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नए मोर्चे और आशंकाएं: खाड़ी के हालात पर सक्रिय हो अंतरराष्ट्रीय जमात, अन्यथा जटिल होंगी स्थितियां
अमर उजाला
Published by: Pavan
Updated Tue, 03 Mar 2026 08:08 AM IST
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तेहरान में हमले के बाद का मंजर
- फोटो :
ANI
विस्तार
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई की हत्या ने न केवल तेहरान में सत्ता के शीर्ष पर एक बड़ा शून्य पैदा किया है, बल्कि पूरे क्षेत्र में प्रतिशोध की लहर को तेज कर दिया है। इस दौरान, ईरान समर्थित हिजबुल्ला के संघर्ष में कूदने और ईरान द्वारा साइप्रस में ब्रिटिश एयरबेस पर हमला किए जाने से पश्चिम एशिया में चल रही जंग में नए मोर्चे खुलने की आशंका भी पैदा हो गई है।इसी तरह, बदले की कार्रवाई करते हुए ईरान द्वारा जिस तरह से बहरीन, कुवैत और कतर समेत खाड़ी के आठ देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए गए हैं, उससे पूरा पश्चिमी एशिया युद्ध की जद में आता दिख रहा है। यह देखते हुए कि इस्लामी गणराज्य इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान रहा है, अब ईरान के पीछे हटने की संभावना कम ही दिख रही है। देखना यह है कि हिजबुल्ला के बाद यमन में हूती विद्रोही, इराक में पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स जैसे तेहरान के क्षेत्रीय सहयोगी, जो इस्राइल के हमलों से बेशक कमजोर हो चुके हैं, फिर भी पूरे क्षेत्र को अस्थिर बनाने की क्षमता रखते हैं, जंग में कब और किस तरह शामिल होते हैं।
दरअसल, खामनेई की हत्या, 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान के लिए सबसे बड़ा आंतरिक और बाहरी संकट है। 36 वर्षों से अधिक समय तक देश की सत्ता संभालने वाले इस नेता की मौत के बाद भले ही अंतरिम परिषद सक्रिय हो गई हो, लेकिन ईरान जिस तरह से अमेरिका और उसके समर्थक देशों के प्रति आक्रामक रुख अपनाए हुए है और बातचीत तक के लिए भी तैयार नहीं है, उससे लगता नहीं कि यह जंग जल्दी खत्म होने वाली है। ऐसे में, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तत्काल कूटनीतिक प्रयास तेज करने होंगे।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपात बैठकें, चीन और रूस की मध्यस्थता, या क्षेत्रीय देशों की संयुक्त अपील- ये सभी विकल्प अब भी उपलब्ध हैं। लेकिन समय तेजी से बीत रहा है। अगर प्रतिशोध की यह शृंखला नहीं थमी और वैश्विक शक्तियां भी खेमों में बंटकर प्रतिक्रिया देती रहीं, तो स्थितियां जटिल ही होंगी और पश्चिम एशिया में आकार ले रहे संघर्ष को एक पूर्ण पैमाने का युद्ध बनते देर नहीं लगेगी, जो अनगिनत निर्दोषों की जान ही नहीं लेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और शांति को भी गहरी चोट पहुंचा सकता है।
भारत के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि देश की ऊर्जा सुरक्षा, पश्चिम एशिया में बसे लाखों भारतीयों की सुरक्षा और व्यापारिक हित युद्ध से सीधे प्रभावित हो सकते हैं। यह समय किसी के पक्ष में खड़े होने से अधिक, संतुलित व व्यावहारिक कूटनीति अपनाते हुए तनाव कम करने की दिशा में प्रयास करने का है।