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समझौते की राह आसान नहीं: गलत उम्मीद के साथ दांव, ईरान को उल्टा पड़ सकता है
सुशांत सरीन, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Mon, 13 Apr 2026 07:40 AM IST
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सार
दिक्कत यह है कि अमेरिका वहीं से वार्ता शुरू करना चाहता है, जहां उसने युद्ध से पहले खत्म की थी, पर ईरान अब नए सिरे से बात करना चाहता है। दूसरी बात यह है कि ईरान भी अपनी ताकत से अधिक पर दांव लगाना चाहता है, जो उल्टा भी पड़ सकता है, क्योंकि अब तक के युद्ध में उसे भारी क्षति उठानी पड़ी है।
ईरान इस्राइल युद्ध
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
इक्कीस घंटे की लंबी बातचीत के बावजूद पश्चिम एशिया संकट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई है और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अमेरिका लौट गए हैं। इस वार्ता की विफलता के बारे में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी तरफ से बयान दिए हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि 'हमने अपनी सीमा स्पष्ट कर दी है। ईरान ने हमारी शर्तें मानने से इन्कार कर दिया है। हम बहुत ही आसान प्रस्ताव देकर जा रहे हैं कि यही हमारा अंतिम और बेस्ट ऑफर है। हम देखेंगे कि ईरानी इसे स्वीकार करते हैं या नहीं।' दूसरी तरफ ईरान की सरकारी मीडिया ने कहा है कि 'अमेरिका से बातचीत के दौरान ईरान ने बार-बार अपने प्रस्ताव रखे और अमेरिकी पक्ष को वास्तविकता की ओर लाने की कोशिश की। हालांकि, हर स्तर पर अमेरिका की अत्यधिक मांगों ने एक साझा ढांचे तक पहुंचने में अड़चन पैदा की। अमेरिकी रुख में लचीलेपन की कमी के कारण वार्ता बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई।'
जाहिर है, बेनतीजा ही सही, अभी बातचीत का पहला दौर खत्म हुआ है। इसका मतलब यह नहीं कि दोनों देशों के बीच आगे बातचीत नहीं होगी। अभी यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि तुरंत दोबारा से उसी भीषणता के साथ युद्ध शुरू हो जाएगा, जिसकी आशंका थी। आगे क्या होता है, यह जानने के लिए शायद एक-दो दिन इंतजार करना चाहिए।
अभी तक जो खबरें आई हैं, उससे यह लगता है कि पहले दौर की बातचीत में कुछ चीजों पर बातचीत आगे बढ़ी है, लेकिन कुछ चीजों पर अब भी उसमें अड़चनें हैं। ये अड़चनें आनी ही थीं, क्योंकि अमेरिका समझता है कि उसने युद्ध जीत लिया है और ईरान को इतने बुरे तरीके से परास्त किया है कि वह अपनी मनमानी शर्तें ईरान पर थोप सकता है। दूसरी तरफ ईरान यह समझता है कि उसने अमेरिकी हमले को झेल लिया है और मजबूती से उभरकर सामने आया है तथा उसने ऐसी रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली है कि अमेरिका से अपनी बातें मनवा सकता है। ईरान को लगता है कि अमेरिका युद्धविराम के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक है और अगर एक पक्ष समझौते के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक हो, तो दूसरे पक्ष को वैसे ही बहुत ज्यादा लाभ (एडवांटेज) मिल जाता है।
