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Opinion: बाघ संरक्षण सिर्फ बौद्धिक चर्चा का विषय नहीं, ये पारिस्थितिकी-तंत्र की स्थिरता के सूचक
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सार
सरकारी प्रयासों से पिछले कुछ वर्षों में देश में बाघों की संख्या बेशक बढ़ी है, लेकिन अब भी बहुत कुछ करना शेष है।
रणथंभौर नेशनल पार्क में बाघ
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
सरकार बाघों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन अनेक कारणों से बाघों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं हो पा रही है। वर्ष 2026 के पहले तीन महीनों में ही 42 बाघों की मौत हो चुकी है। इनमें से 13 मध्य प्रदेश, नौ महाराष्ट्र तथा कर्नाटक, तमिलनाडु और असम में चार-चार बाघों की मौत हुई है। 2022 की गणना के अनुसार, हमारे देश में बाघों की संख्या 3,682 है, जबकि 2018 में बाघों की संख्या 2,967 थी। यानी पिछले कुछ वर्षों में देश में बाघों की संख्या बढ़ी है। हालांकि कुछ राज्यों में बाघों की संख्या कम भी हुई है।
बाघों पर अब भी विभिन्न तरह के खतरे मंडरा रहे हैं। विकास की विभिन्न परियोजनाओं, खेती की जमीन में वृद्धि तथा वृक्षों के व्यावसायिक इस्तेमाल के कारण देश में तेजी से जंगलों का क्षरण हो रहा है। दरअसल जब बाघ का प्राकृतिक वास जंगल नष्ट होने लगता है, तो वह बाहर निकल कर आसपास के खेतों एवं गांवों में घरेलू पशुओं और लोगों पर हमला बोलता है। ऐसी घटनाओं के कारण मानव एवं वन्यजीव संघर्ष में बाघ मारे जाते हैं। इसके अलावा, बाघ की खाल के लिए भी अनेक तस्कर इनकी हत्याएं करते हैं।
साथ ही संरक्षित वन्य क्षेत्रों में अनेक तरह की समस्याएं और विसंगतियां मौजूद हैं। कुछ वन्य क्षेत्रों में दो तरह के समुदायों का दखल है। एक वे, जिनके पास दूसरे पशु हैं और वे उन्हें संरक्षित क्षेत्र में चराते हैं। दूसरे वे गांव वाले हैं, जो इन इलाकों के संरक्षित क्षेत्र घोषित होने के पहले से ही वहां रह रहे हैं। ऐसे लोग एवं घरेलू पशु संरक्षित वन्य क्षेत्रों के प्राकृतिक स्वरूप में व्यवधान पैदा कर रहे हैं। कुछ संरक्षित वन्य क्षेत्रों से मुख्य सड़क एवं रेल लाइनें भी गुजर रही हैं, जिनसे बाघों के प्राकृतिक वास में व्यवधान उत्पन्न होता है। कुछ संरक्षित वन्य क्षेत्रों के आसपास मंदिर भी हैं, जहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। ये श्रद्धालु जहां अभयारण्य में कूड़ा-कचरा फैलाते हैं, वहीं यहां से ईंधन की लकड़ी भी ले जाते हैं। इन सब गतिविधियों के कारण संरक्षित क्षेत्रों का प्राकृतिक स्वरूप तेजी से नष्ट हो रहा है। यही कारण है कि बाघ मनुष्यों के विरुद्ध लगातार उग्र हो रहे हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण बात ही है कि हम वन्यजीवों के प्राकृतिक वास को सुरक्षित और संरक्षित करने के प्रति गंभीर नहीं हैं। नतीजतन वन्यजीवों के गांवों और शहरों में घुसने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। कई बार वन विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से शिकारी बाघों को मारकर उसके शरीर के विभिन्न अंगों को भारी दाम पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचते हैं। कुछ समय पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दक्षिण एशिया वन्यजीव प्रवर्तन नेटवर्क (एसएडब्ल्यूईएन) व्यवस्था अपनाने के लिए अपनी सहमति दी थी। इस प्रक्रिया से दूसरे देशों से संचालित होने वाले वन्यजीव अपराधों पर काफी हद तक लगाम लग सकेगी। एसएडब्ल्यूईएन में दक्षिण एशिया के आठ देश-अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका शामिल हैं। इस नेटवर्क के माध्यम से वन्यजीव संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य होने की उम्मीद है।
