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पांच जन्मों बाद कैसे मिटे अशुभ कर्म: चींटा-चींटी के परस्पर विवाद का रहस्य, राजा ब्रह्मदत्त को ऐसे मिला मोक्ष

Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 29 Mar 2026 06:15 AM IST
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सार
ब्राह्मण के वचन सुनकर राजा को स्मरण हुआ कि वह कई जन्मों से कर्मों के बंधन में बंधे हुए थे और पितरों के रुष्ट हो जाने से पतित हो गए थे। अंतत: कठोर साधना के प्रभाव से वह परम पद को प्राप्त हुए।
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How to erase bad karma after 5 lifetimes: secret of conflict between ants, King Brahmadatta attained salvation
पांच जन्मों बाद कैसे मिटे अशुभ कर्म - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

किसी समय पांचाल पर राजा विभ्राज का शासन था। विभ्राज की मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र ब्रह्मदत्त को राजा बना दिया गया। ब्रह्मदत्त अत्यंत पराक्रमी, शास्त्रों के ज्ञाता, योगविद्या में निपुण और प्राणियों की भाषा समझते थे। उनकी पत्नी देवल की कन्या संनति थी, जो स्वयं ब्रह्मवादिनी और धर्मनिष्ठ थी। दोनों मिलकर राज्य का संचालन करते थे। एक दिन ब्रह्मदत्त अपनी पत्नी संनति के साथ उद्यान में विहार करने गए। वहां उन्होंने देखा कि एक चींटा और चींटी परस्पर विवाद कर रहे थे। ब्रह्मदत्त उनकी बातचीत ध्यान से सुनने लगे।


काम-विह्वल चींटा अपनी पत्नी से गिड़गिड़ाकर कह रहा था, ‘प्रिये! तुम इस संसार में सबसे सुंदर हो। तुम्हारी चाल, वाणी और रूप सब अद्भुत हैं। तुम मुझसे इतना प्रेम करती हो, फिर किस कारण मुझसे रुष्ट हो गई हो?’ क्रोधित चींटी ने तीखे स्वर में उत्तर दिया, ‘धूर्त! व्यर्थ की मीठी बातें मत करो। कल ही तुमने मेरा तिरस्कार करके लड्डू का चूर्ण दूसरी चींटी को दिया था। क्या यह सत्य नहीं है?’ चींटा लज्जित होकर बोला, ‘प्रिये! वह मेरी भूल थी। तुम्हारे समान रूप देखकर मैं भ्रमित हो गया। अब मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा। मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूं, मुझे क्षमा कर दो।’ उसकी विनम्रता और पश्चात्ताप देखकर चींटी का क्रोध शांत हो गया और वह प्रसन्न हो गई। यह दृश्य देखकर ब्रह्मदत्त को हंसी आ गई। उन्हें हंसता देखकर रानी संनति को बहुत आश्चर्य हुआ। रानी ने पूछा, ‘राजन! अचानक आप क्यों हंसे? इसका कारण क्या है?’

राजा ने सारी बात रानी को बता दी, परंतु रानी को विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने कहा, ‘यह असत्य है! कोई मनुष्य, चींटियों की भाषा कैसे समझ सकता है? अवश्य ही आपने मेरे बारे में कुछ सोचकर हंसी की है।’


रानी ने कहा, ‘यदि आप सत्य नहीं बताएंगे, तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगी।’ रानी के कठोर वचनों से राजा मौन हो गए। वह सत्य जानते हुए भी उसे सिद्ध नहीं कर पा रहे थे। तब उन्होंने इस रहस्य को स्पष्ट करने के लिए भगवान श्रीहरि की आराधना करने का निश्चय किया। वह सात दिनों तक ध्यान में लीन रहे। सातवीं रात भगवान विष्णु ने राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, ‘राजन! प्रातःकाल एक वृद्ध ब्राह्मण तुम्हें इस घटना का रहस्य बताएगा।’

अगले दिन राजा अपनी पत्नी और मंत्रियों के साथ नगर से बाहर निकले। उन्होंने एक वृद्ध ब्राह्मण को यह कहते सुना, ‘जो पहले कुरुक्षेत्र में ब्राह्मण, दाशपुर में व्याध, कालंजर पर्वत पर मृग और मानसरोवर में चक्रवाक पक्षी के रूप में जन्मे थे, वही अब यहां ब्रह्मदत्त के रूप में निवास कर रहे हैं।’ यह वचन सुनते ही राजा भूमि पर गिर पड़े। उन्हें अपने पूर्वजन्मों का स्मरण हो गया। उन्होंने देखा कि वह अनेक जन्मों से कर्मों के बंधन में बंधे हुए थे और पितरों के रुष्ट हो जाने से पतित हो गए थे। यह जानकर वह विलाप करने लगे। इसके बाद राजा ब्रह्मदत्त ने श्राद्ध और पितृभक्ति का महत्व समझा। उन्होंने उस ब्राह्मण को कई गांव और धन दान में दिया। फिर अपने पुत्र विष्वक्सेन को राज्य सौंप दिया और वैराग्य धारण कर वन चले गए।

कुछ समय बाद राजा, उनके मंत्री और रानी संनति सभी वन में पुनः एकत्र हुए। अब संनति का क्रोध समाप्त हो चुका था। वह विनम्र होकर बोलीं, ‘राजन! यह सब मेरे ही कारण हुआ है।’ यह सुनकर राजा ने उत्तर दिया, ‘नहीं, रानी! यह तुम्हारी कृपा है कि मुझे सत्य का ज्ञान हुआ और वैराग्य प्राप्त हुआ।’ कठोर साधना के प्रभाव से उन्होंने अंततः ब्रह्मरंध्र के मार्ग से प्राण त्याग दिए और परम पद को प्राप्त हुए। इस प्रकार वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो गए। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि पितरों की कृपा से मनुष्य को आयु, धन, विद्या, सुख, संतान और राज्य की प्राप्ति होती है, और अंत में मोक्ष भी संभव होता है। जो मनुष्य श्रद्धा से इस ब्रह्मदत्त की कथा का श्रवण या पाठ करता है, वह दीर्घकाल तक ब्रह्मलोक में सम्मान प्राप्त करता है।
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