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ईरान: कुछ लोग कभी खुश नहीं हो सकते, हालांकि अब अधिकांश सरकार के खिलाफ

वीरेंदर कपूर, लेखक एवं शिक्षाविद Published by: Pavan Updated Tue, 03 Mar 2026 08:25 AM IST
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सार
1970 के दशक में जब ईरान विकास की राह पर था, तब भी इससे कुछ लोग खुश नहीं थे। अमेरिका व इस्राइल ने जो कुछ किया, उससे भी कुछ लोग खुश नहीं हैं। बावजूद इसके कि ईरान के करीब 80 फीसदी लोग वहां की सरकार को हटाने के पक्ष में ही हैं।
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Iran: Some people will never be happy, even though most are now against the government
ईरान: कुछ लोग कभी खुश नहीं हो सकते - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बीते शनिवार (28 फरवरी, 2026) को पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू हो गया। अमेरिकियों ने (ऑपरेशन एपिक फ्यूरी) चलाया, जिसमें इस्राइल (लॉयन्स रोअर) भी शामिल हो गया। कुछ ही घंटों में ईरान पर भीषण बमबारी हुई और एक दिन के अंदर उन्होंने ईरान के रक्षा मंत्री, शीर्ष जनरलों और सर्वोच्च नेता खामनेई को मार गिराया। वर्ष 1979 से पहले ईरान 'पश्चिम एशिया का पेरिस' था। ईरान के शाह ने ईरान को आधुनिक बनाने में अहम भूमिका निभाई।


  उन्होंने 1963 में ईरान को पाश्चात्य रंग-ढंग में ढालने के लिए श्वेत क्रांति शुरू की। तेल से अर्जित अकूत दौलत ने बांध, हाईवे बनाने में मदद की और युवा स्नातकों को पढ़ना-लिखना सिखाने के लिए ग्रामीण इलाकों में भेजा। ईरान ने अपनी कारें ‘पेकान’, स्टील और उपभोक्ता सामग्री बनानी शुरू कर दी। 1970 के दशक तक, वहां की अर्थव्यवस्था हर साल 9-10 फीसदी की दर से बढ़ रही थी। ऊपर से लेकर नीचे तक आधुनिकीकरण ने देश को एक क्षेत्रीय शक्ति केंद्र बना दिया। लेकिन इतना सब विकास होने के बावजूद वहां के कुछ लोग हमेशा दुखी रहते थे, चाहे जो भी हो जाए। कुछ लोगों को लगा कि आधुनिकता के कारण ईरान इस्लामी परंपरावादी संस्कृति से दूर जा रहा है और वे सरकार बदलना चाहते थे। खासकर व्यापारी वर्ग और मौलवियों को लगा कि शाह का पाश्चात्यीकरण का अभियान ईरानी-इस्लामी पहचान को खत्म कर रहा है। लोगों को उनके अपने ही लोगों द्वारा बेवकूफ बनाना मुश्किल नहीं है। देश अपनी सनक में उसी के खिलाफ चला गया, जिसने उन्हें आधुनिक बनाया था।


16 जनवरी, 1979 को शाह, मोहम्मद रजा पहलवी इलाज के लिए अवकाश पर ईरान छोड़कर मिस्र चले गए। 14 साल से निर्वासित अयातुल्ला खुमैनी देश की बागडोर संभालने के लिए लौटने वाले थे। हालांकि कुछ समझदार लोग ऐसा नहीं चाहते थे। 16 जनवरी से 31 जनवरी, 1979 तक का पखवाड़ा बहुत ज्यादा तनाव में बीता। प्रधानमंत्री बख्तियार ने हवाई अड्डे बंद करके खुमैनी की वापसी को रोकने की कोशिश की। एक फरवरी, 1979 को बड़े विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार को हवाई मार्ग फिर से खोलना पड़ा, तब अयातुल्ला खुमैनी तेहरान हवाई अड्डे पर उतरे। विदेशी अपनी जान बचाने के लिए ईरान से भाग गए। मुझे याद है कि मेरे रिश्तेदार कई दिनों तक बिना खाए-पीए वापस लौटे थे-एक के पास तो अपना काम खत्म करने का भी समय नहीं था, क्योंकि वह उस समय अपने कपड़े प्रेस कर रही थी! धर्मनिरपेक्ष ‘बुद्धिजीवी’, छात्र, अयातुल्ला खुमैनी के धार्मिक अनुयायी शाह को हटाने के एक ही लक्ष्य के साथ एकजुट हुए। और ईरान को खुद ईरानियों ने ही अंधकार के युग में धकेल दिया!

