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क्या बदलेगा दीदी का रवैया? बंगाल की राजनीति में टकराव, सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और ममता बनर्जी की रणनीति
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सार
सुप्रीम कोर्ट की फटकार व चेतावनी का संकेत समझ ममता ने धरना तो स्थगित कर दिया, पर क्या उनके रवैये में सुधार होगा?
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी
- फोटो : ANI
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विस्तार
चुनाव आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल में दो चरणों में मतदान कराने की घोषणा से ठीक पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दो लोक-लुभावन घोषणाएं कीं, जो भले ही आचार संहिता के खिलाफ न हो, लेकिन उनके रवैये को दर्शाता है। वह शायद देश की इकलौती मुख्यमंत्री हैं, जो पद पर रहते हुए भी धरना प्रदर्शन करती रहती हैं। मतदाता सूची से अवैध व बांग्लादेशी वोटरों को हटाने पर केंद्रित एसआईआर की न्यायिक अफसरों की जांच का ही वह विरोध करने बैठ गई थीं, लेकिन 10 मार्च को एसआईआर पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि न्यायिक अधिकारियों के काम पर सवाल उठाने की हिम्मत न करें।
बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के सख्त हिदायत के बाद ममता ने उसी दिन शाम को धरना खत्म कर दिया, मगर अस्थायी रूप से। इसके पहले, एसआईआर रोकने की ममता की गुहार ठुकरा कर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को न्यायिक अधिकारियों के जरिये ‘तार्किक विसंगति’ दूर करने का काम पूरा करने को कहा था। अदालत ने संभवत: चुनावी कार्य में पहली बार संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत ‘असाधारण परिस्थितियों’ में दखल दिया। न्यायिक अफसरों की कमी के चलते झारखंड और ओडिशा के और सौ-सौ जज काम में लगे थे, जिससे तीन राज्यों में लंबित मामलों का बोझ बढ़ा ही होगा। सवाल है कि चुनाव कार्य में लगे सारे बीएलओ व अन्य अधिकारी राज्य सरकार के ही कर्मचारी थे, तो जिंदा/मुर्दा या दूसरी तरह की गलतियों के लिए कोई दूसरा कैसे जिम्मेदार था? तो क्या हंगामा करवाने के लिए जानबूझकर ये गलतियां करवाई गईं? सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तृणमूल के वकीलों को फटकारा। न्यायिक अधिकारियों के काम में लगते ही 24 फरवरी से लगातार तीन दिनों तक कोलकाता के बैंकशाल कोर्ट समेत सात जिला अदालतों को बम से उड़ाने के मेल आते रहे। इसे भी 60 लाख अवैध, बांग्लादेशियों व रोहिंग्याओं के नाम नहीं काटने की अप्रत्यक्ष चेतावनी के रूप में देखा गया। इस प्रक्रिया में चुनाव आयोग हाशिये पर ही था, तो क्या ममता का धरना सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ था? ममता जिन बातों का विरोध कर रही थीं, विपक्ष में रहते हुए उनका पुरजोर समर्थन किया था। 13 साल पहले 4 अगस्त, 2005 को लोकसभा में अपननी पार्टी की इकलौती सांसद ममता ने बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ व वोटर लिस्ट में उनके नाम होने के मुद्दे पर अवैध घुसपैठियों के आंकड़ों वाला दस्तावेज सभापति की टेबल पर फेंक दिया था।
