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यह चोरी नहीं पाप है: ऐसे लोगों के हाथ में हो मंदिरों का प्रबंधन, जो दान की संपत्ति की चोरी को समझें विषपान

Fri, 26 Jun 2026 07:14 AM IST
Devesh Tripathi विनीत नारायण
विनीत नारायण Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 26 Jun 2026 07:14 AM IST
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सार
धार्मिक स्थलों से धूल का कण ले जाना भी जघन्य अपराध है। ऐसे में, सरकार को उनका प्रबंधन ऐसे लोगों को सौंपना चाहिए, जो दान की संपत्ति की चोरी को विषपान जैसा समझें।
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राम मंदिर - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावे की चोरी को लेकर रोज विस्फोटक खुलासे हो रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो जांच समिति गठित की है, वह अपने उद्देश्य में कितनी सफल हो पाएगी, यह तो उसकी रिपोर्ट देखने के बाद ही पता चलेगा। किंतु, एक बात तय है कि मंदिर में चढ़ाए गए धन, सोना-चांदी व जवाहरात आदि की लेशमात्र भी चोरी करना शास्त्रों में जघन्य अपराध बताया गया है।


2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश महोदय के अनुरोध पर मैंने मथुरा के दो प्रसिद्ध मंदिरों के रिसीवर का अवैतनिक पद स्वीकार किया था। मंदिर प्रबंधन की चुनौती थी-चढ़ावे की राशि का ईमानदारी से आकलन करके उसे बैंक में जमा कराना। इसमें काफी गड़बड़ी की शिकायतें आती थीं। मुझे एक फोन आया कि मैं हर महीने चौदह में से दो दान-पात्र अपने लाभ के लिए अलग करवा लूं। यह सुनकर मुझे बहुत धक्का लगा। पर, इसे एक चेतावनी मानकर मैंने एक नई व्यवस्था बनाई। मंदिर के प्रांगण में जहां गुल्लकें (दानपत्र) खोली जाती थीं, वहां वीडियो कैमरे लगवा दिए और प्रशासनिक अधिकारियों को सतर्कता बरतने के लिए बिठा दिया। नतीजतन, पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा दानराशि गुल्लकों से निकली, जिसे बैंक में जमा करा दिया गया।


इसी तरह एक और रोचक अनुभव हुआ। वृंदावन के एक प्रतिष्ठित नागरिक एक दिन सुबह मेरे घर आए और बोले कि उनके परिचित कोलकाता के एक सेठ, बिहारी जी मंदिर को मोटी नकद रकम दान देना चाहते हैं। पर, वह आपके हाथ में ही पैसा देना चाहते हैं। उन्हें मैं आज शाम को आपके घर लेकर आऊंगा। आप दान ले लेना और उसमें से एक-तिहाई रकम आप रख लेना व एक-तिहाई मुझे दे देना। बाकी मंदिर में जमा करा देना। मैंने उनके प्रस्ताव पर सहमति जताई। निर्धारित समय पर मंदिर के मैनेजर, अकाउंटेंट और दो बैंकों के कैशियरों को पहले से बुलाकर अपनी कोठी के स्टाफ क्वार्टर में बिठा दिया। दानदाता और उन स्थानीय नेता की मैंने आवभगत की। जब सेठ जी नोटों की गड्डियां बैग से निकालने लगे, तो मैंने फौरन मंदिर के स्टाफ को बुला लिया। यह देख कर नेता जी विचलित हो गए। मंदिर स्टाफ ने जब नोट गिन लिए, तो मैंने उन्हें यह सब धनराशि बैंक में जमा कराने को कह दिया और उन्हें तुरंत  ‘गुप्तदान’ की रसीद काट कर दिलवा दी। उस दिन के बाद से ऐसा प्रस्ताव लेकर कोई मेरे पास नहीं आया।

त्रिवेंद्रम के विश्व प्रसिद्ध व दुनिया के सबसे ज्यादा संपन्न पद्मनाभस्वामी मंदिर का उदाहरण पूरे भारत के लिए अनुकरणीय है। इस मंदिर का स्वामित्व वहां के राज परिवार के पास है। मंदिर के लॉकरों में लाखों करोड़ रुपये का सोना, चांदी और जवाहरात जमा हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि सदियों से राज परिवार ने अपनी निजी संपत्ति होते हुए भी मंदिर के चढ़ावे में से एक अंश भर भी लेना स्वीकार नहीं किया। हर दिन प्रातः भगवान के प्रथम दर्शन का अधिकार राज परिवार को प्राप्त है। परिवार जब हर रोज दर्शन करके मंदिर से बाहर निकलता है, तो मंदिर के द्वार पर बैठकर अपने पैर के तलवों पर चिपक गई मंदिर की धूल को अपने हाथों से झाड़ कर वहीं गिरा देता है। तात्पर्य यह है कि भगवान के मंदिर से धूल का कण भी ले जाना उनकी दृष्टि में जघन्य अपराध है। सरकार को धार्मिक स्थलों का प्रबंधन ऐसे ही लोगों को सौंपना चाहिए, जो दान की संपत्ति की चोरी को विषपान जैसा समझें।
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