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नीट परीक्षा विवाद पर नई सुनवाई बनाम पुराना फैसला: पेपर लीक राष्ट्रीय शर्म की बात, इस कलंक से बचा जा सकता था

virag gupta विराग गुप्ता
Updated Fri, 15 May 2026 05:04 AM IST
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सार

नीट जैसी बड़ी परीक्षा में छोटे विवाद हमेशा रहेंगे, लेकिन पेपर लीक होकर सोशल मीडिया में नीलाम होना राष्ट्रीय शर्म की बात है। अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों पर ध्यान दिया जाता, तो इस कलंक से बचा जा सकता था।

NEET 2026 Row New Hearing vs Old Verdict of Court Paper Leak National Shame Blight Could Have Been Averted
Neet UG Paper Leak - फोटो : AI Generated
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विस्तार

नीट परीक्षा आयोजित करने वाली एनटीए को सोशल मीडिया पर नेशनल ट्रॉमा एजेंसी या फिर नेशनल ठगी एजेंसी के नाम से संबोधित किया जा रहा है। दो साल पहले भी पेपर लीक हुआ था, लेकिन परीक्षा रद्द नहीं हुई थी।

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पुलिस पर भरोसा कमजोर होने के बाद सीबीआई हर बड़े मर्ज की दवा बन रही है। लेकिन पेपर लीक के पुराने मामलों में सीबीआई 90 दिन के भीतर आरोप पत्र दायर करने में विफल रही और मुख्य आरोपी को जमानत मिल गई। नकल माफिया को रोकने के लिए संसद से फरवरी 2024 में कानून बना था, जिसमें अधिकतम सजा 10 साल है। संसद से पारित वह कानून 2024 में नीट पेपर लीक कांड के बाद ही आनन-फानन में लागू किया गया था। व्यापम घोटाले से साफ है कि पुलिस और सीबीआई की लंबी जांच के बाद पीड़ित लोगों का भविष्य अंधेरी सुरंग के हवाले हो जाता है।
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जांच और न्यायिक प्रणाली पर डगमगाते भरोसे की वजह से सोशल मीडिया में कानून और प्रक्रिया को दरकिनार करके दोषियों के लिए फांसी की मांग हो रही है। व्हाट्सएप और टेलीग्राम से नीट के पेपरों का खुलेआम कारोबार होने के बावजूद पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां परीक्षा माफिया को समय पर नहीं रोक पाईं।

नकल माफिया और सॉल्वर गैंग के बुलंद हौसलों से साफ है कि इस धंधे में जोखिम कम और लाभ ज्यादा हैं। राज्यों के चुनावों में जिस भ्रष्ट सिंडिकेट की बात की जा रही थी, उनसे जुड़े नेताओं को नकल, कोचिंग और सॉल्वर गैंग जैसे माफिया से खुराक मिलती है। परीक्षा में धन-बल के बढ़ते प्रभाव से धांधली के चलते शैक्षणिक अराजकता बढ़ रही है। अयोग्य और धनपशुओं के मेडिकल प्रोफेशन में आने से सामाजिक व्यवस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।

डॉक्टरी की प्रवेश परीक्षा में लगातार बढ़ रही धांधली, मक्कारी और पेपर लीक से लाखों परिवारों का सपना टूटने के साथ बच्चे मनोरोग और अन्य बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। छात्रों को हुई आर्थिक क्षति, मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न और शैक्षणिक नुकसान की भरपाई करने के बजाय एनटीए ने जख्मों पर नमक छिड़कते हुए कहा है कि नए सिरे से होने वाली परीक्षा के लिए छात्रों को दोबारा फीस नहीं देनी पड़ेगी।
भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं हो, इसके लिए संस्थागत सुधार जरूरी हैं। एनटीए फिलहाल 15 छोटी-बड़ी परीक्षाएं आयोजित कर रहा है। संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, उनमंे से कई विवादों और अनियमितताओं के घेरे में रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गठित डॉ. राधाकृष्णन समिति की सिफारिश के अनुसार एनटीए को जेईई मेन, नीट-यूजी, सीयूईटी–यूजी और यूजीसी नेट जैसी चार बड़ी परीक्षाओं पर फोकस करना चाहिए। समिति के अनुसार, इंजीनियरिंग वाली जेईई की तर्ज पर नीट परीक्षा को पीपीटी (पेन एंड पेपर टेस्टिंग) के बजाय सीबीटी (कंप्यूटर बेस्ड टेस्टिंग) से आयोजित करना चाहिए। मानवीय हस्तक्षेप कम होने से पेपर लीक की गुंजाइश भी खत्म हो जाएगी। लेकिन एनटीए के पास फिलहाल एक चरण में सिर्फ डेढ़ लाख बच्चों के बैठने के लिए कंप्यूटर क्लासेज हैं और सभी उम्मीदवारों के लिए 15 से ज्यादा चरणों में परीक्षा आयोजित करना होगा।