नए शासन ने देश को पूरी तरह बदल दिया और हालात बिगड़ने लगे। 30-31 मार्च, 1979 को एक जनमत संग्रह हुआ, जिसमें ईरानियों से पूछा गया कि वे इस्लामी गणराज्य चाहते हैं या नहीं। उत्तर केवल ‘हां’ या ‘न’ में देना था। एक अप्रैल, 1979 को खुमैनी ने जनमत संग्रह की जीत का ऐलान किया (जिसे कथित तौर पर 98 फीसदी समर्थन मिला) और आधिकारिक तौर पर ईरान के इस्लामी गणराज्य के उदय की घोषणा की गई। उन्होंने फिर से इसकी मांग की। देश को सैन्य ताकत की तरफ धकेला गया, जिसमें मिसाइलों और रिवोल्यूशनरी गार्ड पर ध्यान केंद्रित किया गया, ठीक हिटलर के एसएस (रक्षा बल) की तरह, जो सरकार के प्रति वफादार थे।

ईरान परमाणु हथियार बनाना चाहता था, लेकिन हमेशा कहता रहा कि यह शांतिपूर्ण मकसद के लिए है। ईरान ने 60 फीसदी यूरेनियम (400 किलोग्राम से अधिक) का संवर्धन किया है, जो एक खतरनाक सीमा है। यह ईरान को कागजी तौर पर असैन्य परमाणु शक्ति बने रहने की काबिलियत देता है, जबकि वास्तविकता यह है कि अगर वह परमाणु हथियार बनाने का राजनीतिक फैसला लेता है, तो एक सक्रिय बम बनाने में उसे महीनों या वर्षों के बजाय कुछ दिन या हफ्ते ही लगेंगे। हालांकि इसे 90 फीसदी 'हथियार की श्रेणी' नहीं कहा गया है, लेकिन यह बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाने में सक्षम है और परमाणु हथियार कार्यक्रम में आखिरी रुकावट है। 60 फीसदी संवर्धित यूरेनियम का इस्तेमाल करके कामचलाऊ परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं। हालांकि यह उपकरण मानक 90 फीसदी हथियार से काफी ज्यादा बड़ा और भारी होगा, फिर भी यह हिरोशिमा जैसा उत्सर्जन (15 किलो टन) पैदा कर सकता है। हिरोशिमा में पहले दिन 80,000 लोग मारे गए और पांच महीनों के अंदर कुल 1,40,000 लोग मारे गए।

क्या दुनिया इसे स्वीकार कर सकती है, यह सबसे बड़ा सवाल है। आप अमेरिका व इस्राइल के दबदबे की बात कर सकते हैं; लेकिन मुसीबत आपके सामने है। उनके नेतृत्व का संदेश साफ है। अगर वे पूरी तरह से बर्बाद हो जाते हैं, तो वे यह पक्का करना चाहते हैं कि आसपास का इलाका और तेल व व्यापार के जरिये वैश्विक अर्थव्यवस्था भी उनके साथ बर्बाद हो जाए। देखिए, अभी पूरे पश्चिम एशिया में क्या हो रहा है। ईरान ने अमेरिकी संपत्तियों को निशाना बनाकर इस्राइल, अबू धाबी, दुबई, बहरीन, कतर, कुवैत, इराक, जॉर्डन और सीरिया पर हमला किया है तथा उन्हें भारी नुकसान हुआ है। हालांकि अमेरिकियों और रूसियों के पास हजारों परमाणु हथियार हैं, लेकिन लगता है कि उनके पास निगरानी एवं संतुलन की क्षमता है। दूसरे परमाणु हथियार संपन्न देशों के पास भी ऐसा ही है। ईरान के मौजूदा खानाबदोश शासन पर समझदारी के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता। बिल्कुल अनूठे हथियार के जरिये इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने उन्नत क्षमताओं का इस्तेमाल करके 'निर्णायक और अफसोसनाक सजा' देने की कसम खाई है। हालांकि उन्होंने उनका नाम नहीं बताया है, लेकिन खतरा भयावह है। वे अब हताश हैं और अपने साथ-साथ दूसरों को भी बर्बाद कर सकते हैं।

ज्यादातर ईरानी इस सरकार को हटाना चाहते हैं। लगभग 80 फीसदी लोग इसका विरोध करते हैं और सिर्फ 20 फीसदी लोग ही इसका समर्थन करते हैं। अमेरिका ने जरूर विरोधी समूहों को तैयार किया होगा, जो सरकार बदलने के लिए बहुत जरूरी है। कोई नहीं जानता कि इस युद्ध का नतीजा किसके पक्ष में जाएगा, लेकिन यह तो पक्का है कि यह सबकी जेब पर भारी पड़ेगा। रूस को तेल बेचने की इजाजत मिल सकती है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य पर कब्जा है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम सभी देशवासी एकजुट रहें और अपने देश की मौजूदा स्थिर सरकार का साथ दें। कुछ लोगों की राय अलग हो सकती है, लेकिन आपको इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। बुराई करने वालों को दूर रखें। -edit@amarujala.com
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