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वन नेशन और वन परीक्षा व आवेदन शुल्क: शिक्षा के व्यावसायीकरण की सच्चाई, फीस में समानता की जरूरत
Mon, 09 Feb 2026 06:51 AM IST
देवेश त्रिपाठी
डॉ. विवेक एस. अग्रवाल
डॉ. विवेक एस. अग्रवाल
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Mon, 09 Feb 2026 06:51 AM IST
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उच्चतर शिक्षा संस्थानों में फीस वसूली
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विस्तार
देश में एक साथ चुनाव करवाने के लिए वन नेशन वन इलेक्शन विषय पर व्यापक चर्चा की जा रही है। इसके पीछे मूल रूप से जनता को होने वाली असुविधा तथा निरंतर चुनाव संचालन में होने वाले व्यय को आधार माना गया है। इसी संदर्भ में एक विषय देश में निरंतर होने वाली परीक्षाएं भी है। विद्यालयी स्तर पर, निजी हो या सरकारी, दोनों प्रकार की संस्थाओं का नियंत्रण राज्य या केंद्रीय बोर्ड के माध्यम से किया जाता रहा है, लेकिन तदुपरांत संपूर्ण शिक्षा एवं प्रतियोगिताएं लगभग अनियंत्रित हो जाती हैं।स्वायत्तता एवं निजीकरण के नाम पर उच्चतर शिक्षा संस्थानों को नीति के साथ विभिन्न मदों हेतु अपने शुल्क तय करने की भी छूट प्राप्त होती है। विभिन्न संस्थानों के प्रवेश शुल्क से लेकर शिक्षण एवं परीक्षा शुल्क में अत्यधिक भिन्नता देखने को मिलती है। इन भिन्नताओं की शुरुआत प्रवेश चाहने वाले भावी विद्यार्थियों को बेचे जाने वाले आवेदन पत्रों से ही हो जाती है। यदि आवेदन पत्र का विश्लेषण करें, तो उसमें मूलभूत जानकारी के साथ-साथ संस्थान संबंधी जानकारी होती है। प्रशासनिक शुल्क भी जोड़ लिया जाए, तो उसकी लागत कुछ सौ रुपये तक ही सीमित रह जाएगी। लेकिन संस्थानों द्वारा छात्रों से अधिकतम राशि वसूली जाती है। यह व्यवस्था न सिर्फ औपचारिक, अपितु अनौपचारिक एवं ट्यूशन तथा प्रशिक्षण संस्थानों में भी विद्यमान है।
पूरे देश में स्थित विद्यालयों में 25 करोड़ तथा महाविद्यालयों में पांच करोड़ के करीब छात्र अध्ययनरत हैं। यदि इनमें से आधे सरकारी, तो शेष छात्र निजी क्षेत्र में ही पढ़ रहे हैं। यह भी तथ्य है कि एक विद्यार्थी औसतन दो बार प्रवेश हेतु आवेदन प्रपत्र खरीदता है। यदि निजी क्षेत्र में एक आवेदन पत्र की न्यूनतम कीमत 1,000 रुपये मानी जाए, तो देशभर में लगभग 25,000 करोड़ रुपये का व्यवहार मात्र प्रवेश हेतु आवेदन पत्रों की बिक्री से ही होता है। उच्चतर शिक्षा के निजी संस्थानों में तो आवेदन पत्र की राशि पूरी तरह बेलगाम दिखाई देती है। इसके विपरीत, केंद्रीय विद्यालयों समेत सरकारी शिक्षण संस्थानों में यह प्रायः शून्य ही होता है। उच्चतर शिक्षा के निजी संस्थानों में तो आवेदन पत्र की राशि बेलगाम होती है। आवेदन के डिजिटल विकल्प के लिए भी शुल्क वसूला जाता है। सरकारी विद्यालयों से बेरुखी का एक कारण यह भी हो सकता है कि वहां किसी भी प्रकार के शुल्क की वसूली नहीं की जा सकती, क्योंकि आमजन के मन में बिना शुल्क की किसी भी वस्तु या सेवा को गुणात्मक दृष्टि से हेय समझ लिया जाता है।
