मुद्दा: एक संवत्सर और तेरहवां महीना, इस प्राकृतिक योजना को ज्योतिष शास्त्र ने व्यवस्थित किया है
यह मास मानव कृत सुविधा की व्यवस्था नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्राकृतिक योजना है, जिसे ज्योतिष शास्त्र ने व्यवस्थित किया है।
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इस 17 मई से अधिक मास शुरू हो रहा है, जो 15 जून तक चलेगा। अधिक मास के आते ही यह जिज्ञासा होने लगती है कि बारह महीनों के एक संवत्सर के भीतर तेरहवां मास कैसे आ गया? इसकी गणना कैसे होती है? इसकी शुरुआत कहां से हुई? इसे मल मास या पुरुषोत्तम मास क्यों कहा जाता है? महाभारत में पांडवों के बारह वर्षों के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास की गणना पर दुर्योधन द्वारा उठाए गए विवाद में अधिक मास का उल्लेख है। आचार्य द्रोण और कृपा सहित भीष्म और महात्मा विदुर ने दुर्योधन को समझाया कि प्रत्येक ढाई वर्ष की अवधि के बाद आने से पांडवों के वनवास में पांच बार अधिक मास आए हैं, जिससे युधिष्ठिर आदि पांडवों ने द्रौपदी के साथ पांच माह अधिक वनवास काटा है।
डॉ. पांडुरंग वामन काणे की पुस्तक धर्मशास्त्र का इतिहास के अनुसार अधिक मास का इतिहास पुरातन है। यह मास मानव कृत सुविधा की व्यवस्था नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्राकृतिक योजना है, जिसे ज्योतिष शास्त्र ने व्यवस्थित किया है। ऋग्वेद में बारह के अलावा एक और अतिरिक्त मास का उल्लेख है। वेदांग ज्योतिष ने प्रत्येक पांच वर्षों में दो मास यानी ढाई—ढाई साल के अंतराल में एक—एक अधिक मास जोड़ दिया है।
प्राचीन काल में मासों की गणना चंद्र और सूर्य से होती थी। चांद्र वर्ष में 354 दिन ही होते हैं, जो सौर वर्ष के 365 दिनों की तुलना में 11 दिन कम पड़ते हैं। ऐसे में केवल चांद्र वर्ष की ही अभियोजना होने पर ऋतुओं को पीछे हटाना पड़ जाएगा। इससे ही कई देशों में अधिक मास की अभियोजना निश्चित हुई। कालगणना में ग्रेगेरियन कैलेंडर भी फरवरी को 28 और 29 करता है और हर महीना 30 का नहीं होता। सभी देशों में काल की मौलिक अवधियां प्राय: एक-सी हैं। वैज्ञानिक तथ्य है कि धुरी पर पृथ्वी के घूमने से दिन बनते हैं, जिसमें सूर्य के साथ पृथ्वी के जिस भाग का जुड़ाव होता है, वहां दिन होता है। सूर्य व चंद्र काल के मापक हैं। मास प्रमुखत: चांद्र अवस्थिति है और वर्ष सूर्य की प्रत्यक्ष गति है, पर वास्तव में यह सूर्य के चतुर्दिक पृथ्वी का भ्रमण है। काल गणना के इस क्रम को व्यवस्थित करने का वैज्ञानिक साधन अधिक मास है, जो प्राय: लगभग तीन साल बाद आता है।
इस्लाम ने सूर्य अयनवृत्तीय वर्ष के विस्तार पर ध्यान न देकर चंद्रमा को ही काल का मापक मानकर समाधान कर लिया। उनका वर्ष विशुद्ध चांद्र वर्ष है। इसका परिणाम यह हुआ कि मुसलमानी वर्ष केवल 354 दिन का हो गया और लगभग 33 वर्षों में सारे इस्लामी त्योहार वर्ष के सभी मासों में घूम जाते हैं। दूसरी ओर प्राचीन मिस्र वालों ने चंद्र को काल के मापक के रूप में नहीं माना और उनके वर्ष में 365 दिन थे। मिस्रियों ने 30 दिनों के बारह मास में पांच अतिरिक्त दिन और स्वीकार किए हैं। उनके पुरोहित 3000 वर्षों तक यही विधि मानते रहे। इस कारण उनके यहां अतिरिक्त वर्ष या मलमास नहीं होता। भारत में प्रचलित सभी संवतों में अधिक मास परिकल्पित है।
'श्राद्धविवेक' की टीका में श्रीकृष्ण तर्कालंकार का कथन है कि जिस मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती, ऐसा चांद्रमास मल मास कहलाता है। उत्तर भारत में मास में कृष्णपक्ष पहले और शुक्ल पक्ष बाद में आता है। मास का अंत पूर्णिमा से होता है। पर अधिक मास में इसके विपरीत होता है। इसमें शुक्ल पक्ष पहले और कृष्ण पक्ष बाद में आता है और मास का अंत अमावस्या से होता है।
अधिक मास कई नामों से विख्यात है-अधिमास, मल मास, मलिम्लुच, संसर्प, अंहस्पति या अंहसस्पति, पुरुषोत्तम मास। यह द्रष्टव्य है कि प्राचीन काल से ही अधिक मास निन्द्य ठहराए गए हैं। इसे मल मास इसलिए कहा गया, मानो यह काल का मल है।
कुछ पुराणों ने भगवान विष्णु के नाम से जोड़कर इसे पुरुषोत्तम मास के रूप में मान्यता दी है। परंतु अग्निपुराण (175/29-30) में आया है-वैदिक अग्नियों को प्रज्वलित करना, मूर्ति-प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, व्रत, संकल्प के साथ वेद-पाठ, वृषोत्सर्ग, चूड़ाकरण, उपनयन, नामकरण और अभिषेक अधिमास में नहीं करने चाहिए। वैदिक साहित्य में तेरहवें मास के साथ जो पुरातन भावना थी, वही पुरुषोत्तम मास के साथ जुड़ी रही है। 'गृह्यपरिशिष्ट' ने लगभग हर तीन संवत्सर बाद पड़ने वाले तेरहवें मास के विषय में एक सामान्य नियम दिया है कि मलिम्लुच मास सभी कार्यों के लिए गर्हित (वर्जित) है। धर्मशास्त्र के ग्रंथों ने अधिक मास के धार्मिक कृत्यों का वर्णन किया है। परंपरानुसार अधिक मास में न तो किसी नए व्रत का आरंभ होता है और न ही उद्यापन पर नित्य और नैमित्तिक कृत्य, जैसे तीर्थ स्नान और मृतक के लिए प्रेतश्राद्ध अधिक मास में किए जाते हैं।