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मुद्दा: खेत के मैदानों में खिलती खेल की फसल; पूरे होते अधूरे सपने और रोजगार का जरिया भी
नितिन यादव
Published by: Pavan
Updated Tue, 31 Mar 2026 08:03 AM IST
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खेत के मैदानों में खिलती खेल की फसल
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अमर उजाला
विस्तार
नोएडा के पर्थला चौक के पास देर शाम सड़क के एक ओर तेज दूधिया रोशनी चमक रही है। कुछ युवक किनारे खड़े होकर मैदान की ओर नजर टिकाए हुए हैं। पास जाकर देखने पर मालूम चला कि दो टीमें क्रिकेट के मैदान में एक-दूसरे से जोर आजमाइश कर रही हैं। एक छोटा-सा कैफेटेरिया भी है, जिसमें खिलाड़ियों के परिवार के सदस्य मौजूद हैं।दरअसल, यह कोई क्रिकेट स्टेडियम नहीं है, लेकिन बदलते दौर की अलग कहानी जरूर है। खेल की ऐसी संस्कृति, जो खेत में बने इन मैदानों में तेजी से पनप रही है। इसी सड़क पर कभी एक खेत में बने ग्राउंड का सफर अब आसपास के दर्जनों मैदानों तक पहुंच चुका है। इसके लिए सबसे पहले खाली खेत को समतल कर बेहतर घास के साथ हरा मैदान बनाया जाता है। एक अच्छी पिच बनाई जाती है। फिर घंटों के आधार पर मैच के लिए मैदान बुक किया जाता है। अब तो अधिकांश मैदान एप से बुक किए जा रहे हैं।
इतना ही नहीं, प्रैक्टिस के लिए नेट भी बुक करना चाहते हैं, तो वह भी उपलब्ध हैं। आप अकेले तो कुछ जगहों पर बॉलिंग मशीन के सामने कुछ देर बैटिंग का आनंद उठा सकते हैं। खास बात यह है कि यह चलन पहले नोएडा और आसपास के इलाकों में शुरू हुआ। अब यह अलग-अलग रूपों में उत्तर प्रदेश सहित देश के अधिकांश बड़े शहरों में पहुंच गया है। कुछ जगहों पर बॉक्स क्रिकेट के तौर पर तो कई जगहों पर खेल अकादमियों का रूप ले चुका है।
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में ऐसे खेल मैदानों की संख्या 100 के आसपास पहुंच चुकी है। खास बात यह है कि शहर से काफी दूर बने मैदानों की भी बुकिंग अधिकतर फुल ही रहती है। अलग-अलग फीस रहती है, लेकिन एक मैच के लिए पांच हजार रुपये की औसत फीस रहती है। ऐसे में सवाल यह है कि पिछले पांच वर्षों में यह खेल संस्कृति पनपी कैसे? इसमें खेलने वाले कौन हैं? क्या यह एक बेहतर रोजगार का साधन बनता जा रहा है? ऐसे कई सवालों के जवाब जब तलाशे गए, तो पता चला कि अब बड़े शहरों तक ही यह सब सीमित नहीं है।
अमरोहा में ऐसे मैदानों पर दिल्ली तक की टीमें खेलने के लिए आती हैं, तो मुजफ्फरनगर में हाईवे के किनारे के गांव भैंसी में बने ऐसे ही मैदान पर रात के मैचों की डिमांड ज्यादा रहती है। बिजनौर के किरतपुर और हादरपुर हों या जेवर एयरपोर्ट के रास्ते के गांव हों आपको छुट्टी के दिन सुबह के छह बजे से रात के 12 बजे तक क्रिकेट खेलते हुए लोग दिख जाएंगे।
अब अगला सवाल यह उठता है कि इतने खिलाड़ी कहां से आ रहे हैं? इसका जवाब भी काफी रोचक है। नोएडा एक्सटेंशन की एक सोसायटी में पांच टीमें हैं। लखनऊ के रहने वाले रजनीश पांडे एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं। वह ऐसी ही एक टीम के कप्तान हैं। प्रत्येक रविवार को उनकी टीम का ग्राउंड बुक रहता है। उन्हें लगता है कि पढ़ाई और नौकरी के कारण उनका क्रिकेट का जुनून पीछे रह गया था। अब उनकी उम्र चालीस के पार है, लेकिन इन मैदानों की वजह से फिर से वह क्रिकेट खेल पा रहे हैं। उनकी टीम में सभी बड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोग शामिल हैं। कई की उम्र पचास के पार है। कई स्कोरिंग एप पर उनके बनाए गए स्कोर का रिकॉर्ड मौजूद है। मेरठ के एक मैदान पर खेल रहे एक चार्टर्ड अकाउंटेंट का कहना है कि बॉक्स क्रिकेट अब बड़ा उद्योग बनता जा रहा है। यह लोगों के खेलने के सपने को तो पूरा कर ही रहा है, अच्छा निवेश भी है।
खेल के मैदान शहरों के बाहर बनाए गए हैं, तो बॉक्स शहरों के बीचों-बीच बनाए जा रहे हैं। कोई भी बड़ा-सा प्लाॅट, चारों तरफ से जाल से घेरकर रेडीमेड घास पर छोटा-सा ग्राउंड बना देता है। इसके नियम अलग हैं, लेकिन खेल रोमांच से भरपूर है। हालांकि, अभी क्रिकेट के ग्राउंड ही ज्यादा बने हैं, लेकिन ऐसा ही चलन दूसरे खेलों को लेकर भी देखने को मिल रहा है, खासतौर पर बैडमिंटन। पहले शहर के सरकारी स्टेडियम या कॉलोनी के कम्युनिटी हॉल में इनडोर बैडमिंटन के कोर्ट बनाए जाते थे। अब ऐसा नहीं है। निजी तौर पर इनडोर कोर्ट बनाए जा रहे हैं। ये भी एप से घंटों के लिहाज से बुक किए जाते हैं। वहीं पर शटल भी मिल जाते हैं और कोर्ट में खेलने के लिए जूते भी। यहां भी खेलने वालों में अधिकांश नौकरी पेशा वाले 40 साल की उम्र के आसपास के लोग होते हैं। मेरठ में एक कोच ने खेत में बने एक मैदान पर अकादमी खोल ली है। किराये के मैदान भी उपलब्ध हैं और कोचिंग के टिप्स भी। गुरुग्राम में टेनिस के कोर्ट खेतों में बनाए जा रहे हैं। संभव है कि शौकिया खेलने के लिए खुले ये मैदान या कोर्ट एक दिन देश को खेल की बड़ी ताकत बनाने में भी मदद करें।