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अस्थायी राहत, स्थायी संकट: हीटवेव से सूखे तक, दुनिया को चेतावनी दे रहा बदलता मौसम

Thu, 25 Jun 2026 06:46 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Thu, 25 Jun 2026 06:46 AM IST
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सार
भारत के कुछ हिस्सों में हाल के दिनों में हुई बारिश ने भीषण गर्मी से फौरी तौर पर राहत बेशक दिलाई हो, लेकिन दुनियाभर में बढ़ता तापमान इशारा करता है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ किसी एक देश या महाद्वीप की समस्या नहीं रह गया है। लिहाजा, सभी देशों को मिलकर कदम उठाने होंगे।
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Mumbai Rain Photos - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत के कुछ हिस्सों में हाल के दिनों में हुई मानसून पूर्व बारिश से भीषण गर्मी व हीटवेव से जूझ रहे लोगों को कुछ राहत अवश्य मिली है, लेकिन इस वक्त पूरी दुनिया में जिस तरह से गर्मी का संकट लगातार गहराता जा रहा है, उससे यह स्पष्ट है कि मौसम की यह फौरी मेहरबानी उस गंभीर चुनौती को नहीं छिपा सकती, जो धरती के भविष्य पर लगातार मंडरा रही है। इसकी सबसे चिंताजनक तस्वीर इस समय यूरोप में दिखाई दे रही है, जहां फ्रांस, स्पेन, इटली, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों में अभूतपूर्व गर्मी के चलते हालात विकट हो चुके हैं। विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) और कॉपरनिकस की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप में तापमान के वैश्विक औसत की तुलना में दोगुनी से भी अधिक गति से बढ़ने के कारण वह दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। 2025 में यूरोप के लगभग 95 प्रतिशत हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया गया। यहां तक कि आर्कटिक क्षेत्र के पास भी तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। केवल यूरोप ही नहीं, भारत, अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका सहित दुनिया के कई देशों में भी पिछले कुछ वर्षों के दौरान रिकॉर्ड तोड़ गर्मी देखी गई है। भारत के कई शहरों का तापमान तो पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक तक पहुंच रहा है। गर्मी की समस्या जल संकट से भी जुड़ी है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, भारत के 166 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी का स्तर उनकी कुल भंडारण क्षमता का केवल लगभग 27 से 28 प्रतिशत ही रह गया है। यूरोपियन एन्वॉयरनमेंट एजेंसी की रिपोर्ट भी बताती है कि यूरोप का लगभग 19 प्रतिशत क्षेत्र सूखे की स्थिति का सामना कर रहा है और 36 देश जल संकट से प्रभावित हैं। स्पष्ट है कि हीटवेव और बढ़ती गर्मी अब किसी एक देश या महाद्वीप की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी है। दुनिया के देशों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अनेक अंतरराष्ट्रीय समझौते किए हैं, लेकिन महाशक्तियों के अनमने रवैये के चलते उनके क्रियान्वयन की गति अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच सकी है। लिहाजा, मानसून पूर्व बारिश के रूप में अस्थायी मौसमी राहत से पर्यावरण को लेकर हमारी चिंताएं कम नहीं होनी चाहिए। हर वर्ष बढ़ती गर्मी, बदलते मानसून पैटर्न, बाढ़ व सूखे की बढ़ती आशंकाएं प्रमाण हैं कि प्रकृति स्पष्ट संकेत दे रही है। ऐसे में, यह जरूरी है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी देश मिलकर तेजी से ठोस कदम उठाएं, अन्यथा आने वाले वर्षों में यह संकट मानव जीवन और अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए और भी बड़ा खतरा बन जाएगा।
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