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ऐतिहासिक उपलब्धि: लाल गलियारे का अंत, भारत के इतिहास में एक मील का पत्थर

अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Wed, 01 Apr 2026 07:15 AM IST
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सार
देश को नक्सलवाद से मुक्ति मिलना वाकई एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, जो नीतिगत निरंतरता, केंद्र व राज्यों के बीच उत्कृष्ट समन्वय और सुरक्षा अभियानों को विकास से जोड़ने की रणनीति का ही प्रतिफल है। अब यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि लाल गलियारा फिर देश के मानचित्र का हिस्सा न बन सके।
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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह - फोटो : ANI

विस्तार

सोमवार को लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह की देश से नक्सलवाद के खात्मे का लक्ष्य पूरा होने की घोषणा स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक मील का पत्थर है, जो सरकार की दृढ़ नीति व सुरक्षा बलों की वीरता का परिचायक तो है ही, उन लाखों आदिवासियों व ग्रामीणों के लिए भी राहत का संदेश है, जिन्होंने दशकों तक हिंसा, भय व विकास के अभाव की मार झेली है। गौरतलब है कि 1960 के दशक से ही देश के लिए एक बड़ी चुनौती रहा यह नक्सलवाद एक समय पर करीब 200 जिलों तक फैला था, जिसे ‘लाल गलियारा’ कहा जाता था। हालांकि, पिछले एक दशक में इस स्थिति में निर्णायक बदलाव आया और प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 से घटकर 2025 में सिर्फ 11 रह गई। जब गृह मंत्री ने मार्च, 2026 तक देश से नक्सलवाद को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने की बात की थी, तब इस लक्ष्य की व्यवहार्यता पर कई सवाल उठाए गए थे। लेकिन अब, जिस तरह से नक्सलवाद से प्रभावित रहे क्षेत्रों में चुनावों में मतदान का प्रतिशत बढ़ा है, दुर्गम माने जाने वाले गांवों को चुनावी प्रक्रिया से जोड़ा गया है, साप्ताहिक बाजार फिर से खुले हैं, सड़कों से जुड़ाव बेहतर हुआ है, तो यह स्थिति सरकार की नीतिगत कामयाबी को ही दर्शाती है। इसका महत्व इससे भी बढ़ जाता है कि आज से करीब 17 वर्ष पहले 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसी नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। दरअसल, यह उपलब्धि माओवादी नेतृत्व और कैडर बेस पर लगातार दबाव बनाने की सरकारी रणनीति का नतीजा है। जहां गिरफ्तारियों और लक्षित अभियानों ने नक्सलियों के संगठनात्मक ढांचे को कमजोर किया, वहीं सीपीआई (माओवादी) के महासचिव बसवराज जैसे इसके शीर्ष नेताओं के मारे जाने या आत्मसमर्पण ने आंदोलन की कमर तोड़ी। भले ही कुछ नक्सली अब भी बच गए हों, लेकिन अब नक्सलवाद आंदोलन में इतना दम नहीं बचा कि वह दोबारा सिर उठा सके। इस कामयाबी में सुरक्षा अभियानों के साथ सरकार की विकास पहलों को भी श्रेय मिलना चाहिए। आदिवासी कल्याण, कौशल विकास और स्थानीय बुनियादी ढांचे के मद्देनजर सरकार की पहलों ने लंबे समय से चले आ रहे उन अंतरों को पाटने की कोशिश की है, जिनके कारण नक्सलवाद अपनी जड़ें जमा पाया। अब, जब नक्सलवाद से मुक्ति का सपना तकरीबन पूरा ही हो गया है, जो कोई मामूली उपलब्धि नहीं है, तब यह सुनिश्चित किया जाना भी जरूरी है कि लाल गलियारा फिर कभी देश के मानचित्र का हिस्सा न बन सके। इसके लिए सरकार को उन सुदूर क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी को गहराई से बनाए रखना होगा, जहां वह दशकों तक नदारद रही।
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