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हर तीसरी थाली से पोषण गायब: आखिर क्यों महंगा होता जा रहा है स्वस्थ भोजन? एफएओ की रिपोर्ट में चेतावनी

Wed, 29 Jul 2026 04:31 AM IST
Seema Javed सीमा जावेद
Updated Wed, 29 Jul 2026 04:31 AM IST
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सार
संयुक्त राष्ट्र और एफएओ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया का हर तीसरा व्यक्ति पौष्टिक भोजन खरीदने में सक्षम नहीं है। पिछले पांच वर्षों में स्वस्थ आहार की लागत 25 प्रतिशत और 2017 के बाद 45 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है। लंबी खाद्य आपूर्ति शृंखला, किसानों को कम दाम, उपभोक्ताओं पर बढ़ता बोझ और जलवायु परिवर्तन इस संकट को और गहरा रहे हैं। यदि मौजूदा स्थिति बनी रही तो 2030 तक भी 51–52 करोड़ लोग कुपोषण से जूझ सकते हैं।
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Nutrition missing from every third plate Why is healthy food becoming so expensive FAO report issues warning
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

कई बार हमारी थाली में खाना तो होता है, लेकिन उसमें वे पोषक तत्व जैसे विटामिन, लौह तत्व, खनिज और प्रोटीन नहीं होते, जो शरीर को स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए जरूरी हैं। ऐसे में पेट तो भर जाता है, लेकिन शरीर कुपोषण का शिकार बना रहता है। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने चेतावनी दी है कि पिछले पांच वर्षों में स्वस्थ आहार की वैश्विक लागत 25 प्रतिशत बढ़ गई है, जो गरीबी में जीवनयापन करने वाले लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही है। वर्ष 2025 में 64.5 करोड़ लोगों को भुखमरी का सामना करना पड़ा। यह आंकड़ा 2019 में कोविड-19 महामारी से पहले की तुलना में 6.1 करोड़ अधिक है।



महंगा भोजन क्यों मिल रहा है?
एक ओर किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं को वही खाद्य सामग्री खरीदने के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। हाल के वर्षों में वैश्विक स्तर पर भूख और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन दुनिया अब भी वर्ष 2030 के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) से काफी दूर है। संयुक्त राष्ट्र की 'द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2026' रिपोर्ट भी यही संकेत देती है।


स्वस्थ आहार की पहचान किन चार आधारों पर होती है?
स्वस्थ और पौष्टिक आहार वह है, जो मानव शरीर की जैविक आवश्यकताओं तथा वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित चार मूलभूत कसौटियों पर खरा उतरता हो। पहला है विविधता, यानी भोजन में सभी प्रमुख खाद्य समूहों के साथ विभिन्न प्रकार के पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल हों। दूसरा है पर्याप्तता, अर्थात शरीर की आवश्यकता के अनुसार सभी जरूरी पोषक तत्व और जैव-सक्रिय (बायोएक्टिव) यौगिक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों। तीसरा है संतुलन, यानी कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन जैसे ऊर्जा स्रोत उचित अनुपात में हों। चौथा है संयम, अर्थात ऐसे तत्वों का सीमित सेवन किया जाए, जिनकी अधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है। यही चार सिद्धांत किसी भी संतुलित और स्वस्थ आहार की आधारशिला माने जाते हैं।

खराब खानपान दुनिया के लिए कितना बड़ा खतरा बन चुका है?
स्वस्थ और संतुलित भोजन केवल बेहतर स्वास्थ्य और बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि यह आजीविका, उत्पादकता और सामाजिक-आर्थिक प्रगति का भी महत्वपूर्ण आधार है। इसके बावजूद दुनिया अस्वास्थ्यकर खानपान के विरोधाभास से जूझ रही है। यही कारण है कि खराब आहार आज वैश्विक रोग-भार (ग्लोबल डिजीज बर्डन) के प्रमुख कारणों में शामिल है, जिसके चलते स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक कल्याण- तीनों स्तरों पर भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

हर तीसरा व्यक्ति पौष्टिक भोजन क्यों नहीं खरीद पा रहा है?
खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो कुलेन के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया के लगभग 2.69 अरब लोग, यानी हर तीन में से एक व्यक्ति, ऐसा पौष्टिक आहार खरीदने में सक्षम नहीं थे, जो शरीर की ऊर्जा और आवश्यक पोषक तत्वों की जरूरत पूरी कर सके। पेट भरने वाले सस्ते अनाज तो उपलब्ध हैं, लेकिन फल, सब्जियां और अन्य पोषक खाद्य पदार्थ लगातार महंगे होते जा रहे हैं।

आखिर पौष्टिक भोजन इतना महंगा क्यों हो गया है?
इसकी एक बड़ी वजह कृषि से लेकर उपभोक्ता तक फैली लंबी और असंतुलित खाद्य आपूर्ति शृंखला है। किसानों से कम कीमत पर खरीदे गए कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण, पैकेजिंग और ब्रांडिंग होने के बाद उनका मूल्य कई गुना बढ़ जाता है। हालांकि इस बढ़ी हुई कीमत का बड़ा हिस्सा किसानों के बजाय बिचौलियों, प्रसंस्करण कंपनियों और खुदरा कारोबारियों के पास चला जाता है। परिणामस्वरूप उपभोक्ता पौष्टिक भोजन के लिए अधिक कीमत चुकाता है, जबकि किसान अपनी मेहनत का उचित प्रतिफल नहीं प्राप्त कर पाता। वर्ष 2017 के बाद से पौष्टिक भोजन की लागत में लगभग 45 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। यानी स्वस्थ भोजन अब धीरे-धीरे आम लोगों की पहुंच से दूर होता जा रहा है।

क्या 2030 तक भी खत्म नहीं होगी कुपोषण की समस्या?
अनुमानों के अनुसार, यदि वर्तमान रुझान जारी रहे तो वर्ष 2030 तक भी दुनिया में 51 से 52 करोड़ लोग लंबे समय तक कुपोषण का शिकार रह सकते हैं। इनमें से लगभग 56 प्रतिशत लोग अकेले अफ्रीका में होंगे। हाल के वैश्विक घटनाक्रम, जिनमें पश्चिम एशिया का युद्ध भी शामिल है, अफ्रीका और एशिया में खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं। इससे सतत विकास लक्ष्य-2.1 की दिशा में हुई प्रगति कमजोर पड़ने का खतरा बढ़ गया है।

जलवायु परिवर्तन भोजन की थाली पर कितना भारी पड़ सकता है?
जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते मौसम चक्र कृषि उत्पादन को लगातार प्रभावित कर रहे हैं। भीषण गर्मी, असमय बारिश, बाढ़ और अन्य चरम मौसमी घटनाएं किसानों की चुनौतियां बढ़ा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और गंभीर हो सकता है, जिससे कृषि उत्पादन घटने तथा खाद्य सुरक्षा पर अतिरिक्त दबाव बढ़ने की आशंका है।

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