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हमन हैं टैम कबीराना: इस बात पर गर्व होना चाहिए कि हम कबीर उत्तर समय में जी रहे हैं; युग को बांट कर देखना जरूरी
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संत कबीर (फाइल)
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विस्तार
हालांकि इतिहासकारों में तिथि को लेकर एकमत नहीं है। पर एक गणना के मुताबिक कबीर इस साल अपने जन्म के 650 वें साल में प्रवेश कर रहे हैं। कबीर की अहमियत इन सदियों में बढ़ती चली गई है। उनको खूब दोहराया भी जा रहा है। कवियों, शायरों के लिए वे मयार भी हैं, प्रेरणा भी हैं। कबीर हर भारतीय के जीवन में बचपन से ही बहुत चुपके से शामिल होते हैं और फिर आजीवन किरदार का हिस्सा बनकर रहते हैं। कभी सलाह बन कर, कभी बुजुर्ग की डांट बनकर, कभी रास्ता दिखाने वाली रोशनी बनकर।
कबीर को हिंदी का पहला शायर इस गजल के लिए कहा जाता है- “हमन हैं इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या। रहें आजाद जग से, हमन दुनिया से यारी क्या।” इस गजल की जमीन पर निदा फाजली ने कभी एक गजल लिखी थी, जिसका मतला था- “ये दिल कुटिया है संतों की यहां राजा-भिखारी क्या! वो हर दीदार में जरदार है, गोटा-किनारी क्या!” यही निदा फाजली जब दोहों में कमाल कर रहे थे, दोहों को एक विधा के रूप में नई आबरू, नई चमक दे रहे थे, साहित्य की दुनिया ने उनको ‘आधुनिक कबीर’ कहना शुरू कर दिया।
और, क्या ही खूबसूरत इत्तेफाक है कि इम्तियाज़ अली निर्देशित हालिया फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ के एक गीत ‘इश्क मस्ताना’ में गीतकार इरशाद कामिल साहब भी बेइंतिहा खूबसूरती के साथ कबीर साहब की उंगली पकड़कर दूर तक आगे निकल जाते हैं। - “हमन जब साथ हैं तेरे, हमन को इंतजारी क्या, हमन जलवा जवानी का, हमन तो बाज ना आवें, हमन हैं जोश सोहबत का, हमन तो रात भर गावें, हमन हैं रंग होठों का, हमन होठों की सलवट हैं, हमन अंगड़ाई हैं तेरी, हमन ही तेरी करवट हैं।” इसे कहते हैं पुरखों को शिद्दत से याद करना और अगली पीढ़ी तक पहुंचा देना। यही काम गुलजार साहब ने गालिब के संदर्भ में किया है। शायरों, कवियों की यही विरासत, यही वसीयत होती है। इसे ऐसे ही सहेजना और आगे बढ़ाना चाहिए।
कबीर कार्ल मार्क्स से सदियों पहले तार्किक थे, बहुत अर्थों में समाजवादी, राजा राम मोहन राय से सदियों पहले समाज सुधारक थे। उनमें बुद्ध भी थे, मंसूर भी थे, चार्वाक भी थे। कबीर भारत की महान दार्शनिक परंपरा के ऐसे चराग की तरह रोशन हुए कि छह सदियों बाद भी हमारे बाहर भीतर के अंधेरों को कबीर से डर लगता है।
पश्चिम में एक समकालीन दार्शनिक हैं स्लावोज जिजेक। जिन्हें अच्छे अर्थों में हमारे समय का सबसे खतरनाक दार्शनिक माना जाता है। उन्होंने कभी एक इंटरव्यू में कहा था कि पूर्व के तीन लोग मुझे बहुत पसंद हैं- बुद्ध, शंकर और कबीर। मेरी राय है कि कबीर को हम अक्सर कवि या साहित्यिक के रूप में सीमित कर देते हैं, वे एक मुकम्मल दार्शनिक हैं, और ऐसे दार्शनिक जिसने अपने दर्शन को हकीकत की भट्ठी में तपाकर खड़ा किया और धार्मिक सामाजिक सुधार की कड़ी व्यवहारिक परीक्षा में उतारा, यानी उन्हें भारत की ज्ञान परंपरा ही नहीं, सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलनों की परंपरा में रखना बहुत वाजिब है। कबीर की दार्शनिकता तपकर कुंदन हुई वैचारिकी है।