लोकसभा के रिकार्ड में दर्ज है कि ममता ने 14 बार अवैध घुसपैठ का मुद्दा उठाया था। मुख्यमंत्री के रवैये से साफ लगा कि उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा व अहंकार के दायरे को इतना बड़ा बना लिया है कि संघवाद, अदालतें, नैतिकता, कानून सब कुछ उन्हें छोटा लगने लगा है। संविधान की शपथ लेने वाला मुख्यमंत्री सुप्रीम कोर्ट के दखल के बावजूद धरने पर बैठ जाए, तो यह बहुत ‘खतरनाक’ है। अवमानना बहुतों की हो रही है, जिसमें प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, चुनाव आयुक्त और यहां तक कि महामहिम राष्ट्रपति जैसे प्रथम नागरिक को भी राज्य में अपमानित होना पड़ रहा है। बंगाल की अदालतों पर पहले से ही लंबित मामलों का बोझ है। जो ममता एसआईआर की लाइनों में लगे बंगालियों के कष्ट से द्रवित थीं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए था कि जजों के एसआईआर के काम में लगने से कितने लोगों के लिए न्याय का इंतजार और लंबा हो जाएगा? एक रिपोर्ट के मुताबिक, कलकत्ता हाईकोर्ट में 2,185 मामले ऐसे हैं, जो पिछले 50 साल या उससे ज्यादा समय से लंबित हैं। एसआईआर के काम में फास्ट ट्रैक कोर्ट, पोक्सो कोर्ट के जज भी लगे थे।
बंगाल में लोकतंत्र की बात करना ही बेमानी है। विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं की हत्या, उत्पीड़न, पुलिस के जरिये गांजा रखने या इसी तरह के ‘झूठे’ मामलों में फंसाकर जेल भेजना तो दीदी ने वाम शासन से सीखा है। कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को सभाएं करने के लिए 104 बार हाईकोर्ट से अनुमति लेनी पड़ी। बंगाल में भाजपा की परिवर्तन यात्रा भी अदालत के आदेश से ही निकल पाई। उसके प्रचार वाहनों पर पथराव को तृणमूल की बदनामी के लिए भाजपा का ही षड्यंत्र बताया गया।
प्रधानमंत्री मोदी अगर बंकिम दा बोल देते हैं, तो माफी की मांग की जाती है, लेकिन ममता ने कितनी बार वक्तव्य के दौरान गलत व अशोभनीय बातें कही हैं, इसकी गिनती नहीं है। अपनी गलतियां नहीं स्वीकारेंगे या सुधारेंगे, पर ‘बाहर’ के लोग अगर कोई भूल कर दें, तो बंगाली अस्मिता फन उठा लेती है।
बंगाल के राजनीतिक माहौल में थोड़ा रहस्य-रोमांच भी आया है। राज्यपाल आनंद बोस की अचानक विदाई और उनकी जगह 11 मार्च को आर एन रवि को राज्य का अतिरिक्त प्रभार संभालने से ‘कुछ तो पक रहा है’ की षड्यंत्र कथा फैलाई गई। भय राष्ट्रपति शासन का था, लेकिन भाजपा का थिंक टैंक ‘सेल्फ गोल’ के पक्ष में नहीं था। ममता सरकार अपनी करतूतों से खुद पतन के रास्ते की ओर बढ़ती दिख रही हैं।
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बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के सख्त हिदायत के बाद ममता ने उसी दिन शाम को धरना खत्म कर दिया, मगर अस्थायी रूप से। इसके पहले, एसआईआर रोकने की ममता की गुहार ठुकरा कर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को न्यायिक अधिकारियों के जरिये ‘तार्किक विसंगति’ दूर करने का काम पूरा करने को कहा था। अदालत ने संभवत: चुनावी कार्य में पहली बार संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत ‘असाधारण परिस्थितियों’ में दखल दिया। न्यायिक अफसरों की कमी के चलते झारखंड और ओडिशा के और सौ-सौ जज काम में लगे थे, जिससे तीन राज्यों में लंबित मामलों का बोझ बढ़ा ही होगा। सवाल है कि चुनाव कार्य में लगे सारे बीएलओ व अन्य अधिकारी राज्य सरकार के ही कर्मचारी थे, तो जिंदा/मुर्दा या दूसरी तरह की गलतियों के लिए कोई दूसरा कैसे जिम्मेदार था? तो क्या हंगामा करवाने के लिए जानबूझकर ये गलतियां करवाई गईं? सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तृणमूल के वकीलों को फटकारा। न्यायिक अधिकारियों