केंद्र सरकार के कार्मिकी मंत्रालय ने अक्तूबर, 2023 में जारी आदेश में कंप्यूटर सेंटरों की गुणवत्ता के बारे में गाइडलाइन जारी की थी। दुनिया की सबसे बड़ी आईटी महाशक्ति और इतने बड़े शिक्षा तंत्र वाले देश के 552 शहरों में हम 23 लाख बच्चों के बैठने का इंतजाम नहीं कर सकते, तो फिर नीट परीक्षा को राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित करने का कानून क्यों बनाया गया? केंद्रीय स्तर पर नीट परीक्षा को आयोजित करने का कई राज्यों ने विरोध किया था। अब पेपर लीक कांड के बाद तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री विजय ने कक्षा 12 के नंबरों के आधार पर मेडिकल में दाखिले की बात दोहराई है। संविधान के अनुसार, मेडिकल शिक्षा का विषय समवर्ती सूची में है, इसलिए राज्यों की आवाज को भी सुनने की जरूरत है। जेईई की तरह नीट परीक्षा को भी दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहले चरण में स्क्रीनिंग और कक्षा 12 के अंकों के आधार पर भीड़ को कम करके सिर्फ गंभीर छात्रों को मुख्य परीक्षा में शामिल किया जाए। मुख्य परीक्षा में मेरिट वाले छात्रों का चयन होने से नीट की विश्वसनीयता बढ़ने के साथ मेडिकल प्रोफेशन में अच्छे लोग आएंगे। लेकिन एनटीए के पास परीक्षा आयोजित करने का ही अधिकार है। परीक्षा प्रणाली में बदलाव के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और कानून मंत्रालय को साथ मिलकर जरूरी कदम उठाने होंगे।

गवर्नेंस की बदहाली के अधिकांश मामलों में एक पैटर्न नजर आता है। कम पैसे और छोटे प्रयासों से प्रारंभिक स्तर पर समस्या का समाधान नहीं किया जाता। उसके बाद मामला बिगड़ने पर समाज, अर्थव्यवस्था और सरकार सभी को भारी नुकसान होता है। लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित राज्य सिविल सेवा के उम्मीदवारों के इंटरव्यू लेने के दौरान मैंने देखा कि यदि अध्यक्ष सख्त, कुशल और ईमानदार हों, तो परीक्षा प्रणाली पूरी तरह से बेदाग रह सकती है। नीट जैसी बड़ी परीक्षा में छोटे विवाद हमेशा रहेंगे, लेकिन पेपर लीक होकर सोशल मीडिया में नीलाम होना राष्ट्रीय शर्म की बात है।

एनटीए के पास 500 करोड़ रुपये से ज्यादा की धनराशि है। अब लाखों युवाओं की परीक्षा दोबारा आयोजित करने, प्रश्नपत्रों की छपाई, परिवहन, परीक्षा केंद्रों का किराया और लाखों लोगों के मानदेय में सैकड़ों करोड़ रुपये व्यर्थ ही खर्च होंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले और राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों के अनुसार पिछले दो वर्षों में पैसे के बेहतर प्रबंधन से प्रभावी सिस्टम बनता तो पेपर लीक के इस राष्ट्रीय कलंक से बचा जा सकता था।

समिति की सिफारिशों के बावजूद, एनटीए में कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के माध्यम से काम जारी रहना शर्मनाक है। 23 लाख युवाओं और उनके परिवारजनों के सपनों को रौंदने वाले माफिया से जुड़े बड़े खिलाड़ियों के यहां सरकारें निष्पक्ष होकर बुलडोजर चलाएं। नई जनहित याचिका पर सुनवाई से पहले सुप्रीम कोर्ट के दो साल पुराने फैसले पर अमल नहीं करने वाले अधिकारियों को अवमानना की कार्रवाई से कठोर दंड मिले। इससे आक्रोशित युवाओं को थोड़ी राहत मिलने के साथ उनके परिवारजनों और समाज का कानून के शासन पर भरोसा भी बढ़ेगा।

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