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कूटनीति की परीक्षा: पश्चिम एशियाई संकट, नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था की भी परीक्षा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitin Gautam Updated Mon, 13 Apr 2026 07:30 AM IST
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सार
अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता के विफल होने से पश्चिम एशिया एक बार फिर गंभीर अस्थिरता और अनिश्चितता के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है। चूंकि यह संकट एक तरह से वैश्विक व्यवस्था की भी परीक्षा है, अतः कूटनीति की मेज को फिर से सजाना जरूरी है, क्योंकि इसके विकल्प कहीं अधिक खतरनाक हैं।
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west asia crisis test for rule based world order
पश्चिम एशिया संकट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में चली 21 घंटे लंबी मैराथन वार्ता, जिसे सिर्फ दो देशों के बीच समझौते की कोशिश नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु अप्रसार और क्षेत्रीय शांति की दिशा तय करने वाली एक निर्णायक पहल माना जा रहा था, का बगैर किसी समझौते के समाप्त होना कूटनीतिक विफलता तो खैर है ही, इस बात का संकेत भी है कि पश्चिम एशिया एक बार फिर गंभीर अस्थिरता के मुहाने पर खड़ा है। इस लिहाज से, यह वार्ता फरवरी के अंत में जिनेवा में गतिरोध के रूप में खत्म हुई वार्ता से कुछ खास अलग नहीं दिखी, जिसके चलते अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पूरे ईरान को 38 दिनों तक मिसाइलों और बमबारी से नेस्तनाबूद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 


इस्लामाबाद में वार्ता के विफल रहने के बाद ट्रंप प्रशासन के सामने एक विकल्प तो यह है कि वह तेहरान के साथ किसी अन्य मंच पर, किसी अन्य ढंग से लंबी बातचीत की शुरुआत करे, अन्यथा फिर से वह युद्ध शुरू हो सकता है, जो पहले ही आधुनिक युग के सबसे बड़े ऊर्जा संकट की वजह बना हुआ है। हालांकि इन दोनों ही रास्तों के अपने-अपने रणनीतिक और राजनीतिक नुकसान हो सकते हैं। यह समझा जा सकता है कि अमेरिका द्वारा युद्धविराम की घोषणा की एक प्रमुख वजह होर्मुज संकट थी, जिसके कारण पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही थीं और उर्वरक तथा अन्य महत्वपूर्ण सामग्रियों, जैसे कि सेमीकंडक्टर उत्पादन के लिए आवश्यक हीलियम की कमी हो रही थी। 


एक समझौते की उम्मीद भर के पैदा होने से, भले ही वह कितना ही आंशिक या अस्थायी हो, बाजारों में तेजी आई थी। ऐसे में, अगर युद्ध फिर से शुरू होता है, तब निस्संदेह बाजारों और मुद्रास्फीति पर इसका बुरा असर पड़ेगा। हालांकि इसका सर्वाधिक असर स्वाभाविक ही भारत जैसी उन तमाम अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा, जो आयात पर कुछ अधिक निर्भर हैं। इतिहास गवाह है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते अक्सर लंबी और जटिल प्रक्रियाओं के बाद ही संभव हुए हैं। अच्छी बात है कि वर्तमान गतिरोध के बावजूद दोनों पक्षों ने भविष्य में बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए हैं। नहीं भूला जा सकता कि पश्चिम एशियाई संकट उस वैश्विक व्यवस्था की भी परीक्षा है, जो नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय प्रणाली, कूटनीति और बहुपक्षवाद पर टिकी है।

जाहिर है कि अगर ऐसे संकटों का समाधान वार्ता से नहीं निकलता, तो दुनिया एक अधिक अस्थिर और अनिश्चित भविष्य की ओर ही बढ़ेगी। इसलिए, भले ही अमेरिका और ईरान के बीच पहले दौर की वार्ता में कूटनीति की मेज बेशक खाली हो गई हो, उसे फिर से सजाना ही होगा, क्योंकि मौजूदा विकल्प कहीं अधिक खतरनाक हैं।

 
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