{"_id":"69cb2d6cec452c72c1031552","slug":"trump-isn-t-real-problem-no-kings-from-us-to-europe-a-deep-seated-despair-among-americans-2026-03-31","type":"story","status":"publish","title_hn":"असल समस्या ट्रंप नहीं: सड़कों पर 'नो किंग्स की गूंज'... क्या अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ असंतोष की अभिव्यक्ति?","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
असल समस्या ट्रंप नहीं: सड़कों पर 'नो किंग्स की गूंज'... क्या अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ असंतोष की अभिव्यक्ति?
रहीस सिंह, वैदेशिक मामलों के जानकार
Published by: Pavan
Updated Tue, 31 Mar 2026 10:28 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो :
ANI
विस्तार
खबरें बता रही हैं कि अमेरिकी गुस्से में हैं। सड़कों पर एक आवाज सुनाई दे रही है-‘नो किंग्स’। यह आवाज केवल अमेरिकी शहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों के शहरों से भी सुनाई दी। क्या यह प्रदर्शन राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ असंतोष की अभिव्यक्ति है या अमेरिकियों के मन में गहरे तक पैठी हुई निराशा और बेचैनी का विस्फोट है? क्या इसके जरिये यह बताने की कोशिश हो रही है कि ट्रंप अमेरिका नहीं हैं, जैसा वह खुद को अक्सर पेश करते रहे हैं? और, क्या अमेरिका वैसा ही है, जैसा कि अमेरिकी मानते आ रहे हैं?यह तो पता नहीं कि ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन ट्रंप के अस्तित्व को चुनौती दे रहे हैं या नहीं, लेकिन इतना तो तय है कि ट्रंप अब अमेरिका के लोकप्रिय नेता नहीं रह गए हैं। यह ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन का तीसरा संस्करण था, जो 3,000 से अधिक जगहों पर हुआ। ये प्रदर्शन यह संदेश देने में सफल रहे हैं कि यह किसी नेता के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ है, जो सत्ता को जनता से ऊपर समझने की गलती कर रही है। ‘नो किंग्स’ कार्यक्रमों के तहत लाखों लोगों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए ‘स्ट्रीट्स ऑफ मिनियोपोलिस’ गीत भी गाए हैं, जो अमेरिकी इमीग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (आईसीई) द्वारा हुई तबाही और मौतों पर आधारित हैं। मिनेसोटा ही ट्रंप की आव्रजन नीति के केंद्र में रहा है, जहां यह गीत गाया गया।
कई प्रदर्शनकारियों ने तो रेनी गुड और एलेक्स प्रेट्टी की तस्वीरें उठा रखी थीं, जो इसी वर्ष संघीय आव्रजन अधिकारियों की गोलीबारी में मारे गए थे। व्हाइट हाउस और रिपब्लिकन नेतृत्व ‘नो किंग्स’ कार्यक्रमों को ‘ट्रंप डिरेंजमेंट थेरेपी सेशंस’ बता रहा है। उनका कहना है कि इन्हें ‘हेट अमेरिका रैलियों’ की नजर से देखना चाहिए। हालांकि, ट्रंप के समर्थन में ‘ओथ कीपर्स’ और ‘प्राउड बॉयज’ जैसे समूहों ने भी प्रदर्शन करके ‘नो किंग्स’ को खारिज करने की कोशिश की, लेकिन वे पूरी तरह अप्रभावी रहे। इसके विपरीत, मिनेसोटा के गवर्नर टिम वाल्ज इस आंदोलन को ट्रंप के खिलाफ अमेरिकी मूल्यों की आत्मा को दर्शाने वाला मानते हैं। सीनेटर बर्नी सैंडर्स भी कुछ ऐसा ही कहते दिखे। उनका कहना है कि ‘हम इस देश को अधिनायकवाद या कुलीनतंत्र की ओर नहीं जाने देंगे। जनता ही शासन करेगी।’ तो क्या वाकई ट्रंप अधिनायकवाद की ओर बढ़ रहे हैं?
किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अमेरिकी मनोविज्ञान को समझना जरूरी है। यह देखना जरूरी है कि अमेरिका में पिछले एक दशक या उससे भी कुछ पहले से जो उथल-पुथल हो रही है, वह अमेरिकियों के लिए गर्व का प्रश्न है या निराशा का? लेखिका लिडिया पोलग्रीन लिखती हैं कि कभी-कभी मुझे लगता है कि अमेरिका में जो कुछ घटा है, उसने उस राष्ट्र को पूरी तरह बदल दिया है, जिसे मैं जानती थी। फिर भी, हर संकट के बाद मुझे यह एहसास होता है कि शायद अमेरिका वैसा कभी था ही नहीं, जैसा हम समझते रहे।
वह आगे लिखती हैं कि डोनाल्ड ट्रंप का उदय प्रायः अमेरिकी लोकतंत्र के लिए एक असाधारण विचलन के रूप में देखा जाता है, जो हमारे मूल्यों से मेल नहीं खाता। लेकिन यह दृष्टिकोण अधूरा है। ट्रंप केवल एक व्यक्ति नहीं हैं, वे उस लंबे ऐतिहासिक प्रवाह का बाइ-प्रॉडक्ट हैं, जिसने अमेरिका की राजनीति, समाज और वैश्विक भूमिका को आकार दिया है। क्या वास्तव में ऐसा ही है? यह प्रश्न इसलिए जरूरी है, क्योंकि ट्रंप या उन जैसा नेतृत्व किसी देश को तब तक अपने नियंत्रण में नहीं ले पाता, जब तक कि उसे स्वीकारने की मनोदशा न बना ले। अब ऐसा लोगों की मनोदशा का परिणाम होता है या उन कारणों का, जो सामान्यतया नजर नहीं आते, क्योंकि वे अदृश्य शक्तियों की देन होते हैं।
वैसे अमेरिका का इतिहास स्वयं को असाधारण मानने की धारणा से कभी उबर नहीं पाया, क्योंकि अमेरिका खुद को नैतिक रूप से श्रेष्ठ और दुनिया का पथप्रदर्शक मानता है। उसकी यही सोच पढ़े-लिखे अमेरिकियों को भी उन कमियों से आंखें मूंद लेने पर मजबूर करती रही, जो देश और नागरिकों के हित में नहीं थीं। वे अमेरिकी संस्थाओं की मजबूती और अपने लोकतंत्र पर इतराते रहे, जबकि सच यह है कि अमेरिका हमेशा से विरोधाभासों से भरा रहा है। वह स्वतंत्रता और असमानता, लोकतंत्र और बहिष्कार, आदर्शवाद और शक्ति आधारित राजनीति के बीच झूलता हुआ आगे बढ़ा। ट्रंप इसी विरोधाभास से उपजे हैं।
किसे नहीं पता कि शीतयुद्ध के दौरान, अमेरिका ने खुद को स्वतंत्रता का वैश्विक रक्षक घोषित किया था। पर क्या वह सच में ऐसा ही रहा? यदि हां, तो उन युद्धों और हस्तक्षेपों को कहां रखा जाए, जिनके परिणाम विनाशकारी रहे। वियतनाम से लेकर इराक और काबुल से लेकर बेरूत तक, पूरी दुनिया में शक्ति के प्रयोग प्रायः उन आदर्शों से टकराते हुए दिखे, जिनका अमेरिका दावा करता आ रहा था। फिर ट्रंप पर विलाप या गुस्सा क्यों?
ट्रंप ने तो उन संदेहों को केवल गहरा किया है, जो अमेरिकी राजनीति में पहले से ही मौजूद थे। अब पर्दा हट गया है, इसलिए वह राष्ट्रवाद की राजनीति के पीछे से निकलकर संस्थाओं के प्रति अविश्वासों के रूप में बाहर आ गए हैं। तो क्या अमेरिका का प्रबुद्ध व मध्यवर्ग इससे अनजान था कि जिस चीज का प्रचार ज्यादा होने लगता है, वह संदेहास्पद हो जाती है, फिर चाहे राष्ट्रवाद हो या लोकतंत्र, संस्था हो या शासक। इसलिए यह कहना कि समस्या केवल ट्रंप हैं, सरलीकरण होगा। असल समस्या तो उस अमेरिकी व्यवस्था और चरित्र में निहित है, जिसे उसने पिछली एक सदी के दौरान विकसित किया।
जब भी किसी समाज में आर्थिक असमानता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और वैश्वीकरण से उत्पन्न असुरक्षा की भावना प्रबल होती है और उसका निदान होता नहीं दिखता, तो एक गहरी असंतुष्टि उभरती है, जिससे ट्रंप जैसों का उदय होता है। अमेरिका में भी यही हुआ। वैसे भी अमेरिकी विदेश नीति के मूल में यही विचार है कि उसे दुनिया का नेतृत्व करना चाहिए। बिना भय और युद्ध के यह संभव ही नहीं है।
आज चीन जैसी शक्तियां समानांतर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था निर्मित करने की कोशिश में हैं। संभवतः अमेरिका इसे अस्तित्वगत चुनौती मानता है। यही कारण है कि ट्रंप का उभरना हैरान नहीं करता। बहरहाल, अमेरिकियों को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि असल समस्या ट्रंप नहीं हैं, बल्कि वह ऐतिहासिक और सामाजिक प्रक्रिया है, जिसके कारण ट्रंप का उदय हुआ। -edit@amarujala.com