गौरतलब है कि दक्षिण एशिया में बहुमूल्य जैव-विविधता को लगातार हानि हो रही है, जिसका सीधा प्रभाव वातावरण पर पड़ रहा है। खाद्य शृंखला के शीर्ष पर स्थित होने के नाते बाघ पारिस्थितिकी-तंत्र की स्थिरता के सूचक हैं। बाघों की बेहतर जनसंख्या के लिए खाद्य शृंखला के निचले स्तर पर अन्य जीवों की संख्या भी अच्छी-खासी होनी चाहिए। इसलिए जब हम बाघों का संरक्षण करते हैं, तो उनके साथ-साथ दूसरे वन्यजीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण करते हैं।
मौजूदा दौर में बुद्धिजीवियों ने पर्यावरण एवं वन्यजीव संरक्षण जैसे मुद्दों को ड्राइंगरूम बहस का हिस्सा बना दिया है। वास्तव में वन्य जीवन को बचाने की इच्छाशक्ति न तो राजनेताओं में दिखाई देती है और न आम जनता में। बाघ या शेर जैसे वन्यजीवों को बचाने की किसी भी योजना में उस आदिवासी समाज का जिक्र कहीं नहीं होता है, जो मुख्य रूप से वनों पर ही निर्भर हैं। वन्यजीवों के बचाने के लिए उन्हें वनों से बाहर पुनर्स्थापित करने की बात कही जाती है। अब हमें एक ऐसी योजना विकसित करनी होगी, जिसमें वनों पर निर्भर आदिवासी समाज एवं वन्य जीव, दोनों के बारे मंे सोचा जाए। इससे आदिवादी समाज वन्य जीवों को बचाने के लिए स्वयं आगे आएगा।
अनेक जगहों पर संरक्षित क्षेत्रों में रह रहे आदिवासी संरक्षित क्षेत्रों से बाहर आने के लिए राजी हुए हैं, लेकिन उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिल रहा है। कुछ समय पूर्व पर्यावरणविदों ने सुझाव दिया था कि वन्य जीवन पर आधारित पर्यटन से होने वाली आय को संरक्षित क्षेत्र की जनता में बांटा जाना चाहिए। इससे जहां एक ओर उन्हें रोजगार मिलेगा, वहीं वे जानवरों की रक्षा के लिए भी आगे आएंगे। जरूरी है कि हम बाघ समेत विभिन्न वन्यजीवों को बचाने के लिए तर्कसंगत तथा गंभीर नीतियां बनाएं, नहीं तो वन्यजीवों पर मंडराते खतरे हमारे अस्तित्व के लिए भी संकट का कारण बन जाएंगे।
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बाघों पर अब भी विभिन्न तरह के खतरे मंडरा रहे हैं। विकास की विभिन्न परियोजनाओं, खेती की जमीन में वृद्धि तथा वृक्षों के व्यावसायिक इस्तेमाल के कारण देश में तेजी से जंगलों का क्षरण हो रहा है। दरअसल जब बाघ का प्राकृतिक वास जंगल नष्ट होने लगता है, तो वह बाहर निकल कर आसपास के खेतों एवं गांवों में घरेलू पशुओं और लोगों पर हमला बोलता है। ऐसी घटनाओं के कारण मानव एवं वन्यजीव संघर्ष में बाघ मारे जाते हैं। इसके अलावा, बाघ की खाल के लिए भी अनेक तस्कर इनकी हत्याएं करते हैं।
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साथ ही संरक्षित वन्य क्षेत्रों में अनेक तरह की समस्याएं और विसंगतियां मौजूद हैं। कुछ वन्य क्षेत्रों में दो तरह के समुदायों का दखल है। एक वे, जिनके पास दूसरे पशु हैं और वे उन्हें संरक्षित क्षेत्र में चराते हैं। दूसरे वे गांव वाले हैं, जो इन इलाकों के संरक्षित क्षेत्र घोषित होने के पहले से ही वहां रह रहे हैं। ऐसे लोग एवं घरेलू पशु संरक्षित वन्य क्षेत्रों के प्राकृतिक स्वरूप में व्यवधान पैदा कर रहे हैं। कुछ संरक्षित वन्य क्षेत्रों से मुख्य सड़क एवं रेल लाइनें भी गुजर रही हैं, जिनसे