किसी भी युद्ध को खत्म करने के लिए दो-तीन बातें जरूरी हैं। पहली, या तो एक पक्ष इतनी मजबूती से विजयी हो गया हो और दूसरा पक्ष पूरी तरह से ढेर हो गया हो कि एक पक्ष दूसरे पक्ष पर अपनी शर्तें थोप सकता है। दूसरी, अगर ऐसा न हो, मगर दोनों पक्षों ने इतने भीषण तरीके से युद्ध लड़ा हो कि दोनों बुरी तरह से तबाह हो गए हों, तो वे थककर समझौता करने के लिए राजी होते हैं। तीसरी बात यह है कि दोनों को अक्ल आ जाए और बीच का कोई रास्ता बन जाए। यहां पर समस्या यह है कि बीच का रास्ता नजर नहीं आ रहा है, क्योंकि ईरान कई ऐसी चीजों की मांग कर रहा है, जो पहले कभी बातचीत की मेज पर नहीं थीं, जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य की बात हो, उस क्षेत्र में उसके वर्चस्व की बात हो, या प्रतिबंधों को खत्म करने और मुआवजे की बात हो या भविष्य में ईरान ही नहीं, उसके सहयोगियों के ऊपर भी हमले न करने की गारंटी हो। ये सब ऐसे मुद्दे हैं, जो पहले बातचीत का हिस्सा नहीं थे।
समस्या यह है कि इस युद्ध से पहले अमेरिका और ईरान के बीच जो वार्ता चल रही थी, उसमें कुछ बिंदुओं पर सहमति बन रही थी, फिर भी अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया। अब जैसी कि खबरें आ रही हैं, हालांकि उनकी अभी पुष्टि नहीं हुई है, अमेरिका चाह रहा है कि जिन बिंदुओं पर युद्ध से पहले सहमति बन रही थी, युद्ध के बाद शुरू हुई वार्ता वहीं से शुरू हो। यह तो अजीब बात लगती है कि जिन चीजों पर हमले से पहले बात हो रही थी, हमले के बाद भी उन्हीं पर वार्ता हो, क्योंकि अमेरिका जो कर सकता था, वह तो उसने करके देख लिया। अब यदि वह लौट कर बातचीत करना चाहता है, तो स्वाभाविक ही ईरान अपनी शर्तों पर उससे बात करना चाहेगा। तो पहले चरण की बातचीत की नाकामी का मूल कारण यह है।
अब देखना होगा कि अगले एक-दो दिनों में दोबारा युद्ध शुरू होता है या दोनों पक्ष दो हफ्ते के युद्धविराम का पालन करते हैं। अगर दोबारा युद्ध शुरू नहीं होता, या होता भी है, तो छोटे-मोटे हमले तक सीमित रहता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर जहाजों की आवाजाही सीमित संख्या में ही सही, जारी रहती है तथा दोनों पक्ष पर्दे के पीछे से बातचीत फिर शुरू करने की कोशिश करते हैं एवं दोनों अपने रुख में लचीलापन लाते हैं, तो बहुत संभव है कि इस संकट का हल हो जाए। यानी दो बातें हैं-पहली कि दोबारा से युद्ध शुरू न हो, वार्ता को फिर से पटरी पर लाया जाए और सभी मुद्दों पर न सही, कुछ मुद्दों पर सहमति बन जाए। दूसरी यह आशंका है कि फिर से युद्ध शुरू हो जाए।
सहमति में दिक्कत यह है कि अमेरिका वहीं से वार्ता शुरू करना चाहता है, जहां उसने युद्ध से पहले बातचीत खत्म की थी, पर ईरान अब नए सिरे से बात करना चाहता है। दूसरी समस्या यह है कि ईरान भी अपनी ताकत से अधिक पर दांव लगाना चाहता है, जिसे अंग्रेजी में कहते हैं-‘ओवरप्ले योर हैंड’ यानी गलत उम्मीद के साथ अपने दांव पर खेलना। यह ईरान के लिए उल्टा भी पड़ सकता है, क्योंकि अब तक जो युद्ध हुआ है, उसमें ईरान को भारी क्षति उठानी पड़ी है।