शिक्षण संस्थानों में आवेदन, प्रार्थना पत्र और परीक्षा जैसे हर अवसर को राजस्व वसूली का माध्यम बना लिया गया है। हाल ही एक निजी मेडिकल विश्वविद्यालय में पीजी की परीक्षा हेतु आवेदन शुल्क की राशि आठ लाख रुपये वसूली गई। छात्रों के लिए मजबूरी होती है कि आवेदन के बिना परीक्षा कैसे दें? यह प्रत्यक्ष रूप से न सिर्फ ब्लैकमेलिंग, बल्कि शोषण के समकक्ष अपराध भी है। छात्र एवं अभिभावक आवाज नहीं उठा पाते, क्योंकि संपूर्ण कॅरिअर दांव पर लगा होता है। सरकार यह कहकर पल्ला झाड़ लेती है कि स्वायत्तता के नाते संपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार निजी प्रबंध मंडल को ही है। लेकिन तथ्य यह भी है कि समस्त निजी विश्वविद्यालय राज्यों की विधानसभा द्वारा पारित विधेयक के जरिये स्थापित हैं और उनके प्रबंध मंडल में सरकारी प्रतिनिधि भी होते हैं, किंतु अपनी अक्षमता को ढकने के लिए ऐसे बहाने गढ़ दिए जाते हैं। वर्तमान युग में जब सब कुछ डिजिटल हो गया है, संस्थानों द्वारा डिजिलॉकर, लिंक, ई-मेल या किसी साझा प्रवेश संबंधी आवेदन के जरिये भावी छात्र का डाटा उपयोग कर धन के साथ कागज के जरिये हो रहे पर्यावरणीय नुकसान को भी रोका जा सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में ब्रिटेन के महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों ने लगभग 20 वर्ष पहले यूकास पोर्टल के जरिये साझा आवेदन लेने की शुरुआत कर दी थी, जिसके जरिये छात्र को एकबारगी देय शुल्क के साथ अनेक संस्थानों में आवेदन का विकल्प प्राप्त होता था। कालांतर में तकनीकी दक्षता में उन्नयन के साथ प्रवेश प्रक्रिया को सहज बनाया जा सकता है।
निजी संस्थान यदि इसी प्रकार निरंकुश तरीके से वसूली करके अपनी आय वृद्धि करते रहे, तो शिक्षा प्राप्त करना जटिल होता जाएगा। नीतिगत स्तर पर शिक्षण शुल्क के साथ अप्रत्यक्ष माध्यमों से हो रही वसूली पर निगरानी रखने के लिए कठोर नियमावली के साथ नियामक संस्था का गठन होना चाहिए। वैसे, पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न वर्गों द्वारा सरकारी विद्यालयों के आधारभूत ढांचे में अभिवृद्धि की पहल की गई है, लेकिन निजी क्षेत्र की मार्केटिंग के आगे अब भी सरकारी संस्थानों में शिक्षण के प्रयास धूमिल हो जाते है। सामाजिक मान्यताओं के चलते निजी क्षेत्र पहली पसंद बने हुए हैं और हर कोई उस चक्रव्यूह में प्रवेश के लिए यत्नशील रहता है। प्रारंभिक तौर पर विभिन्न आवेदन पत्रों एवं परीक्षा शुल्क में निःशुल्क या एकरूपता के साथ डिजिटलाइजेशन लागू करने संबंधी कदम उठाए जा सकते हैं। इस नियामक कदम से करोड़ों छात्रों को राहत मिलेगी और अनावश्यक खर्चों से मुक्ति मिलेगी। यह तो मात्र एक बानगी है शिक्षा के व्यावसायीकरण की।