बाघों के प्राकृतिक वास में व्यवधान उत्पन्न होता है। कुछ संरक्षित वन्य क्षेत्रों के आसपास मंदिर भी हैं, जहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। ये श्रद्धालु जहां अभयारण्य में कूड़ा-कचरा फैलाते हैं, वहीं यहां से ईंधन की लकड़ी भी ले जाते हैं। इन सब गतिविधियों के कारण संरक्षित क्षेत्रों का प्राकृतिक स्वरूप तेजी से नष्ट हो रहा है। यही कारण है कि बाघ मनुष्यों के विरुद्ध लगातार उग्र हो रहे हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण बात ही है कि हम वन्यजीवों के प्राकृतिक वास को सुरक्षित और संरक्षित करने के प्रति गंभीर नहीं हैं। नतीजतन वन्यजीवों के गांवों और शहरों में घुसने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। कई बार वन विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से शिकारी बाघों को मारकर उसके शरीर के विभिन्न अंगों को भारी दाम पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचते हैं। कुछ समय पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दक्षिण एशिया वन्यजीव प्रवर्तन नेटवर्क (एसएडब्ल्यूईएन) व्यवस्था अपनाने के लिए अपनी सहमति दी थी। इस प्रक्रिया से दूसरे देशों से संचालित होने वाले वन्यजीव अपराधों पर काफी हद तक लगाम लग सकेगी। एसएडब्ल्यूईएन में दक्षिण एशिया के आठ देश-अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका शामिल हैं। इस नेटवर्क के माध्यम से वन्यजीव संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य होने की उम्मीद है।
गौरतलब है कि दक्षिण एशिया में बहुमूल्य जैव-विविधता को लगातार हानि हो रही है, जिसका सीधा प्रभाव वातावरण पर पड़ रहा है। खाद्य शृंखला के शीर्ष पर स्थित होने के नाते बाघ पारिस्थितिकी-तंत्र की स्थिरता के सूचक हैं। बाघों की बेहतर जनसंख्या के लिए खाद्य शृंखला के निचले स्तर पर अन्य जीवों की संख्या भी अच्छी-खासी होनी चाहिए। इसलिए जब हम बाघों का संरक्षण करते हैं, तो उनके साथ-साथ दूसरे वन्यजीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण करते हैं।
मौजूदा दौर में बुद्धिजीवियों ने पर्यावरण एवं वन्यजीव संरक्षण जैसे मुद्दों को ड्राइंगरूम बहस का हिस्सा बना दिया है। वास्तव में वन्य जीवन को बचाने की इच्छाशक्ति न तो राजनेताओं में दिखाई देती है और न आम जनता में। बाघ या शेर जैसे वन्यजीवों को बचाने की किसी भी योजना में उस आदिवासी समाज का जिक्र कहीं नहीं होता है, जो मुख्य रूप से वनों पर ही निर्भर हैं। वन्यजीवों के बचाने के लिए उन्हें वनों से बाहर पुनर्स्थापित करने की बात कही जाती है। अब हमें एक ऐसी योजना विकसित करनी होगी, जिसमें वनों पर निर्भर आदिवासी समाज एवं वन्य जीव, दोनों के बारे मंे सोचा जाए। इससे आदिवादी समाज वन्य जीवों को बचाने के लिए स्वयं आगे आएगा।
अनेक जगहों पर संरक्षित क्षेत्रों में रह रहे आदिवासी संरक्षित क्षेत्रों से बाहर आने के लिए राजी हुए हैं, लेकिन उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिल रहा है। कुछ समय पूर्व पर्यावरणविदों ने सुझाव दिया था कि वन्य जीवन पर आधारित पर्यटन से होने वाली आय को संरक्षित क्षेत्र की जनता में बांटा जाना चाहिए। इससे जहां एक ओर उन्हें रोजगार मिलेगा, वहीं वे जानवरों की रक्षा के लिए भी आगे आएंगे। जरूरी है कि हम बाघ समेत विभिन्न वन्यजीवों को बचाने के लिए तर्कसंगत तथा गंभीर नीतियां बनाएं, नहीं तो वन्यजीवों पर मंडराते खतरे हमारे अस्तित्व के लिए भी संकट का कारण बन जाएंगे।