अमेरिका समझौते करना तो चाहता है, लेकिन जिन शर्तों पर चाहता है, वे संभव नहीं दिखतीं। अगर अमेरिका दोबारा युद्ध शुरू करता है, तो निश्चित रूप से ईरान को बहुत नुकसान होगा, लेकिन नुकसान सिर्फ ईरान का नहीं होगा, क्योंकि अब भी ईरान के पास कुछ ऐसी क्षमताएं हैं कि खाड़ी क्षेत्र के गैस व तेल इन्फ्रास्ट्रक्चर को तहस-नहस कर सकता है। इसलिए समाधान की राह आसान नहीं है। इसमें एक और खतरा जो नजर आ रहा है, वह यह कि पाकिस्तान, जो अब तक इस युद्ध से बाहर रहा है, वह भी कहीं सऊदी अरब के साथ न हो जाए। अगर ऐसा होता है और पाकिस्तान ईरान के खिलाफ कोई कदम उठाता है, तो आशंका है कि ईरान की मिसाइलें फिर पाकिस्तान के ऊपर भी गिरेंगी। इससे युद्ध का दायरा फैलता चला जाएगा। इसका अंजाम यह होगा कि ईरान इतनी बुरी तरह से तबाह हो जाएगा कि उसके लिए वहां की रियासत को एकजुट रखना मुश्किल हो जाएगा। अगर ऐसा हुआ, तो ईरान तो बर्बाद हो ही जाएगा, बाकी खाड़ी क्षेत्र भी अस्थिर हो जाएगा।
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जाहिर है, बेनतीजा ही सही, अभी बातचीत का पहला दौर खत्म हुआ है। इसका मतलब यह नहीं कि दोनों देशों के बीच आगे बातचीत नहीं होगी। अभी यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि तुरंत दोबारा से उसी भीषणता के साथ युद्ध शुरू हो जाएगा, जिसकी आशंका थी। आगे क्या होता है, यह जानने के लिए शायद एक-दो दिन इंतजार करना चाहिए।
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अभी तक जो खबरें आई हैं, उससे यह लगता है कि पहले दौर की बातचीत में कुछ चीजों पर बातचीत आगे बढ़ी है, लेकिन कुछ चीजों पर अब भी उसमें अड़चनें हैं। ये अड़चनें आनी ही थीं, क्योंकि अमेरिका समझता है कि उसने युद्ध जीत लिया है और ईरान को इतने बुरे तरीके से परास्त किया है कि वह अपनी मनमानी शर्तें ईरान पर थोप सकता है। दूसरी तरफ ईरान यह समझता है कि उसने अमेरिकी हमले को झेल लिया है और मजबूती से उभरकर सामने आया है तथा उसने ऐसी रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली है कि अमेरिका से अपनी बातें मनवा सकता है। ईरान को लगता है कि अमेरिका युद्धविराम के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक है और अगर एक पक्ष समझौते के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक हो, तो दूसरे पक्ष को वैसे ही बहुत ज्यादा लाभ (एडवांटेज) मिल जाता है।
किसी भी युद्ध को खत्म करने के लिए दो-तीन बातें जरूरी हैं। पहली, या तो एक पक्ष इतनी मजबूती से विजयी हो गया हो और दूसरा पक्ष पूरी तरह से ढेर हो गया हो कि एक पक्ष दूसरे पक्ष पर अपनी शर्तें थोप सकता है। दूसरी, अगर ऐसा न हो, मगर दोनों पक्षों ने इतने भीषण तरीके से युद्ध लड़ा हो कि दोनों बुरी तरह से तबाह हो गए हों, तो वे थककर समझौता करने के लिए राजी होते हैं। तीसरी बात यह है कि दोनों को अक्ल आ जाए और बीच का कोई रास्ता बन जाए। यहां पर समस्या यह है कि बीच का रास्ता नजर नहीं आ रहा है, क्योंकि ईरान कई ऐसी चीजों की मांग कर रहा है, जो पहले कभी बातचीत की मेज पर नहीं थीं, जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य की बात हो, उस क्षेत्र में उसके वर्चस्व की बात हो, या प्रतिबंधों को खत्म करने और मुआवजे की बात हो या भविष्य में ईरान ही नहीं, उसके सहयोगियों के ऊपर भी हमले न करने की गारंटी हो। ये सब ऐसे मुद्दे हैं, जो पहले बातचीत का हिस्सा नहीं थे।
समस्या यह है कि इस युद्ध से पहले अमेरिका और ईरान के बीच जो वार्ता चल रही थी, उसमें कुछ बिंदुओं पर सहमति बन रही थी, फिर भी अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया। अब जैसी कि खबरें आ रही हैं, हालांकि उनकी अभी पुष्टि नहीं हुई है, अमेरिका चाह रहा है कि जिन बिंदुओं पर युद्ध से पहले सहमति बन रही थी, युद्ध के बाद शुरू हुई वार्ता वहीं से शुरू हो। यह तो अजीब बात लगती है कि जिन चीजों पर हमले से पहले बात हो रही थी, हमले के बाद भी उन्हीं पर वार्ता हो, क्योंकि अमेरिका जो कर सकता था, वह तो उसने करके देख लिया। अब यदि वह लौट कर बातचीत करना चाहता है, तो स्वाभाविक ही ईरान अपनी शर्तों पर उससे बात करना चाहेगा। तो पहले चरण की बातचीत की नाकामी का मूल कारण यह है।
अब देखना होगा कि अगले एक-दो दिनों में दोबारा युद्ध शुरू होता है या दोनों पक्ष दो हफ्ते के युद्धविराम का पालन करते हैं। अगर दोबारा युद्ध शुरू नहीं होता, या होता भी है, तो छोटे-मोटे हमले तक सीमित रहता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर जहाजों की आवाजाही सीमित संख्या में ही सही, जारी रहती है तथा दोनों पक्ष पर्दे के पीछे से बातचीत फिर शुरू करने की कोशिश करते हैं एवं दोनों अपने रुख में लचीलापन लाते हैं, तो बहुत संभव है कि इस संकट का हल हो जाए। यानी दो बातें हैं-पहली कि दोबारा से युद्ध शुरू न हो, वार्ता को फिर से पटरी पर लाया जाए और सभी मुद्दों पर न सही, कुछ मुद्दों पर सहमति बन जाए। दूसरी यह आशंका है कि फिर से युद्ध शुरू हो जाए।
सहमति में दिक्कत यह है कि अमेरिका वहीं से वार्ता शुरू करना चाहता है, जहां उसने युद्ध से पहले बातचीत खत्म की थी, पर ईरान अब नए सिरे से बात करना चाहता है। दूसरी समस्या यह है कि ईरान भी अपनी ताकत से अधिक पर दांव लगाना चाहता है, जिसे अंग्रेजी में कहते हैं-‘ओवरप्ले योर हैंड’ यानी गलत उम्मीद के साथ अपने दांव पर खेलना। यह ईरान के लिए उल्टा भी पड़ सकता है, क्योंकि अब तक जो युद्ध हुआ है, उसमें ईरान को भारी क्षति उठानी पड़ी है।
अमेरिका समझौते करना तो चाहता है, लेकिन जिन शर्तों पर चाहता है, वे संभव नहीं दिखतीं। अगर अमेरिका दोबारा युद्ध शुरू करता है, तो निश्चित रूप से ईरान को बहुत नुकसान होगा, लेकिन नुकसान सिर्फ ईरान का नहीं होगा, क्योंकि अब भी ईरान के पास कुछ ऐसी क्षमताएं हैं कि खाड़ी क्षेत्र के गैस व तेल इन्फ्रास्ट्रक्चर को तहस-नहस कर सकता है। इसलिए समाधान की राह आसान नहीं है। इसमें एक और खतरा जो नजर आ रहा है, वह यह कि पाकिस्तान, जो अब तक इस युद्ध से बाहर रहा है, वह भी कहीं सऊदी अरब के साथ न हो जाए। अगर ऐसा होता है और पाकिस्तान ईरान के खिलाफ कोई कदम उठाता है, तो आशंका है कि ईरान की मिसाइलें फिर पाकिस्तान के ऊपर भी गिरेंगी। इससे युद्ध का दायरा फैलता चला जाएगा। इसका अंजाम यह होगा कि ईरान इतनी बुरी तरह से तबाह हो जाएगा कि उसके लिए वहां की रियासत को एकजुट रखना मुश्किल हो जाएगा। अगर ऐसा हुआ, तो ईरान तो बर्बाद हो ही जाएगा, बाकी खाड़ी क्षेत्र भी अस्थिर हो जाएगा।