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मौसम के रंग: वर्तमान स्थितियां केवल असंतुलन के संकेत नहीं, जलवायु परिवर्तन का गंभीर संकट नजरअंदाज करना असंभव

अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: Jyoti Bhaskar Updated Fri, 15 May 2026 04:58 AM IST
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Weather Current conditions not merely signs of imbalance grave crisis of climate change impossible to ignore
जलवायु परिवर्तन का संकट बेहद गंभीर (सांकेतिक) - फोटो : Adobe Stock

मौसम का आए दिन अपने असामान्य तेवर दिखाना अब बेशक एक सामान्य प्राकृतिक घटना हो गई हो, लेकिन फिलहाल खासकर उत्तर भारत में मौसम जिस तरह से अपने रंग दिखा रहा है, वह चिंतित करने वाला है और इसके पीछे छिपी चेतावनियों को भी समझना जरूरी है। एक ओर उत्तर प्रदेश के करीब तीस जिलों में बुधवार को आए आंधी-तूफान में करीब सौ लोगों की जान चली गई, तो राजस्थान व मध्य प्रदेश में मौसम विभाग ने तेज गर्मी, तो बिहार, झारखंड व उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश की चेतावनी जारी की है।


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संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थाएं वर्षों से जो चेतावनी देती रही हैं कि धरती का तापमान बढ़ रहा है और इसका असर मौसम की चरम घटनाओं के रूप में सामने आएगा, वह सही साबित होती दिख रही है। भारत जैसे विशाल और विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश पर इसका असर और भी अधिक पड़ रहा है। एक वैश्विक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण हीटवेव अधिक तेजी से पैदा हो रही हैं।

शायद यही वजह है कि बीते अप्रैल महीने के आखिरी कुछ हफ्तों में दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से 90 से अधिक भारत के ही थे। गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन से हीटवेव पैदा नहीं होती, लेकिन जब मौसम गर्म होता है, तब इसका असर अधिक घातक हो सकता है।

शहरों में बहुमंजिला इमारतें, घनी आबादी और कम हरियाली स्थितियों को और भी खराब कर देते हैं। उत्तर प्रदेश में बुधवार को आए तूफान के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्परता दिखाते हुए 24 घंटों के भीतर पीड़ितों को राहत पहुंचाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन ऐसी आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति के मद्देनजर आपदा प्रबंधन तंत्र को अधिक प्रभावी व आधुनिक बनाए जाने के साथ मौसम संबंधी चेतावनियों को गांव-गांव तक पहुंचाने की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी।

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री का यह कहना बिल्कुल वाजिब है कि चरम मौसमी घटनाएं शहरों, गांवों और अर्थव्यवस्था पर असर डालने वाली हकीकत है, जिसका असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ रहा है। ऐसे में, मौसम पूर्वानुमान संबंधी सूचनाओं के प्रसार तंत्र को समावेशी बनाना भी जरूरी है। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई केवल सरकारें नहीं जीत सकतीं, इसके लिए लोगों को भी जागरूक होना होगा, क्योंकि फिलहाल जो पर्यावरण की स्थितियां हैं, वे केवल मौसमी असंतुलन का संकेत नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के उस गंभीर संकट की ओर भी इशारा करती हैं, जिसे अब नजरअंदाज करना संभव नहीं है।

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