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आस्था से अर्थतंत्र तक: क्या मंदिरों की बढ़ती अर्थव्यवस्था को चाहिए नई जवाबदेही व्यवस्था?
Thu, 25 Jun 2026 06:50 AM IST
Devesh Tripathi
संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार
संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार
Published by: Devesh Tripathi
Updated Thu, 25 Jun 2026 06:50 AM IST
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राम मंदिर
- फोटो :
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विस्तार
अयोध्या से उज्जैन तक। चढ़ावे से जमीन तक। धर्म से मुनाफे तक। यह सिर्फ भक्ति की कहानी नहीं है। यह गंभीर अर्थव्यवस्था की कहानी है। सैकड़ों करोड़ रुपये का दान एक तरफ, दूसरी तरफ धर्मस्थल-केंद्रित विकास से उछलती जमीन की कीमतें। जब इतना पैसा और इतनी जमीन एक साथ घूमने लगें, तो शक भी होगा, सवाल भी उठेंगे कि आखिर इस अर्थव्यवस्था की जवाबदेही किसके पास है?अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट को मंदिर खुलने के बाद सैकड़ों करोड़ रुपये का दान मिल चुका है। नकद, सोना, चांदी, वस्तुएं इत्यादि सब कुछ आ रहा है। लेकिन, हाल में दान प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए। नकदी प्रबंधन (कैश हैंडलिंग) में लापरवाही, कुछ पुराने दान का हिसाब न मिलना, दान पेटियों से बिना ट्रेस की रकम, इन सबने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) को बुला लिया। ट्रस्ट ने खुद इस अनियमितता की जांच की मांग की, लेकिन सवाल अब भी वही है कि इतने बड़े पैमाने पर दान आने के बाद भी धर्मस्थलों में पारदर्शी व्यवस्था क्यों नहीं है?
इसी अयोध्या शहर में मंदिर और कॉरिडोर निर्माण के नाम पर जमीन अधिग्रहण और सड़क चौड़ीकरण का काम हुआ। हजारों घर और दुकानें प्रभावित हुईं। कई जगहों पर लोगों ने मुआवजे को अपर्याप्त बताया, जबकि कुछ लोगों ने कहा कि उनकी जमीन को अतिक्रमण बता दिया गया। इस प्रक्रिया में सामाजिक प्रभाव आकलन की कमी के आरोप भी लगे। ये विवाद अब भी अदालतों में लंबित हैं। अब उज्जैन को ही देख लीजिए। महाकालेश्वर मंदिर चढ़ावा, टिकट बिक्री, सोना-चांदी का दान, यानी सब मिलाकर हर साल कई करोड़ रुपये की आय अर्जित करता है।
दोनों धर्मस्थलों पर एक बात साफ है-मंदिर वाली जगहों पर आर्थिक गतिविधि सामान्य शहरों से अलग है। यहां भक्ति का पैसा आता है, सरकारी नीतियां विकास को बढ़ावा देती हैं, और आसपास की जमीन की कीमतें रातोंरात बढ़ जाती हंै। इसका क्या नतीजा होता है? ऐसे शहरों में जमीन विवाद, अधिग्रहण के सवाल, और सट्टेबाजी के आरोप सामान्य शहरों से ज्यादा तेजी से उभरते हैं। यह कोई सामान्य शहरी विकास नहीं है। यहां मूल्य सृजन का केंद्र मंदिर और उससे जुड़ी योजनाएं हैं। इसलिए, इन कस्बों के भूमि विवादों को सामान्य राजस्व या सिविल कोर्ट के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
