सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Society and family exist only because of women public discourse on suicides of homemakers need of the hour

मुद्दा: महिलाएं हैं तभी समाज और परिवार हैं, गृहिणियों की आत्महत्याओं पर सार्वजनिक विमर्श जरूरी

Ritu Saraswat ऋतु सारस्वत
Updated Fri, 15 May 2026 05:13 AM IST
विज्ञापन
सार

एनसीआरबी की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, कुल आत्महत्याओं में गृहिणियों की 13 प्रतिशत हिस्सेदारी होने के बावजूद यह विषय सार्वजनिक विमर्श में अक्सर अदृश्य बना रहता है।

Society and family exist only because of women public discourse on suicides of homemakers need of the hour
आत्महत्याओं में गृहिणियों की 13 प्रतिशत हिस्सेदारी (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों की आत्महत्या कुल आत्महत्याओं का 6.2 प्रतिशत थी, जबकि गृहिणियों की खुदकुशी की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत रही। इसके बावजूद सार्वजनिक विमर्श में गृहिणियों की आत्महत्या अपेक्षाकृत अदृश्य बनी रहती है। वर्ष 1995 में जब पहली बार आत्महत्या पीड़ितों का व्यवसाय आधारित वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया, तो सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि देश में हो रही कुल आत्महत्याओं में गृहिणियों की हिस्सेदारी 19.8 प्रतिशत थी, जो उन्हें आत्महत्या पीड़ितों की श्रेणी में दूसरे स्थान पर रखती थी। तब से लेकर वर्ष 2024 तक कमोबेश यही स्थिति रही है। गृहिणियों की आत्महत्या न तो किसी आंदोलन का आधार बनती है, और न ही किसी वैचारिक ध्रुवीकरण का। संभवतः यही कारण है कि आंकड़ों में लगातार बड़ी हिस्सेदारी होने के बावजूद गृहिणियों की आत्महत्या कभी सार्वजनिक संवेदना और राष्ट्रीय बहस के केंद्र में नहीं आ सकी।

Trending Videos


गृहिणियों को परिवार की आधारशिला कहा जाता है, परंतु क्या उन्हें अपने ही घरों में वह महत्व, सम्मान और भावनात्मक सुरक्षा प्राप्त होती है? यह एक गंभीर सामाजिक प्रश्न है। समाज की एक कठोर वास्तविकता यह भी है कि हम जीवन को लाभ-हानि के गणित से ऊपर उठकर देखने की क्षमता लगातार खोते जा रहे हैं। इसी मानसिकता के कारण घरेलू महिलाओं को बार-बार यह महसूस कराया जाता है कि उनका श्रम आर्थिक दृष्टि से कोई 'उत्पादक' योगदान नहीं देता। अनेक महिलाएं भी मानने लगती हैं कि वे परिवार के लिए मूल्यहीन हैं। यही आत्मग्लानि धीरे-धीरे मानसिक अवसाद का रूप ले लेती है, जो उन्हें आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाने के लिए भी विवश करती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


भारतीय महिलाएं प्रतिदिन सात घंटे से अधिक समय अवैतनिक घरेलू एवं देखभाल संबंधी कार्यों में व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुष तीन घंटे से भी कम समय इन कामों के लिए देते हैं। यानी महिलाएं पुरुषों की तुलना में लगभग 2.6 गुना अधिक घरेलू श्रम करती हैं। यदि गृहिणियों द्वारा किए जा रहे घरेलू और देखभाल संबंधी कार्य बाहरी लोगों से कराए जाएं, तो उसके लिए बड़ी आर्थिक लागत वहन करनी पड़ेगी। फिर भी गृहिणियों के श्रम को अक्सर खारिज कर दिया जाता है। अक्सर गृहिणियों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूछा जाता है कि 'वे करती क्या हैं?' वर्ष 1975 में आइसलैंड की महिलाओं ने वर्षों से पूछे जा रहे इस प्रश्न के प्रतिकार में एक दिन के लिए घरेलू कार्यों का बहिष्कार कर दिया था। परिणाम यह हुआ कि बैंक, विद्यालय, नर्सरी और अनेक संस्थान तक प्रभावित हो गए। बड़ी संख्या में पुरुषों को बच्चों की देखभाल के लिए उन्हें अपने कार्यस्थलों तक ले जाना पड़ा। उस एक दिन ने यह स्पष्ट कर दिया था कि जिन कार्यों को सामान्य और अदृश्य मान लिया गया है, वही परिवार और समाज की सबसे मूलभूत शक्ति हैं।

आइसलैंड की वह घटना वस्तुतः एक चेतावनी थी, जिसे आज तक हम पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। हम आज भी यह नहीं समझ पाए हैं कि जिन महिलाओं के श्रम पर परिवार और समाज की संरचना टिकी होती है, उन्हें उपेक्षा, तिरस्कार और शारीरिक प्रताड़ना तक का सामना करना पड़ता है। संभवतः यही कारण है कि भारत में अनेक गृहिणियां अपने जीवन को समाप्त करने के लिए विवश हो रही हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed