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मुद्दा: सामाजिक सौहार्द  ही समाधान है, कानून के राज की स्थापना ही विकसित भारत के लिए नजीर

shyoraj singh bechan श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Sat, 18 Jul 2026 08:22 AM IST
सार

भेदभाव की जड़ों का हरा होना समाज के लिए चुनौती बन रहा है। ऐसे में सामाजिक सौहार्द और कानून के राज की स्थापना ही विकसित भारत के लिए नजीर बन सकती है।

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Social harmony is only solution establishing rule of law sets precedent for developed India
भेदभाव की जड़ों का हरा होना समाज के लिए चुनौती (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में एससी-एसटी एक्ट से जुड़े मामले पर सुनवाई करते हुए व्यवस्था दी कि आंगन में कही गई बात भी सार्वजनिक मानी जा सकती है। यानी किसी निजी स्थान पर की गई जाति सूचक टिप्पणी भी सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में आ सकती है। जब जातियों के ऊंच-नीच भेदभाव बचे रहेंगे, तब तक समस्या के समाधान की मांग उठती ही रहेगी। लेकिन जातिभेद छोड़ कर प्रेम-सौहार्द के बीचोंबीच खड़ी इस दीवार को जमींदोज करने की प्रतिबद्धता किसकी है? राजस्थान के सिरोही जिले में मृत्यु भोज में परंपरा के अनुसार घी के मालपुए नहीं परोसने पर तीन दर्जन से अधिक (43) परिवारों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। पीड़ित परिवारों को राशन, पानी और मजदूरी देने से वंचित कर दिया गया। जिला कलेक्टर रोहिताश सिंह के अनुसार जांच जारी है। अलग-अलग रूपों में बहिष्कृत होते ये थोड़े लोग नहीं हैं, डॉ. आंबेडकर ने इन्हें ‘बहिष्कृत भारत’ कहा था।

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उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल और अल्मोड़ा में गैर-जाति, अंतरजातीय प्रेम करने पर ‘ऑनर किलिंग’ जैसी दर्दनाक घटनाएं हुई हैं। 18 साल के दलित युवक केतन को उसकी गैर-दलित जाति की लड़की मित्र ने फोन कर मिलने के लिए बुलाया और उसके परिवार ने पीट-पीटकर निर्मम हत्या कर दी। पांव के नाखून उखाड़े गए। पैरों में कील ठोंके गए। मामला ‘दलित एक्ट’ के तहत भले दर्ज हो गया, पर यह उत्पीड़न पर विराम नहीं है। हरियाणा के हिसार में एक जून को 32 वर्षीय दलित ‘बारू’ की मोटर चोरी के इल्जाम में पिटाई कर कुएं में उल्टा लटका दिया गया। ‘दलित-एक्ट’ के तहत पांच ज्ञात और कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई। हम राजनीति में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हंै, पर क्या हमारा सामाजिक चरित्र लोकतांत्रिक स्वरूप का बन पा रहा है? हम जिन ताजा घटनाओं की बात कर रहे हैं, वे घटनाएं नहीं हमारी मनुष्यता पर जातीयता के धब्बे हैं। जाति घृणा-अनुदारता के सामने मानवीय संवेदना क्या मायने रखती है? दलित उत्पीड़न, अपमान और हिंसा की कोई भी घटना न तो आखिरी है और न ही अपवाद।
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यह सिलसिला देशव्यापी है और अविराम जारी है। कानपुर में सरकारी ‘हैंड पंप’ पर रखे बाल्टी-लोटे से पानी पीने पर चार दबंगों ने 16 वर्षीय दलित किशोर की कपड़े उतरवा कर मुर्गा बनाकर बेरहमी से पिटाई की, जूते में पानी भर कर पिलाया। कथित तौर पर इसके बाद आरोपियों ने खुद पर गंगा जल छिड़का। 13 मई को प्रकाशित खबर के मुताबिक, हल्द्वानी के देवल मल्ला गांव में एक शादी समारोह के दौरान दो दलित भाइयों के साथ मारपीट की गई और उन्हें जाति सूचक गालियां दी गईं। ‘उमेश टम्टा’ और ‘शुभम टम्टा’ शादी में डीजे चलाने का काम कर रहे थे। उमेश जब वहां रखे घड़े से पानी पीने गया, तो उसे दूल्हे के परिवार के लोगों ने एक थप्पड़ मारा। जाहिर है, भेदभाव की जड़ों का हरा होना समाज के लिए चुनौती बन रहा है और सद्भाव, समता और निर्जीव होती जा रही, प्रेम और सौहार्द की टहनी-पत्तियां चिंता का सबब बन रही हंै। ऐसे में सामाजिक सौहार्द और कानून के राज की स्थापना ही विकसित भारत के लिए नजीर बन सकती है और समाज व देश को तरक्की के मार्ग पर अग्रसर कर सकती है।
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-लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सीनियर प्रोफेसर तथा पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष हैं।

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