कबीर पश्चिमी या यूरोपियन पुनर्जागरण के अर्थों में एक आधुनिकता बोध वाले कवि दार्शनिक हैं, मुहावरे में अगर पहला आधुनिक भी कह दें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वे उदात्त मानवीय मूल्यों के लोकगायक हैं, जिनकी भूमिका और अहमियत लगातार बढ़ती ही दिख रही है।
कबीर जब यह कहते हैं- “भला हुआ हरि बिसरे, मोरे सिर से टली बला।” वे एक कालजयी स्थापना दे रहे होते हैं। उनकी दार्शनिक भावभूमि न केवल प्राचीन भारतीय विचारों से, बल्कि सूफी मत से भी मिलकर निर्मित होती है। यही खूबी है कि उनके समकालीन गुरु नानक सिख धर्म की स्थापना करते हैं, और उनके बाद के गुरु अंगद देव गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन किया तो कबीर के पद सर्वाधिक मात्रा में महत्वपूर्ण मानकर शामिल किए गए हैं। यूं देखा जाए तो गुरु ग्रंथ साहिब जैसा शायद ही कोई दूसरा ग्रंथ हो जो इतनी साहित्यिकता संजोए हुए है।
कबीर इसलिए बड़े हैं कि वे साधारण से असाधारण की ओर जाते हैं बिना दुरूह हुए। वे गोया दुनिया के कचरे से दुनिया के लिए बिजली बनाते हैं। कबीर को पढ़ना हमारे भीतर कुछ घटित होना है, पर घटते क्रम में नहीं, बढ़ते क्रम में। उनकी हर पंक्ति पाठक से ठहराव मांगती है। इसलिए वे भारतीय कवियों ही नहीं, संतों की परंपरा में भी ट्रेंडसेटर गिने जाने के समुचित अधिकारी हैं। नई शब्दावली में कहें तो वे साढ़े छह सौ साल से भारत के इनफ्लुएंसर हैं जिसकी रीच करोड़ों अरबों में हैं।
हमें बार-बार कबीर के पास लौटना और उनकी तरफ इसलिए देखना पड़ता है कि कबीर दुनियादार भी हैं, और दुनिया से आगे देखने का सलीका भी सिखाते हैं। ये दोनों सलाहियतें किसी संत, कवि या दार्शनिक में एक साथ कम ही मिलती हैं।
उनके होने से दुनिया वह तो यकीनन नहीं है, जो उनके दुनिया में आने से पहले थी, यानी दुनिया के समय काल को हमें कबीर पूर्व और कबीर उत्तर युग विभाजन करने की ज़रूरत है। हम गर्व से कह सकते हैं कि हम कबीर उत्तर समय में जी रहे हैं- ‘हमन हैं टैम कबीराना’। उनके प्रभाव का ठीक-ठीक मूल्यांकन करने के लिए एक अंतर अनुशासनात्मक नजरिये और तरीकों की समझ होना लाजमी है।
कबीर काल के निकष पर, हर कसौटी पर खरे उतरते हुए, ठीक जैसे एक रस्सी पर संतुलन साधे चलते हुए हम तक आए हैं कि अभी भी हर पीढी को पसंद आ जाते हैं, तभी तो जब हंसल मेहता शेयर मार्केट की शुद्ध धन लिप्सा वाली दुनिया पर स्कैम सीरिज बनाते हैं, शिद्दत से लोक-परलोक के दर्शन को कहने के लिए कबीर को याद करते हैं- “मत कर माया को अहंकार, मत कर काया को अभिमान, काया गार से कांची...” तो ये पंक्तियां नई पीढ़ी के युवाओं की जुबां पर नाचने लगती हैं।
कुछ तो बहुत खास रहा होगा कबीर में कि ओशो ने उनको पूर्णिमा का पूरा चांद कहा। ओशो का यह कथन कबीर के लिए एक बार पढ़ने के बाद जेहन में अपनी पुख्ता स्थायी जगह बना लेता है- “कबीर को पीना होता है, चुस्की-चुस्की। और डूबना होता है, भूलना होता है अपने को, मदमस्त होना होता है। भाषा पर अटकोगे, तो चूकोगे, भाव पर जाओगे तो पहुंच जाओगे।” कबीर की तरह कौन आपकी उंगली थाम कर इस दुनिया और उस दुनिया का भेद समझाता है भला!