जाहिर है, इसके लिए जरूरत है एक अलग, विशेष भूमि ट्रिब्यूनल या फास्ट-ट्रैक बेंच की, जो मंदिर-प्रभावित क्षेत्रों के जमीन से संबंधित मामलों को प्राथमिकता से निपटाए। जमीन अधिग्रहण, मुआवजा, टाइटल और बेनामी सौदों पर तेज सुनवाई हो। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता अनिवार्य हो, वरना ये विवाद वर्षों तक लटकते रहेंगे और आम लोगों का भरोसा टूटता रहेगा। अब दान की तरफ लौटते हैं। धार्मिक स्थलों में हर साल करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। लेकिन, आज भी ज्यादातर जगहों पर इसके रखरखाव के लिए पुरानी पद्धति ही चल रही है-यानी हुंडी में डालो, हिसाब बाद में देखा जाएगा।
जब वेंडिंग मशीन नकदी (कैश) स्वीकार कर सकती है और बदले में चिप्स या कोल्ड ड्रिंक दे सकती है, जब एटीएम में लगी कैश डिपॉजिट मशीन (सीडीएम) कैश स्वीकार कर रसीद और बैलेंस दिखा सकती है, तो मंदिरों में डोनेशन के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती? इसके लिए बस एक साधारण मशीन चाहिए। दानकर्ता नोट डाले। मशीन तुरंत रसीद प्रिंट करे, जिसमें राशि, तारीख, समय, धार्मिक स्थल का नाम और एक यूनिक नंबर लिखा हो। वह नंबर ऑनलाइन पोर्टल पर चेक भी किया जा सके। पूरा हिसाब रीयल टाइम में रिकॉर्ड हो। दानकर्ता को तुरंत ऑनलाइन प्रूफ मिल जाए।
उच्च मूल्य के दान के लिए कैमरा रिकॉर्डिंग अनिवार्य हो, लाइव या तुरंत उपलब्ध फीड पब्लिक पोर्टल पर हो। यह कोई जटिल बात नहीं है। तकनीक पहले से मौजूद है। बस इच्छाशक्ति और नियम की जरूरत है। इससे दानकर्ता को भरोसा मिलेगा कि उसका पैसा सही जगह पहुंचा। ट्रस्ट को भी बाद में किसी आरोप से बचने में आसानी होगी। और सबसे महत्वपूर्ण कि दान अब व्यक्तिगत आस्था का मामला नहीं रह जाएगा। यह सार्वजनिक धन बन जाएगा, जिसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
कुल मिलाकर, मंदिरों और ट्रस्टों की संख्या हजारों में है। कई बड़े मंदिरों की आय सरकारी विभागों से ज्यादा है। कुछ राज्य एंडोमेंट विभाग के अधीन हैं, कुछ स्वायत्त ट्रस्ट, कुछ विशेष कानून। नतीजा, हर जगह अलग-अलग नियम, अलग-अलग जवाबदेही।
समय आ गया है एक धर्मस्थल अर्थव्यवस्था जवाबदेही आयोग या ट्रिब्यूनल बनाने का। उसका काम सिर्फ आस्था या पूजा पद्धति पर ही केंद्रित नहीं होगा। उसका दायरा साफ होगा। दान की प्राप्ति, उसका हिसाब, वस्तु के रूप में आए दान की रिकॉर्डिंग, वार्षिक ऑडिट का सार्वजनिक प्रकाशन, और दानकर्ता को जानकारी मांगने का अधिकार। साथ ही, धर्मस्थल-केंद्रित क्षेत्रों में भूमि विवादों की तेज सुनवाई। हर दानकर्ता को यह अधिकार होना चाहिए कि वह पूछ सके कि उसके दान का क्या हुआ। और, अगर जवाब संतोषजनक न मिले, तो ट्रिब्यूनल में शिकायत कर सके।
अपारदर्शिता हर जगह भ्रष्टाचार को जन्म देती है, चाहे वह सरकारी विभाग हो, राजनीतिक दलों की फंडिंग हो या धार्मिक ट्रस्ट। जब मशीनें पैसे गिन और रसीद दे सकती हैं, जब एटीएम हर ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड कर सकते हैं, तो धर्मस्थलों में दान की व्यवस्था को आधुनिक क्यों नहीं बनाया जा सकता?
edit@amarujala.com