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मुद्दा: ताकि कमजोर न पड़े लोकतंत्र की पहली सीढ़ी; कुछ राज्यों में वर्षों से लंबित हैं पंचायत चुनाव

Mahendra Tiwari महेंद्र तिवारी
Updated Thu, 23 Apr 2026 08:42 AM IST
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सार
देश के आठ राज्यों व चार केंद्रशासित प्रदेशों में तय समय पर पंचायतों के चुनाव न कराए जाने से 73वें संविधान संशोधन का मूल उद्देश्य बिखरता प्रतीत होता है।
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To ensure that first step of democracy is not weakened; Panchayat election are pending for years in some state
ताकि कमजोर न पड़े लोकतंत्र की पहली सीढ़ी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देश कल पंचायतीराज दिवस मनाएगा, पर इस वर्ष यह दिन एक अहम सवाल के साथ दस्तक दे रहा है। सवाल है कि क्या हमारा स्थानीय लोकतंत्र धीरे-धीरे औपचारिकता में नहीं बदलता जा रहा है? देश के आठ राज्यों व चार केंद्रशासित प्रदेशों में तय समय पर पंचायतों के चुनाव नहीं कराए गए हैं। कुछ राज्यों में तो कई वर्षों से पंचायत चुनाव लंबित हैं। ऐसा तब है, जब संविधान के अनुच्छेद-243(ड.) के तहत पंचायतों में नियमित चुनाव कराना राज्यों की जिम्मेदारी है।


केंद्रीय पंचायतीराज मंत्री की ओर से लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, मणिपुर व महाराष्ट्र में वर्ष 2022 से, गुजरात में 2023 से, राजस्थान में 2025 से तथा तेलंगाना में 2024 से पंचायतों के चुनाव नहीं हुए हैं। इसी तरह कर्नाटक में ब्लाॅक व जिला पंचायतों के चुनाव 2021 से तथा ग्राम पंचायतों के चुनाव दिसंबर 2025 से लंबित हैं। हिमाचल प्रदेश में इस साल जनवरी में चुनाव होने थे, पर नहीं हो सके।


तमिलनाडु में 28 जिलों की पंचायतों का कार्यकाल जनवरी 2025 में खत्म हो चुका है। केंद्रशासित प्रदेशों में जम्मू-कश्मीर में ग्राम पंचायतों व ब्लाॅक पंचायतों के कार्यकाल 2024 में, जबकि जिला पंचायतों के कार्यकाल इसी साल फरवरी में खत्म हो गए। लद्दाख में 2024 से, तो पुडुचेरी में 2011 से पंचायतों के चुनाव नहीं हुए हैं। गाैर करने वाली बात यह है कि समय पर पंचायत चुनाव न कराने वाले राज्य व केंद्रशासित प्रदेश किसी एक दल की सत्ता वाले नहीं हैं। इनमें भाजपा शासित गुजरात, महाराष्ट्र व राजस्थान जैसे राज्य हैं, तो कांग्रेस शासित राज्यों में कर्नाटक व हिमाचल भी शामिल हैं। तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर में क्रमश: क्षेत्रीय दलों द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) व नेशनल कांफ्रेंस की सरकार है।

73वें संविधान संशोधन का मूल उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण था। मकसद था कि निर्णय गांव के स्तर पर लिए जाएं और लोगों की भागीदारी बढ़े। संविधान ने स्पष्ट प्रावधान किया है कि हर पांच साल में पंचायत चुनाव अनिवार्य रूप से कराए जाएं। यदि किसी कारणवश पंचायत भंग होती है, तो छह महीने के भीतर चुनाव कराना जरूरी है। गांवों में विकास योजनाओं का सही लाभ तभी मिल सकता है, जब स्थानीय प्रतिनिधि सक्रिय हों। बिना जनप्रतिनिधियों के कामों में मनमानी व भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलता है।

दरअसल, पंचायत चुनाव टालने के पीछे अक्सर प्रशासनिक या कानूनी कारणों का हवाला दिया जाता है-जैसे आरक्षण का निर्धारण, परिसीमन या अदालतों में लंबित मामले। ऐसा कहने वालों की भी कमी नहीं है कि कई सरकारों ने राजनीतिक समीकरणों के चलते चुनाव टाल दिए। पंचायतें लोकतंत्र की पहली सीढ़ी हैं। पंचायतों से निकले कई जनप्रतिनिधि विधायक व सांसद बनने में सफल हुए हैं। यदि यही कमजोर पड़ गई, तो ऊपर की पूरी संरचना प्रभावित होगी। इसके अलावा, पंचायतों में महिलाओं, अनुसूचित जातियों-जनजातियों व पिछड़े वर्गों को जो प्रतिनिधित्व मिला है, वह भी चुनाव न होने की स्थिति में बाधित होता है। जहां नियमित चुनाव हो रहे हैं, वहां की पंचायतों में लाखों महिलाएं और वंचित वर्ग के लोग नेतृत्व की भूमिका में आए हैं। चुनाव न होने की स्थिति में यह प्रतिनिधित्व स्वतः समाप्त हो जाएगा या सीमित हो जाएगा। पंचायतीराज संस्थाओं को केवल प्रशासनिक इकाई के रूप में नहीं देखा जा सकता। ये सामाजिक सशक्तीकरण का माध्यम भी हैं। गांवों में लोकतंत्र की जड़ें जितनी मजबूत होंगी, देश का लोकतंत्र उतना ही स्थायी और प्रभावी होगा।

लोकसभा व विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण देने के मुद्दे पर घमासान मचा हुआ है। पर, देश की त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। संविधान के अनुच्छेद 243(घ) में प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा भरी जाने वाली कुल सीटों और प्रत्येक स्तर पर पंचायतों में अध्यक्षों के कुल पदों में से महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान है। उत्तर प्रदेश व जम्मू-कश्मीर जैसे कई राज्य व केंद्रशासित प्रदेश अब भी 33 प्रतिशत आरक्षण दे रहे हैं। दूसरी ओर, 21 राज्यों व दो केंद्रशासित प्रदेशों ने महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर नेतृत्व में उनकी भागीदारी को मजबूत किया है। केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय के फरवरी, 2026 के आंकड़ों के अनुसार, देश के निर्वाचित 24,41,781 पंचायत प्रतिनिधियों में से 12,14,885 महिलाएं हैं, जो कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों का 49.75 प्रतिशत है।
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