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मुद्दा: क्या नेपाल में चुनाव से स्थिरता आएगी, दो दिन बाद होना है मतदान

महेंद्र वेद Published by: Pavan Updated Tue, 03 Mar 2026 08:24 AM IST
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सार
आर्थिक संकट, बढ़ती बेरोजगारी और शासन के प्रति असंतोष की पृष्ठभूमि में आगामी पांच मार्च को नेपाल में मतदान होने जा रहे हैं। नेपाल ने बहुत ज्यादा राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखा है, 2008 में संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के बाद से नेपाल में 14 सरकारें और 14 प्रधानमंत्री बदल चुके हैं।
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Nepal Elections: Will elections bring stability in Nepal? Voting is in two days.
नेपाल चुनाव आयोग - फोटो : election.gov.np/np/

विस्तार

भारत के पड़ोसी देशों में वर्ष 2024 में युवाओं के विरोध प्रदर्शनों के जरिये जो सत्ता परिवर्तन शुरू हुआ था, अब चुनावी तौर पर राजनीतिक फायदे दे रहा है। म्यांमार इसका अपवाद है, जहां सेना ने जीत हासिल की। लेकिन श्रीलंका और बांग्लादेश में हुए चुनावों से ऐसी सरकारें बनी हैं, जिनसे राजनीतिक स्थिरता की उम्मीदें बढ़ी हैं। अब नेपाल में पांच मार्च को मतदान होने जा रहा है। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि में आर्थिक संकट, बढ़ती बेरोजगारी और शासन के प्रति असंतोष प्रमुख कारण रहे।


डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इन विरोध प्रदर्शनों को संगठित और प्रभावी बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन को सोशल मीडिया ने गति दी। नेपाल में जब सितंबर में के. पी. शर्मा ओली सरकार ने डिजिटल माध्यमों पर प्रतिबंध लगाया, तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।


तकनीक के सहारे उभरी युवा शक्ति अब दक्षिण एशिया की राजनीति में निर्णायक बनती जा रही है।  नेपाल में भी युवाओं का ऐसा ही उभार दिख रहा है। हालांकि, 78 वर्षीय पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह ने वीडियो के जरिये अपील की, जिसमें नेपाली समाज में गहराई से बसी राजशाही परंपरा को बढ़ावा दिया है। खास बात यह है कि सिंतबर, 2025 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान, राजशाही की बहाली की बात फिर से उठी। जब भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के बीच भाई-भतीजावाद जैसे मुद्दे प्रमुख हों, तब चुनाव टालने की ज्ञानेंद्र की अपील मतदाताओं को भ्रमित करती है।

इन सबके बावजूद, अंतरिम सरकार की प्रमुख और पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की ने गणतांत्रिक संविधान में निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार देश में चुनाव कराने का निर्णय बरकरार रखा है। इस बार 19 लाख मतदाता दो मतपत्रों के माध्यम से निचले सदन और उच्च सदन के लिए मतदान करेंगे। इसमें प्रत्यक्ष बहुमत प्रणाली और आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का मिश्रण अपनाया गया है। यह नेपाल में पहली बार हो रहा है। 165 निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग 3,500 उम्मीदवार मैदान में हैं और 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इस बार मतदाताओं में आठ लाख प्रथम बार वोट देने वाले युवा हैं।

सत्तर वर्षीय ओली, चौथी बार प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। लेकिन उन्हें 35 वर्षीय बालेन शाह से चुनौती मिल रही है। बालेन शाह राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ( आरएसपी) का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जो 2022 के आम चुनाव में चौथे स्थान पर रही थी। विश्लेषकों का कहना है कि इस बार उसका प्रदर्शन बेहतर हो सकता है। शाह को पार्टी ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है। ओली के अन्य प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सहयोगी पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ भी दबाव में हैं। युवाओं के रुझान को देखते हुए नेपाली कांग्रेस पार्टी ने चार बार प्रधानमंत्री रहे अपने अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा को हटा दिया है। पार्टी ने 49 वर्षीय गंगा थापा को संभावित प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया है।

दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति के संदर्भ में नेपाल की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। भारत को चीन और अमेरिका की सक्रियता से चुनौती मिल रही है। हालांकि नेपाल ने हमेशा संतुलन की नीति अपनाई है। वर्ष 2017 में नेपाल एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करके चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का हिस्सा बना। 4 दिसंबर, 2024 को नेपाल और चीन ने बुनियादी ढांचा, पर्यटन और संपर्क परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए बीआरआई की नई सहयोगी रूपरेखा पर हस्ताक्षर किए। भारत, जो उसका पारंपरिक साझेदार रहा है, वित्त और परियोजनाओं के मामले में चीन की बराबरी नहीं कर पाया है। खासकर केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में मार्क्सवादी-माओवादी सरकारों ने सीमा विवाद को हवा दी और भारतीय क्षेत्र के कुछ हिस्सों को अपने नक्शे में दर्शाया।

नेपाल ने बहुत ज्यादा राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखा है, 2008 में संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के बाद से नेपाल में 14 सरकारें और 14 प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। पिछले वर्ष के विरोध प्रदर्शनों के बाद यह पहला चुनाव कई प्रश्न खड़े करता है। इन घटनाओं ने उस राजनीतिक सहमति को कमजोर किया है, जिसके आधार पर नेपाल भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखता था। राजनीतिक स्थिरता के समय नेपाल ने रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी थी, लेकिन वर्तमान राजनीतिक विखंडन और नए नेताओं के उभार से इस नीति की निरंतरता पर खतरा मंडरा सकता है। चुनावों से अब तक स्थिरता नहीं आई है और सरकारों में बार-बार बदलाव हुआ है। यदि अगली सरकार घरेलू वैधता और संस्थागत मजबूती बहाल नहीं कर पाती, तो नेपाल सक्रिय भू-राजनीतिक संतुलनकर्ता के बजाय महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बन सकता है। कुल मिलाकर, नेपाल कमजोर अर्थव्यवस्था, युवा मतदाता वर्ग, विभाजित पुराने नेतृत्व और यथास्थिति को चुनौती देती नई पीढ़ी की लहर के बीच चुनाव की ओर बढ़ रहा है।
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