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चुनाव के पहले जुआ: महिला आरक्षण पर चर्चा जरूरी, लेकिन ये सही समय नहीं

पी. चिदंबरम, अमर उजाला Published by: Nitin Gautam Updated Sun, 12 Apr 2026 06:57 AM IST
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सार
सरकार महिला आरक्षण बिल के लिए संसद सत्र बुलाने की जल्दी में है। बिल पास हुआ तो चुनाव में प्रचार करेगी और नहीं हुआ तो दोष विपक्ष पर डालेगी।
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women reservation bill in parliament bjp strategy to target opposition
महिला नेताओं के साथ पीएम मोदी - फोटो : पीटीआई

विस्तार

संसद के दोनों सदनों को 2 अप्रैल, 2026 को बजट सत्र के वित्तीय कार्य पूरे होने के बाद स्थगित कर दिया गया। ऐसा करना उचित था, क्योंकि असम, केरल और पुदुचेरी में 9 अप्रैल को विधानसभा चुनाव होने थे और सांसदों के पास अपने क्षेत्रों में जाकर चुनाव प्रचार करने के लिए बहुत कम समय बचा था। इसके अलावा, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में नामांकन प्रक्रिया 30 मार्च से शुरू हो चुकी थी। तमिलनाडु में मतदान 23 अप्रैल और पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को होना था। ऐसे में सांसद अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लौटने के इच्छुक थे। आम धारणा यही थी कि अप्रैल के अंत तक कोई जरूरी संसदीय काम शेष नहीं है।


सच में कोई जरूरी काम नहीं था। जो काम बचा था, वह सिर्फ यह सुनिश्चित करना था कि चल रहे चुनाव बिना किसी बाधा के पूरे हो जाएं, लेकिन एसआईआर कोई साधारण भूल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चाल थी, जिसका उद्देश्य लाखों नागरिकों को मताधिकार से वंचित करना था। चुनावी प्रक्रिया सामान्य रूप से आगे बढ़ रही थी। पश्चिम बंगाल में एसआईआर से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था। दुर्भाग्य से यह तथ्य सामने नहीं लाया गया कि प्रभावित राज्यों-केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल-में औसतन 10 प्रतिशत वयस्क आबादी को मतदाता सूची से हटा दिया गया है।


ऐसा प्रतीत होता है कि बीजेपी के उच्च स्तर पर यह विचार पैदा हुआ कि तमिलनाडु (234 सीटें) और पश्चिम बंगाल (294 सीटें) जैसे बड़े राज्यों में मतदान से पहले कोई विवाद खड़ा किया जाए। संसदीय कार्य मंत्री को मल्लिकार्जुन खड़गे के सामने ‘संविधान के 106वें संशोधन अधिनियम को लागू करने’ का मुद्दा उठाने के निर्देश दिए गए। यह संशोधन सितंबर, 2023 में संसद द्वारा पारित किया गया था, लेकिन 30 महीनों तक सरकार ने इसे नजरअंदाज किया। अचानक सरकार सक्रिय हो गई। मंत्री और विपक्षी दलों के बीच पत्राचार हुआ। खड़गे ने सुझाव दिया कि 29 अप्रैल के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए। 

26 मार्च के मंत्री के पत्र में कहा गया कि इतनी देर से महिलाओं के आरक्षण के लागू होने में देरी होगी और 2029 के आम चुनाव तक इसे लागू करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन यह तर्क पूरी तरह निराधार है-16 अप्रैल और 29 अप्रैल में कोई खास अंतर नहीं है। आखिर बीजेपी को संसद में महिलाओं के आरक्षण को तेजी से लागू करने का विचार कब आया? निश्चित रूप से तब नहीं, जब सितंबर 2023 में यह संशोधन पारित हुआ था। उस विधेयक की भाषा ही ऐसी थी कि आरक्षण 2029 के बाद ही लागू हो सकता था, क्योंकि अनुच्छेद 334 ए के अनुसार यह तभी प्रभावी होगा, जब नई जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाए। इस विधेयक में ‘बाद’ शब्द को तीन बार क्यों शामिल किया गया, यह प्रश्न पहले भी उठाया गया था। सरकार ने तब कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। पिछली जनगणना और परिसीमन में लगे समय (लगभग 6 वर्ष) को देखते हुए यह स्पष्ट था कि यह संशोधन एक धीमी प्रक्रिया का हिस्सा है।

अब अचानक सरकार 16-18 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुलाने की जल्दी में है। अनुमान है कि सरकार लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने और उनमें एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव ला सकती है। प्रधानमंत्री ने भी इस संभावना की पुष्टि कर दी है। ऐसा करने के लिए संविधान संशोधन आवश्यक होगा, जिसके लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत चाहिए-जो बीजेपी और उसके सहयोगियों के पास नहीं है। फिर भी सरकार यह जोखिम उठा रही है। संभवतः सरकार को उम्मीद है कि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के विपक्षी सांसद चुनाव के कारण अनुपस्थित रहेंगे, जिससे बिल पास कराना आसान हो सकता है। चाहे बिल पास हो या न हो, बीजेपी इस मुद्दे को चुनावी प्रचार में इस्तेमाल करेगी। अगर बिल पास हो गया, तो वह इसे बड़ी उपलब्धि बताएगी और अगर नहीं हुआ तो इसका दोष विपक्ष पर डालेगी। हालांकि, लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाकर 816 करना कई समस्याएं पैदा कर सकता है-सदन बहुत बड़ा और असुविधाजनक हो जाएगा, सांसदों को बोलने का अवसर कम मिलेगा और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का असंतुलन बढ़ेगा, खासकर दक्षिणी राज्यों के लिए। बीजेपी की रणनीति फूट डालो और राज करो वाली है। इस पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन यह सही समय नहीं है।
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