के काम में लगते ही 24 फरवरी से लगातार तीन दिनों तक कोलकाता के बैंकशाल कोर्ट समेत सात जिला अदालतों को बम से उड़ाने के मेल आते रहे। इसे भी 60 लाख अवैध, बांग्लादेशियों व रोहिंग्याओं के नाम नहीं काटने की अप्रत्यक्ष चेतावनी के रूप में देखा गया। इस प्रक्रिया में चुनाव आयोग हाशिये पर ही था, तो क्या ममता का धरना सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ था? ममता जिन बातों का विरोध कर रही थीं, विपक्ष में रहते हुए उनका पुरजोर समर्थन किया था। 13 साल पहले 4 अगस्त, 2005 को लोकसभा में अपननी पार्टी की इकलौती सांसद ममता ने बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ व वोटर लिस्ट में उनके नाम होने के मुद्दे पर अवैध घुसपैठियों के आंकड़ों वाला दस्तावेज सभापति की टेबल पर फेंक दिया था।
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लोकसभा के रिकार्ड में दर्ज है कि ममता ने 14 बार अवैध घुसपैठ का मुद्दा उठाया था। मुख्यमंत्री के रवैये से साफ लगा कि उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा व अहंकार के दायरे को इतना बड़ा बना लिया है कि संघवाद, अदालतें, नैतिकता, कानून सब कुछ उन्हें छोटा लगने लगा है। संविधान की शपथ लेने वाला मुख्यमंत्री सुप्रीम कोर्ट के दखल के बावजूद धरने पर बैठ जाए, तो यह बहुत ‘खतरनाक’ है। अवमानना बहुतों की हो रही है, जिसमें प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, चुनाव आयुक्त और यहां तक कि महामहिम राष्ट्रपति जैसे प्रथम नागरिक को भी राज्य में अपमानित होना पड़ रहा है। बंगाल की अदालतों पर पहले से ही लंबित मामलों का बोझ है। जो ममता एसआईआर की लाइनों में लगे बंगालियों के कष्ट से द्रवित थीं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए था कि जजों के एसआईआर के काम में लगने से कितने लोगों के लिए न्याय का इंतजार और लंबा हो जाएगा? एक रिपोर्ट के मुताबिक, कलकत्ता हाईकोर्ट में 2,185 मामले ऐसे हैं, जो पिछले 50 साल या उससे ज्यादा समय से लंबित हैं। एसआईआर के काम में फास्ट ट्रैक कोर्ट, पोक्सो कोर्ट के जज भी लगे थे।
बंगाल में लोकतंत्र की बात करना ही बेमानी है। विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं की हत्या, उत्पीड़न, पुलिस के जरिये गांजा रखने या इसी तरह के ‘झूठे’ मामलों में फंसाकर जेल भेजना तो दीदी ने वाम शासन से सीखा है। कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को सभाएं करने के लिए 104 बार हाईकोर्ट से अनुमति लेनी पड़ी। बंगाल में भाजपा की परिवर्तन यात्रा भी अदालत के आदेश से ही निकल पाई। उसके प्रचार वाहनों पर पथराव को तृणमूल की बदनामी के लिए भाजपा का ही षड्यंत्र बताया गया।
प्रधानमंत्री मोदी अगर बंकिम दा बोल देते हैं, तो माफी की मांग की जाती है, लेकिन ममता ने कितनी बार वक्तव्य के दौरान गलत व अशोभनीय बातें कही हैं, इसकी गिनती नहीं है। अपनी गलतियां नहीं स्वीकारेंगे या सुधारेंगे, पर ‘बाहर’ के लोग अगर कोई भूल कर दें, तो बंगाली अस्मिता फन उठा लेती है।
बंगाल के राजनीतिक माहौल में थोड़ा रहस्य-रोमांच भी आया है। राज्यपाल आनंद बोस की अचानक विदाई और उनकी जगह 11 मार्च को आर एन रवि को राज्य का अतिरिक्त प्रभार संभालने से ‘कुछ तो पक रहा है’ की षड्यंत्र कथा फैलाई गई। भय राष्ट्रपति शासन का था, लेकिन भाजपा का थिंक टैंक ‘सेल्फ गोल’ के पक्ष में नहीं था। ममता सरकार अपनी करतूतों से खुद पतन के रास्ते की ओर बढ़ती दिख रही हैं।