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इस साल हो जाए कुछ हवा, मिट्टी, पानी की बातें
अनिल प्रकाश जोशी
Published by: अनिल प्रकाश जोशी
Updated Sun, 03 Jan 2021 02:56 AM IST
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nature
- फोटो : amar ujala
नए साल की अन्य प्राथमिकताओं के बीच आज भी प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के प्रति हमारी चुनौतियां बरकरार हैं। इस सदी के पिछले दो दशकों में हमने इस पर चर्चा जरूर की, पर अब भी हम उन संकल्पों से दूर हैं, जो हमने इसे बेहतर करने के लिए थे। विकास जैसा शब्द हमें विनाश की तरफ ज्यादा ले गया। बस मुट्ठी भर शहर और कस्बे उस विकास का दम भर सकते हैं, लेकिन सवाल जब गांव का होगा, तो वे आज भी उस विकास से बहुत दूर हैं। शहर और कस्बे भी आज विकास के कारण विनाश की तरफ बढ़ चुके हैं। बड़े शहरों की हवा की बात हो या फिर सूखती नदियों की, हमने व्यावहारिक समाधान निकालने की कोशिश नहीं की।
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अपने देश में पर्यावरण की चिंता 1982 में तब शुरू हुई, जब भोपाल की गैस त्रासदी से अनेक लोगों की जान गई थी। वर्ष 1986 में हमने हवा, मिट्टी और जल संरक्षण के लिए कुछ नियम तैयार किए और यह कानूनी शृंखला बढ़ती चली गई व कई तरह के नियम-कानून हमारे बीच में आए। वैसे तो देश में वर्ष 1638 से 1800 के आसपास मुगलों ने जब भारी संख्या में पेड़ काट डाले थे, तब अकबर जैसे महान शासक ने शिकार बंद कर वन संरक्षण का एक बड़ा उदाहरण पेश किया था। ब्रिटिशों के समय में भी शोर-शराबे के लिए वर्ष 1853 में कानून लाए गए। स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1950 में जब संविधान बना, तब किसी भी कानून में पर्यावरण और प्रकृति की कोई हिस्सेदारी नहीं थी। ये कानून इस पर ज्यादा केंद्रित थे कि हम किस तरह गरीबी से मुक्त हो सकते हैं।
लेकिन वर्ष 1972 में यूनाइटेड नेशन कॉन्फ्रेंस ह्यूमन इन्वायर्नमेंट को लेकर स्वीडन में हुई बैठक में हममें प्रकृति को बचाने की चिंता पैदा हुई। वर्ष 1972 में एक बड़ी घोषणा हुई, जिसे स्टॉकहोम डिक्लेरेशन कहा गया। उसी दौरान 1976 में भारतीय संविधान में संशोधन कर अनुच्छेद 48 ए और 51 ए जोड़े गए, जिनमें उल्लिखित था कि किस तरह हमें हवा, मिट्टी और पानी बचाना चाहिए। उससे पहले 1974 में लाए गए 42 वें संविधान संशोधन में कहा गया कि प्रकृति के संरक्षण के लिए काम करना राज्यों की जिम्मेदारी है। अनुच्छेद 47 में कहा गया कि जीवन को बेहतर बनाने का दायित्व राज्य की जिम्मेदारी का हिस्सा हो। फिर 51 ए आर्टिकल भी आया, जिसका मतलब था कि हर व्यक्ति एवं संगठन का दायित्व होगा कि वे प्रकृति के संरक्षण के प्रति गंभीर हों। समय-समय पर न्यायपालिका ने इसमें जरूरी दखल दिया। इन सबके बावजूद गंभीर नतीजे नहीं आए। सच तो यह कि आर्टिकल 42 का जिक्र करके हमने अपने अधिकारों की तो चिंता की, पर कभी अनुच्छेद 51 ए को गंभीरता से नहीं लिया, जो प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के दायित्व की याद दिलाता है।
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने कहा कि उदासीनता की अति हो चुकी है और प्रत्येक देश को अब प्रकृति के संरक्षण के लिए चिंतित होना चाहिए। हम प्रकृति का कम से कम उपभोग करें, तभी पृथ्वी बचेगी। जब कोरोना महामारी ने दुनिया की चूलें हिला दी है, तब संयुक्त राष्ट्र महासचिव की यह टिप्पणी बहुत अर्थपूर्ण है। आज पारिस्थितिक जिम्मेदारी पर व्यापक रूप से विचार करने की जरूरत है। यानी अगर आप प्रकृति का उपभोग करते हैं, तो जोड़ने के प्रति भी उतना ही दायित्व महसूस करें। व्यक्ति हो, संगठन हो या राज्य-प्रकृति के नियम का पालन करना सबका दायित्व होना चाहिए। तभी हम प्रकृति व पर्यावरण का संरक्षण कर सकते हैं। हर राज्य और संगठन का इकोलॉजिकल ऑडिट होना चाहिए।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अपनी स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी के तहत बहस की शुरुआत कर एक ऐतिहासिक पहल की है। पिछले महीने हुई इस वर्चुअल बैठक में सभी लोगों ने इस पर चर्चा की कि लोग किस तरह अपना पारिस्थितिक दायित्व निभा सकते हैं। न्यायपालिका ने भी महसूस किया कि हम केवल नियमों पर निर्भर नहीं रह सकते और नियमों के उल्लंघन के बाद मिले दंड से भी लाभ नहीं होता, क्योंकि प्रकृति का नुकसान तो हो ही जाता है। इसलिए जहां अब राज्य को कटिबद्ध होना है, वहीं राज्य में सक्रिय तमाम संस्थानों को भी अपना दायित्व समझना होगा। लिहाजा सरकारें इस तरह के निर्देश तैयार करते हुए जागरूकता अभियान के तहत पारिस्थितिक दायित्व के प्रति चेते और चेताए। निर्देश को तीन हिस्सों में बांट दिया गया। जैसे, राज्य को उच्च न्यायालय के 2018 के आदेश के अनुसार सकल पर्यावरण उत्पाद का अनुपालन करना होगा, राज्यों में स्थित तमाम संस्थान प्रकृति का जितना उपभोग करते हैं, उसका ऑडिट करें और उसके रिटर्न के रास्ते आएं, और संभव हो, तो शहर में रहने वाले लोग भी प्रकृति के उत्पादों के उपभोग की वापसी के बारे में सोचें।