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जानना जरूरी है: जनमेजय को कैसे लगा ब्रह्महत्या-दोष? द्विजश्रेष्ठ शौनक ने इससे मुक्ति के लिए अश्वमेध यज्ञ कराया

Sun, 19 Jul 2026 08:56 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 19 Jul 2026 08:56 AM IST
सार

गार्ग्य मुनि के वाचाल पुत्र की हत्या करने पर इंद्रोत जनमेजय को ब्रह्महत्या का पाप लगा। द्विजश्रेष्ठ शौनक ने इससे मुक्ति के लिए अश्वमेध यज्ञ कराया।

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How Janamejaya incur Brahma-hatya sin Shaunaka conducts Ashvamedha Yajna for liberation know mythology
जनमेजय को ब्रह्महत्या का पाप लगा, द्विजश्रेष्ठ शौनक ने मुक्ति के लिए अश्वमेध यज्ञ कराया - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी

विस्तार

राजा नहुष और उनकी पत्नी विरजा के छह पराक्रमी पुत्र थे-यति, ययाति, संयाति, आयाति, भव और सुयाति। इनमें सबसे बड़े यति ने राजसुख त्यागकर वैराग्य का मार्ग अपनाया और तपस्वी बन गए। उन्होंने ककुत्स्थ की पुत्री गौ से विवाह किया, किंतु बाद में मोक्षधर्म का अनुसरण करते हुए जीवन ब्रह्मस्वरूप मुनि के रूप में बिताया।

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यति के बाद ययाति राजा बने। उन्होंने अपने पराक्रम से संपूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त की। उनका विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी तथा असुरराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से हुआ। देवयानी से यदु और तुर्वसु उत्पन्न हुए, जबकि शर्मिष्ठा से द्रुह्यु, अनु और पुरु का जन्म हुआ। ययाति अत्यंत साहसी थे। उनके अद्भुत पराक्रम से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने उन्हें स्वर्ण निर्मित एक अत्यंत प्रकाशमान दिव्य रथ प्रदान किया, जिसमें मन के समान वेगशाली, श्वेतवर्ण अश्व जुते हुए थे। वह स्वर्ण निर्मित रथ कहीं भी अवरुद्ध नहीं होता था। उसी रथ पर वह अपनी पत्नी को ब्याह कर लाए थे। उसी के द्वारा दुर्धर्ष राजा ययाति ने केवल छह रातों में संपूर्ण पृथ्वी, देवताओं और दानवों तक को जीत लिया था। वह दिव्य रथ परंपरा से सभी पौरव राजाओं के पास सुरक्षित रहा।
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आगे चलकर कुरुवंशी परीक्षित-पुत्र इंद्रोत जनमेजय को गार्ग्य मुनि ने शाप दिया था, जिसके कारण वह रथ उनके पास से अदृश्य हो गया था। घटना यह थी कि गार्ग्य मुनि का एक पुत्र था, जो अत्यंत वाचाल था। उसे इंद्रोत जनमेजय ने मार डाला, जिससे उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लगा। ब्रह्महत्या के कारण पुरवासियों और जनपद के लोगों ने उनका त्याग कर दिया और उनके शरीर से लोहे जैसी दुर्गंध आती थी। वह इधर-उधर भटकते रहे, पर कहीं भी शांति नहीं मिली। तब दुखी होकर वह शौनक मुनि की शरण में गए। द्विजश्रेष्ठ शौनक ने उनके प्रायश्चित के लिए अश्वमेध यज्ञ कराया। यज्ञ के अंत में स्नान करते ही उनका पाप नष्ट हो गया और शरीर से आने वाली लोहे की गंध भी समाप्त हो गई।
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इसके बाद प्रसन्न होकर इंद्र ने वह दिव्य रथ चेदिराज उपरिचर वसु को प्रदान कर दिया। उनसे वह रथ मगधराज बृहद्रथ, उनके पुत्र जरासंध और अंततः श्रीकृष्ण को प्राप्त हुआ।

राजा ययाति ने संपूर्ण पृथ्वी को पांच भागों में विभाजित कर अपने पांचों पुत्रों में बांट दिया। दक्षिण-पूर्व का राज्य तुर्वसु को, पश्चिम द्रुह्यु को, उत्तर अनु को, उत्तर-पूर्व यदु को तथा मध्यदेश का राज्य पुरु को सौंपा।

राज्य की व्यवस्था सुदृढ़ कर उन्होंने शस्त्र त्याग दिए। इस बीच ययाति वृद्ध हो गए। ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु से कहा, ‘पुत्र! अपनी युवावस्था मुझे दे दो और मेरी वृद्धावस्था स्वीकार कर लो, ताकि मैं कुछ समय और जीवन का अनुभव कर सकूं।’ यदु ने विनम्रता से उत्तर दिया, ‘पिताश्री! मैंने एक ब्राह्मण को इच्छानुसार दान देने का वचन दिया है। जब तक वह ऋण पूरा नहीं कर देता, तब तक आपकी वृद्धावस्था स्वीकार नहीं कर सकता।’

यदु का उत्तर सुनकर ययाति ने उसे शाप दिया कि उसकी संतति कभी मुख्य राजसत्ता की अधिकारी नहीं होगी। इसके बाद उन्होंने तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु से भी आग्रह किया, किंतु किसी ने अपना यौवन नहीं दिया।  परिणामस्वरूप, ययाति ने उन्हें भी शाप दे दिया। अंत में ययाति के सबसे छोटे पुत्र पुरु ने अपनी युवावस्था उन्हें देकर उनकी वृद्धावस्था धारण कर ली। फिर, ययाति ने वर्षों तक सुख भोगा। अंततः उन्हें अनुभव हुआ कि इच्छाएं भोग से नहीं, बल्कि त्याग और वैराग्य से समाप्त होती हैं। उन्होंने पुरु को उसकी युवावस्था लौटा दी और खुद वृद्धावस्था में वनवास चले गए।


ययाति के पांचों पुत्रों-यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु और पूरु-से महान राजवंशों का विस्तार हुआ। यदुवंश और पौरव वंश के राजाओं ने अनेक युगों तक पराक्रम तथा धर्मपालन द्वारा कीर्ति अर्जित की। इन्हीं वंशों से अनेक महान सम्राट, तपस्वी, धर्मरक्षक और महायोद्धा उत्पन्न हुए, जिनकी गाथाएं महाभारत तथा पुराणों में वर्णित हैं।

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