वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं तैयार हो सकती हैं, जो किसी भी भू-राजनीतिक झटके का मजबूती से मुकाबला कर सकती हैं।

तीसरा, अब समय है कि हम ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ताकत का भी पूरा उपयोग करें। भारत की सॉफ्टवेयर क्षमताएं व दक्षिण कोरिया की हार्डवेयर में पकड़ एक-दूसरे की पूरक हैं। ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स का विस्तार और एआई तकनीकों का इस्तेमाल विकास की रफ्तार को तेज कर सकता है। इससे भाषा जैसी बाधाएं भी कम होंगी, जिन्होंने अब तक, खासकर एमएसएमई क्षेत्र में सहयोग को धीमा किया है। जैसे-जैसे कंपनियां इस महत्वपूर्ण सम्मिलन की तैयारी कर रही हैं, उम्मीद है कि एक उन्नत और संतुलित सीईपीए समझौता जल्द ही अंतिम रूप लेगा, जिससे 2030 तक 50 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य हासिल किया जा सके। यह उद्योगों की अगुवाई में एक साझा प्रौद्योगिकी और विनिर्माण कार्यबल का गठन, रक्षा, सेमीकंडक्टर, उन्नत सामग्री व ऊर्जा जैसे अहम क्षेत्रों में संयुक्त परियोजनाओं को गति देगा। इसी दिशा में भारतीय उद्योग परिसंघ और उसके कोरियाई साझेदार पहले ही ऐसा मंच तैयार कर चुके हैं, जो एमएसएमई स्तर पर दोनों देशों के व्यवसायों को जोड़ने का काम कर रहा है।

दोनों देश 15 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। यह संकेत है कि किस तरह दोनों ने 20वीं सदी के उपनिवेशवाद के आघात से बचकर खुद को एशिया के मजबूत लोकतंत्रों और उभरती आर्थिक ताकतों के रूप में स्थापित किया है। 1929 में, जब कोरिया औपनिवेशिक शासन के तहत सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था, तब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने ये पंक्तियां लिखी थीं: ‘एशिया के स्वर्णिम युग में, कोरिया इसकी मशाल थामने वालों में से एक था, और वह मशाल अब पूरब को रोशन करने के लिए एक बार फिर जलाए जाने का इंतजार कर रही है।’ आज, वह मशाल पूरी दीप्ति के साथ जल रही है। अब वक्त भारत के आगे बढ़ने का है, और इस सफर में कोरिया की सफलता एक मजबूत प्रेरणा बनकर सामने आती है। दोनों देशों के ‘साझेदारी 2.0’ की मजबूत नींव रखने का इससे बेहतर वक्त और क्या हो सकता है। इसलिए, जरूरी है कि दोनों देश यह सुनिश्चित करें कि आने वाला ‘एशियाई युग’ हमारी साझा समृद्धि और अटूट मित्रता के प्रकाश से जगमगा उठे।  

(लेखक सीआईआई कोरिया समिति के अध्यक्ष और कोलकाता में कोरिया गणराज्य के मानद महावाणिज्य दूत हैं)
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