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महाशक्तियों की मुलाकात: ट्रंप का चीन दौरा भू-राजनीतिक बदलाव का संकेत, भारत के लिए नतीजों का विश्लेषण जरूरी
अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: Jyoti Bhaskar
Updated Thu, 14 May 2026 09:59 AM IST
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चीन दौरे पर ट्रंप
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एक्स@व्हाइट हाउस
विस्तार
ईरान युद्ध की पृष्ठभूमि में जब विभिन्न अर्थव्यवस्थाएं अनिश्चितताओं से घिरी हैं और महाशक्तियों समेत विभिन्न देश एक किस्म के अविश्वास के दौर से गुजर रहे हैं, तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से तो महत्वपूर्ण है ही, वैश्विक भू-राजनीति की दृष्टि से भी इसके संदेश अहम हैं।
इस यात्रा का महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि पिछले तकरीबन एक दशक में यह पहली बार है, जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर रहते हुए चीन पहुंचा हो। कई बार टलने के बाद अब अगर दो बड़े वैश्विक नेता वार्ता के लिए तैयार हुए हैं, तो इसका अर्थ ही है कि वे आश्वस्त हैं कि रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को खतरनाक टकराव में बदलने से रोकने के लिए सीधी बातचीत जरूरी है। हालांकि यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि ट्रंप की यात्रा से दोनों देशों के बीच गहरे मतभेद आसानी से खत्म हो जाएंगे।
ताइवान का मुद्दा संवेदनशील है, जिसे सैन्य समर्थन देने के मामले में चीन अमेरिका से, वहीं हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी सक्रियता के मद्देनजर अमेरिका चीन से अधिक संयम बरतने की मांग कर सकता है। इसके अतिरिक्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर तकनीक और साइबर सुरक्षा के क्षेत्रों में भी दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है। अमेरिका की यह आशंका पूरी तरह निराधार भी नहीं है कि चीन तकनीकी और सैन्य रूप से उसकी बराबरी करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
गौरतलब है कि अमेरिका और चीन के संबंध ही वर्तमान युग में वैश्विक भू-राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं। शायद इसीलिए दुनिया के विभिन्न देशों की निगाहें इस बैठक पर टिकी हैं और इसके निष्कर्षों में ही उन्हें अपने लिए रणनीतिक जमीन ढूंढनी होगी। जहां तक नई दिल्ली की बात है, तो पिछले कुछ दशकों में अमेरिका ने उसे चीन के खिलाफ एक संतुलनकारी ताकत के रूप में देखा है, जिसका रणनीतिक फायदा भारत को मिला है। लेकिन अब अगर वाशिंगटन और बीजिंग के बीच रिश्तों में गर्माहट बढ़ती है, तो यह समीकरण बदल सकता है।
यही नहीं, अगर चीन पर अमेरिकी दबाव कम होता है, तो वह दक्षिण एशिया में अपनी पैठ को और गहरा करने की कोशिश कर सकता है। हालांकि ये सब अटकलें ही हैं। दरअसल, ट्रंप और शी जिनपिंग की बैठक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और इसकी पारंपरिक अवधारणाओं में आ रहे बदलावों को रेखांकित करती है। भारत के लिए जरूरी है कि वह इस बैठक के नतीजों का विश्लेषण करे, खुद को बदलती वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप ढाले और अपने हितों को प्राथमिकता देते हुए किसी एक राष्ट्र पर अत्यधिक निर्भरता के बगैर नीतियां बनाए।