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किसी रोते हुए को हंसाया जाए: व्यक्ति के लिए अकेले में रोना सेल्फ थेरेपी जैसा

डाना जी स्मिथ, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: Nitin Gautam Updated Sun, 12 Apr 2026 06:36 AM IST
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सार

आंसू संकेत होते हैं कि व्यक्ति को मदद, सहारे या साथ की जरूरत है, खासकर तब, जब वह खुद को अकेला व असहाय महसूस करे।

tears science in human how it is self therapy
आंसू के पीछे का विज्ञान - फोटो : फ्रीपिक
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विस्तार

मनुष्य ही नहीं, दुनिया की दूसरी प्रजातियां भी आंसू निकालती हैं। पर वैज्ञानिकों का मानना है कि इन्सान ही ऐसी प्रजाति है, जो भावनाओं के कारण भी रोती है। यही बात इन्सानों को बाकी जीवों से खास बनाती है। आमतौर पर जीवों की आंखों से दो तरह के आंसू निकलते हैं। आंखों को नम व सुरक्षित बनाए रखने के लिए निकलने वाले आंसू बेसल कहलाते हैं, जबकि धूल, धुआं या कोई दूसरी बाहरी चीज से आंखों में जलन होने पर रिफ्लेक्स आंसू निकलते हैं। पर इन्सान तीसरे प्रकार के आंसू भी बहाता है, जिन्हें ‘भावनात्मक आंसू’ कहा जाता है। ये तब निकलते हैं, जब व्यक्ति दुखी, तनावग्रस्त, या बेहद खुश या किसी गहरी भावना से प्रभावित होता है।
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बेसल आंसू इतने सामान्य होते हैं कि हम अक्सर उन्हें महसूस भी नहीं कर पाते। वहीं, रिफ्लेक्स और भावनात्मक आंसुओं में तरल की मात्रा अधिक होती है। इसी वजह से प्याज काटते समय या किसी भावुक क्षण के दौरान आंसू बहने लगते हैं। आंसू आंखों के ऊपर स्थित विशेष अश्रु ग्रंथियों से निकलते हैं, जिन्हें मस्तिष्क के निचले हिस्से (ब्रेनस्टेम) की कोशिकाएं नियंत्रित करती हैं। जब आंखों में कोई बाहरी चीज जलन पैदा करती है, तो आंखों की नसें तुरंत ब्रेनस्टेम को संकेत भेजती हैं कि आंसू बनाकर उस परेशानी को बाहर निकाला जाए। भावनात्मक मामलों में, मस्तिष्क के अन्य हिस्से इन कोशिकाओं को सक्रिय करते हैं।
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इन्सानी रुदन पर शोध करने वाले विशेषज्ञ डॉ. एड विंगरहोएट्स बताते हैं कि जोर से रोते समय चेहरे की मांसपेशियां सिकुड़ती हैं। इससे आंखों पर दबाव पड़ता है, जो आंसू बनाने वाली ग्रंथियों को सक्रिय कर देता है। यही कारण है कि जम्हाई लेने, जोर से हंसने या उल्टी होने पर भी आंसू आ जाते हैं। पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी में मनोरोग व मनोविज्ञान की एसोसिएट प्रोफेसर लॉरेन बाइल्स्मा कहती हैं कि आंसू लोगों को हमारी भावनाओं के बारे में आसानी से बता देते हैं। डॉ. विंगरहोएट्स का कहना है कि अत्यधिक सहानुभूति रखने वाले लोग अधिक रोते हैं। हालांकि, शराब पीने या नींद पूरी न होने से भी इन्सान जल्दी भावुक होकर आसानी से रो पड़ता है। एक बड़े अध्ययन में शामिल आधे से अधिक लोगों ने बताया कि रोने के बाद उन्हें सुकून मिला।

विशेषज्ञों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति अकेले में रोता है, तो यह एक तरह की ‘सेल्फ-थेरेपी’ बन जाती है। डॉ. बाइल्स्मा बताती हैं कि रोना व्यक्ति को भावनात्मक समस्या के बारे में गहराई से सोचने के लिए मजबूर करता है। इससे उस स्थिति को समझने व निपटने में मदद मिलती है। डॉ. रोटेनबर्ग के अनुसार, आंसू संकेत होते हैं कि व्यक्ति को मदद, सहारे या साथ की जरूरत है, खासकर तब, जब वह खुद को अकेला व असहाय महसूस करता है।
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